सुशील मेहता
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कल्कि द्वादशी हर साल भाद्रपद के महीने में चंद्रमा के बारहवें दिन को कल्कि द्वादशी के रूप में मनाया जाता है। लोगों की यह मान्यता है कि कल्कि हिंदू कैलेंडर के अनुसार इस तिथि को अवतार लेंगे। भगवान विष्णु के भक्तों का मानना ​​है कि कल्कि एक ब्राह्मण परिवार में जन्म लेंगे। हालांकि, कोई नहीं जानता कि भगवान विष्णु का अंतिम अवतार किस रूप में पृथ्वी पर प्रकट होगा। ऐसा माना जाता है कि कलियुग में विघ्नों और बुराइयों को समाप्त करने के लिए भगवान कल्कि धरती पर आएंगे। कल्कि' नाम 'काल' शब्द से बना है जिसका अर्थ है समय। चूंकि यह माना जाता है कि कल्कि कलयुग में आएंगे, इसलिए इसका नाम ऐसा पड़ा। ऐसा माना जाता है कि कल्कि अवतार भगवान विष्णु का अंतिम अवतार होगा और यह इस दुनिया से सभी बुराइयों को मिटा देगा। विष्णु पुराण के चतुर्थ अंश चौबीसवें खंड में लिखा है कि संभल में विष्णु यश ब्राह्मण के घर कलियुग की समाप्ति पर श्री कल्कि विष्णु भगवान अवतार लेंगे। भाद्रपद मास शुक्ल पक्ष की द्वादशी कल्कि अवतार की तिथि होगी।कलियुग की पूर्ण अवधि चार लाख बत्तीस हजार वर्ष बताई जाती है। कलियुग के अब तक लगभग छह हजार वर्ष बीत चुके हैं। विद्वान मानते हैं कि जब बीस से तीस वर्ष की आयु बड़ी मानी जाने लगेगी, धर्म का नाम भी सुनने को कहीं नहीं मिलेगा। रक्षक, भक्षक बन जाएंगे। भूख प्यास से सताई प्रजा कराहने लगेगी, तब कलियुग के चतुर्थ चरण में श्री कल्कि विष्णु भगवान का अवतार होगा। इन आकलनों के कारण संभल विश्व पटल पर श्री कल्कि अवतार भूमि के रूप में उभरा है।भारत में कल्कि अवतार के कई मंदिर भी हैं, जहां भगवान कल्कि की पूजा होती है। यह भगवान विष्णु का पहला अवतार हैं, जो अपनी लीला से पूर्व ही पूजे जाने लगे हैं। जयपुर में हवा महल के सामने भगवान कल्कि का प्रसिद्ध मंदिर है। इसका निर्माण सवाई जय सिंह द्वितीय ने करवाया था। इस मंदिर में भगवान कल्कि के साथ ही उनके घोड़े की प्रतिमा भी स्थापित है। #शुभ कामनाएँ 🙏
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