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2122. 1212. 22/112 राज जुबाँ से निकल गया कैसे हाथ अपनो पर चल गया कैसे हो गया ज़िस्म रूह से जुदा ज़िस्मसे दम निकल गया कैसे जब्त था जो किया हुआ हमने फिर वो आँसू मचल गया कैसे ख्वाइशें भी सहम गई मेरी घर ख़ुशी से ये जल गया कैसे थे इरादे तो पक्के मेरे भी देख उन्हें फिसल गया कैसे रंज तो ये नहीं मिला धोखा रंज है दिल दहल गया कैसे गम माजूर -ऐ - मुहब्बत का है आज वो फिर छल गया कैसे (लक्षमण दावानी जबलपुर✍️) गिरह बंद शेर दोस्त था तो बदल गया कैसे अक्से खुशबू में ढल गया कैसे #शायरी #📚कविता-कहानी संग्रह #✒ शायरी #💝 शायराना इश्क़ #📜मेरी कलम से✒️
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