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✨ च्यवन ऋषि का यौवन और समय चक्र का रहस्य: श्रीमद्भागवत की अद्भुत कथा ✨
श्रीमद्भागवत महापुराण में श्री शुकदेव जी ने राजा परीक्षित को कई रहस्यमयी और ज्ञानवर्धक कथाएं सुनाई हैं। महर्षि च्यवन के यौवन की प्राप्ति और समय (Time Dilation) के अद्भुत रहस्य को दर्शाती यह कथा अत्यंत रोचक है। आइए जानते हैं:
🌸 सुकन्या की भूल और महर्षि च्यवन से विवाह
राजा शर्याति (मनुपुत्र) की एक अत्यंत सुंदर कन्या थी— सुकन्या।
एक दिन वन में घूमते हुए सुकन्या ने एक बाँबी (दीमक की मिट्टी) में जुगनू जैसी दो चमकती ज्योतियां देखीं।
बालसुलभ चपलता में उसने एक काँटे से उन्हें बेध दिया। वास्तव में वे महर्षि च्यवन की आँखें थीं जो तपस्या में लीन थे।
मुनि के क्रोध से राजा शर्याति के सैनिकों का मल-मूत्र रुक गया। जब राजा को सत्य का ज्ञान हुआ, तो मुनि को प्रसन्न करने और क्षमा स्वरूप उन्होंने अपनी पुत्री सुकन्या का विवाह वृद्ध महर्षि च्यवन से कर दिया।
परम साध्वी सुकन्या ने उस वृद्ध अवस्था में भी अपने पति की अत्यंत निष्ठा से सेवा की।
🌿 अश्विनी कुमारों का आगमन और यौवन का वरदान
कुछ समय पश्चात, देवताओं के वैद्य अश्विनी कुमार महर्षि च्यवन के आश्रम आए।
च्यवन मुनि ने उनका सत्कार किया और बदले में युवा अवस्था का वरदान माँगा। उन्होंने अश्विनी कुमारों को यज्ञ में 'सोमरस' का भाग दिलाने का वचन भी दिया।
अश्विनी कुमारों ने महर्षि को एक सिद्ध कुण्ड में स्नान कराया। जब वे बाहर निकले, तो तीनों (अश्विनी कुमार और च्यवन मुनि) एक समान अत्यंत सुंदर और तेजस्वी युवा लग रहे थे।
सुकन्या ने अपने पातिव्रत्य धर्म से अपने वास्तविक पति को पहचान लिया, जिससे प्रसन्न होकर अश्विनी कुमार स्वर्ग लौट गए।
⚡ देवराज इंद्र का मान-मर्दन
जब राजा शर्याति मुनि के आश्रम आए, तो अपनी पुत्री के साथ एक सुंदर युवक को देखकर पहले तो क्रोधित हुए, किंतु सत्य जानकर अत्यंत प्रसन्न हुए।
महर्षि च्यवन ने राजा शर्याति से सोमयज्ञ करवाया और अश्विनी कुमारों को सोमरस का भाग दिया।
देवराज इंद्र को यह स्वीकार नहीं था। क्रोधित होकर जैसे ही इंद्र ने महर्षि को मारने के लिए वज्र उठाया, महर्षि च्यवन ने अपने तपोबल से उनका हाथ वहीं स्तम्भित (जड़) कर दिया।
अंततः सभी देवताओं को अश्विनी कुमारों का अधिकार स्वीकार करना पड़ा।
⏳ समय का अद्भुत रहस्य (Time Dilation) और रेवती का विवाह
राजा शर्याति के वंश में आगे चलकर राजा ककुद्मी हुए, जिनकी पुत्री का नाम रेवती था।
राजा ककुद्मी अपनी पुत्री के लिए सुयोग्य वर की तलाश में सीधे ब्रह्मलोक (ब्रह्माजी के पास) गए।
वहां संगीत चल रहा था, इसलिए वे कुछ क्षण रुक गए। उत्सव के बाद जब उन्होंने ब्रह्माजी से वर के बारे में पूछा, तो ब्रह्माजी हँस पड़े।
"महाराज! तुमने जिन लोगों के बारे में सोच रखा था, वे सब काल के गाल में समा गए। तुम्हारे यहाँ के कुछ क्षणों में पृथ्वी पर सत्ताईस (२७) चतुर्युगी का समय बीत चुका है। अब उनके गोत्रों के नाम भी शेष नहीं हैं।"
ब्रह्माजी ने बताया कि इस समय पृथ्वी पर भगवान नारायण के अंशावतार श्री बलराम जी (बलदेव) विद्यमान हैं, रेवती के लिए वही सर्वोत्तम वर हैं।
राजा ककुद्मी पृथ्वी पर लौटे, अपनी पुत्री रेवती का विवाह बलशाली बलराम जी से किया और स्वयं तपस्या के लिए बदरीवन चले गए।
!! जय श्री कृष्णा !!
!! जय श्री बलराम !!
. 🪷।। राधे राधे ।।🪷
. !! जय जय श्री राधे-कृष्ण !!
➳ᴹᴿ̶᭄K̶u̶m̶a̶r̶ ̶R̶a̶u̶n̶a̶k̶ ̶K̶a̶s̶h̶y̶a̶p̶
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