sn vyas
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#विष्णु #श्री हरि विष्णु #भगवान विष्णु श्री विष्णु स्तुति | (विष्णु पुराण) 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹 *यह स्तुति क्या है?* विष्णु पुराण के प्रथम अंश में जब हिरण्यकशिपु के अत्याचार से त्रस्त प्रह्लाद जी को भगवान विष्णु ने नरसिंह अवतार लेकर बचाया, और सृष्टि के आरंभ में ब्रह्मा जी ने वराह अवतार की स्तुति की, तब यह 27 श्लोकों की दिव्य स्तुति प्रकट हुई। इसमें ब्रह्मा और प्रह्लाद दोनों के भाव जुड़े हैं, इसलिए इसे *ब्रह्मा-प्रह्लाद कृत विष्णु स्तुति* भी कहते हैं। *इसमें क्या बताया गया है?* पहले 3 श्लोकों में भगवान के सगुण रूप - पुण्डरीकाक्ष, गोविन्द, सहस्र-मूर्ति की वंदना है। बीच के 4 से 19 श्लोकों में उनके विराट तत्व-रूप का वर्णन है - कि वे ही यज्ञ हैं, वेद हैं, जल हैं, प्राण हैं, यम-नियम, गुरु, और सहस्र-शीर्ष विराट पुरुष हैं। चर-अचर सब उन्हीं से उत्पन्न है। अंतिम 20 से 27 श्लोक शरणागति के हैं - जहाँ भक्त कहता है - हे अरविन्दाक्ष, हे शंख-चक्र-गदाधर, मैं आपकी शरण में हूँ, आप ही त्राता हैं। सम्पूर्ण 27 श्लोकी श्री विष्णु स्तुति - विष्णु पुराण *ब्रह्मा-प्रह्लाद उवाच -* *1.* नमस्ते पुण्डरीकाक्ष नमस्ते विश्वभावन। नमस्तेऽस्तु हृषीकेश महापुरुष पूर्वज॥ *2.* नमो ब्रह्मण्यदेवाय गोब्राह्मणहिताय च। जगद्धिताय कृष्णाय गोविन्दाय नमो नमः॥ *3.* नमोऽस्त्वनन्ताय सहस्रमूर्तये सहस्रपादाक्षिशिरोरुबाहवे। सहस्रनाम्ने पुरुषाय शाश्वते सहस्रकोटियुगधारिणे नमः॥ *4.* नमस्ते देवदेवानामादिभूत सनातन। पुरुषाय पुराणाय नमस्ते परमात्मने॥ *5.* जरामरणरोगादिविहीनायामलात्मने। ब्रह्मणां पतये तुभ्यं जगतां पतये नमः॥ *6.* शङ्खचक्रगदापद्मपाणये विष्णवे नमः। नमो हिरण्यगर्भाय श्रीपते भूपते नमः॥ *7.* विराट् प्रजापतेः साक्षाज्जनकाय नमो नमः। विश्वतैजसरूपाय प्राज्ञरूपाय ते नमः॥ *8.* त्वं यज्ञस्त्वं वषट्कारस्त्वमोंकारस्त्वमग्नयः। त्वं वेदा वैदिकाश्च त्वं यज्ञे त्वं यज्ञभावन। *9.* त्वं जलनिधिरामूलं त्वं धाता त्वं पुनर्वसुः। त्वं वैद्यस्त्वं धृतात्मा च त्वमतीन्द्रियगोचरः॥ *10.* त्वं विश्वयोनिस्त्वं चक्षुस्त्वं वेदाङ्गं त्वमव्ययः। त्वं वेदवेदस्त्वं धाता विधाता त्वं समाहितः॥ *11.* त्वं यमस्त्वं च नियमस्त्वं प्रांशुस्त्वं चतुर्भुजः। त्वमेवान्नान्तरात्मा त्वं परमात्मा त्वमुच्यते॥ *12.* त्वं गुरुस्त्वं गुरुतमस्त्वं वामस्त्वं प्रदक्षिणः। त्वं पिप्पलस्त्वमगमस्त्वं व्यक्तस्त्वं प्रजापतिः॥ *13.* हिरण्यनाभस्त्वं देवस्त्वं शशी त्वं प्रजापतिः। अनिर्देश्यवपुस्त्वं वै त्वं यमस्त्वं सुरारिहा॥ *14.* त्वं च सङ्कर्षणो देवस्त्वं कर्ता त्वं सनातनः। त्वं वासुदेवोऽमेयात्मा त्वमेव गुणवर्जितः॥ *15.* त्वं ज्येष्ठस्त्वं वरिष्ठस्त्वं त्वं सहिष्णुश्च माधवः। सहस्रशीर्षा त्वं देवस्त्वमव्यक्तः सहस्रदृक्॥ *16.* सहस्रपादस्त्वं देवस्त्वं विराट्त्वं सुरप्रभुः। त्वमेव तिष्ठसे भूयो देवदेव दशाङ्गुलः॥ *17.* त्वत्तो रोहत्ययं लोको महीयांस्त्वमनुत्तमः। त्वं ज्यायान् पुरुषस्त्वं च त्वं देव दशधा स्थितः॥ *18.* त्वत्तो विराट्समुत्पन्नो जगतो हृदि यः पुमान्। सोऽतिरिच्यत भूतेभ्यस्तेजसा यशसा श्रिया॥ *19.* जङ्गमाजङ्गमं सर्वं जगदेतच्चराचरम्। त्वत्तः सर्वमिदं जातं त्वयि सर्वं प्रतिष्ठितम्॥ *20.* अनिरुद्धस्त्वं माधवस्त्वं प्रद्युम्नः सुरारिहा। देव सर्वसुरश्रेष्ठ सर्वलोकपरायण॥ *21.* त्राहि मामरविन्दाक्ष नारायण नमोऽस्तु ते। नमस्ते भगवन् विष्णो नमस्ते पुरुषोत्तम॥ *22.* नमस्ते सर्वलोकेश नमस्ते कमलालय। गुणालय नमस्तेऽस्तु नमस्तेऽस्तु गुणाकर॥ *23.* वासुदेव नमस्तेऽस्तु नमस्तेऽस्तु सुरोत्तम। जनार्दन नमस्तेऽस्तु नमस्तेऽस्तु सनातन॥ *24.* नमस्तुभ्यं वराहाय नमस्ते मत्स्यरूपिणे। नमस्ते कूर्मरूपाय योगाधिगम्याय ते नमः॥ *25.* नमस्त्रिमूर्तये तुभ्यं त्रिधाम्ने दिव्यतेजसे। नमः सिद्धाय पूज्याय गुणत्रयविभागिने॥ *26.* त्वयैव सृष्टमखिलं त्वय्येव सकलं स्थितम्। पालयैतज्जगत्सर्वं त्राता त्वं शरणं गतिः॥ *27.* जयस्व देवदेवेश शंखचक्रगदाधर। भक्तानुकम्पिन् देवेश प्रसीद परमेश्वर॥ ॥ इति श्रीविष्णुपुराणे ब्रह्मा-प्रह्लाद कृत विष्णु स्तुतिः सम्पूर्णा ॥ *पाठ का फल:* विष्णु पुराण में स्वयं फलश्रुति है - _इमं स्तवं यः पठति श्रद्धया पुरुषोत्तमम्। सर्वपाप विनिर्मुक्तो विष्णुलोकं स गच्छति।_ जो नित्य प्रातः स्नान के बाद तुलसी के समक्ष इसका पाठ करता है, उसके समस्त पाप नष्ट होते हैं, घर में लक्ष्मी स्थिर रहती है और अंत में विष्णु लोक की प्राप्ति होती है। *पाठ विधि:* गुरुवार और एकादशी को 1 बार, शुद्ध घी का दीपक जलाकर।
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