sn vyas
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#🪔तुलसी दास जयंती 📿
`पन्द्रह सौ चौवन विसे कालिन्दी के तीर।`
`श्रावण शुक्ला सप्तमी, तुलसी धरयो शरीर।।`
*आज (१९ अगस्त २०२६ /श्रावण माह शुक्ल पक्ष सप्तमी तिथि संवत् २०८३) गोस्वामी तुलसीदासजी के ५२९वें जयन्ती पर उनके श्रीचरणों में हम कोटि-कोटि प्रणाम करते हैं 🙏*
संवत् १५५४ में श्रावण शुक्ल पक्ष की सप्तमी को अभुक्त मूल नक्षत्र में *'मानस कवि संत श्री गोस्वामी तुलसीदास जी'* का जन्म हुआ था। *जन्म के समय बालक तुलसी के कंठ से रूदन नहीं, वरन मुख से `राम` शब्द निकला था जिसके कारण ये `'रामबोला'` कहलाए।*
> गोस्वामीजी ने अपने जीवन में अभाव और पीड़ा की अनुभूति की थी। *ऐसे समय में उन्हें नरहरिदास के रूप में एक संत, एक गुरु का आश्रय मिला। समाज जिसे ठुकरा देता है, संत उसे स्वीकार कर लेते हैं।* उन्होंने बालक तुलसीदासजी को रामनाम की महिमा बताई। उन्होंने कहा - पुत्र ! स्वार्थ और परमार्थ की सिद्धि एकमात्र रामनाम से होती है। तुम रामनाम का आश्रय लो। गुरुजी अपने आश्रम में नित्य रामायण की कथा सुनाया करते थे। गोस्वामीजी भी नित्य कथा श्रवण करते थे। गोस्वामीजी ने *रामनाम और रामकथा* दोनों को अपने जीवन की अमूल्य थाती बना लिया। बाद में जब गोस्वामीजी की एक सिद्ध संत के रूप में प्रसिद्धि हो गई और उनके नाम की सर्वत्र जय-ध्वनि होने लगी तो लोग उनसे आकर पूछते थे कि महाराज ! यह किस मंत्रजप से हुआ। गोस्वामीजी ने कहा कि यह *रामनाम* से हुआ, इस नाम को तो हम पहले से जानते थे, यह भी कोई बात हुई ! आप असली बात छिपा रहे हैं। गोस्वामीजी ने कहा कि - *संकर साखि जो राखि कहौं कछु तौ यह जीभ गरौ।* नहीं, नहीं ! यदि मैंने कुछ छिपाया हो तो जीभ गलकर नष्ट हो जाये। *अपनो भलो राम नामहिं सो तुलसी समुझि परौ।।* - मैंने जो कुछ जीवन में पाया, वह रामनाम के द्वारा ही पाया है।
*गोस्वामी तुलसीदास के जन्म के साथ ही संसार के घोर तम को समाप्त करने वाली दिव्य ज्योति का प्रादुर्भाव हुआ। जिसने कालांतर में `'श्रीरामचरितमानस'` का रूप धारण किया।*
> प्रसिद्धि के समय किसी ने गोस्वामीजी से पूछ दिया - महाराज ! कहाँ तो आपकी इतनी महिमा चारों ओर फैल रही है और कहाँ ये लोग आपका विरोध कर रहे हैं। लगता है ये तो कुछ बुरे लोग हैं। गोस्वामीजी ने यह नहीं कहा कि वे बुरे लोग हैं। वे कहते हैं कि इसमें इनका दोष नहीं है। प्रारम्भ में ऐसा कुछ नहीं था। मैं भीख माँगकर खाता था और पाँव पसारकर सो लेता था। तब कोई कुछ कहनेवाला नहीं था। प्रारम्भ से ही लोग पूजा नहीं करने लगे थे, यह तो बाद में प्रसिद्धि हो गई, प्रतिष्ठा का पाप मेरे सिर पर सवार हो गया, तब से झगड़ा बढ़ गया। वे कहते हैं -
*माँगि मधुकरी खात ते सोवत गोड़ पसारि।*
*पाप प्रतिष्ठा बढ़ि परी ताते बाढ़ी रारि।।* (दोहावली - ४९४)
गोस्वामीजी अपनी प्रशंसा और विरोध दोनों को समत्व में रहकर तटस्थ भाव से देखते हैं। वे बड़ी सजगता से आत्मनिरीक्षण करते हैं और सूक्ष्मता से, गहराई से अपने आपको कसते रहते हैं।
> *कलयुग के महानरक में उलझे जनमानस की मुक्ति का मार्ग तुलसीकृत मानस ही है, जो आनंद का पुंज और स्वर्ग तक पहुंचने का मार्ग है।*
* *तुलसी जी का यह अखिल काव्य विश्व को शांति प्रदान करने वाला है। रामनाम ही शांति का असीम सिंधु और आनंद का प्रदाता है एवं जनकल्याणकारी है। यथा-*
`'जो आनंद सिंधु सुख रासी। सीकर तें त्रैलोक सुपासी।`
`जो सुख धाम राम अस नामा। अखिल लोक दायक विश्रामा।'`
> *महान मानस कवि राम भक्त जगत हित उपदेशक सन्त शिरोमणि श्री गोस्वामी तुलसीदास जी के इस धरा को विशुद्ध करने हेतु किये गए अद्भुत अथक प्रयास हेतु यह संसार सदैव ऋणी है।*
* *प्रातः स्मरणीय पूज्यपाद गोस्वामी तुलसीदास जी की जन्मतिथि की आप सभी को हार्दिक बधाई व शुभकामनाएं ... 💐💐*
*༺꧁ जय जय सियाराम ꧂༻*
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