sn vyas
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#शुभ शनिवार #जय बजरंगबली *॥ प्रत्यभिज्ञा–शक्ति के प्रकृष्ट प्रतीक श्रीहनुमानजी ॥* [ `साभार — बालक स्वामीजी महाराज💐` ] `मनुष्यों की तो कौन कहे , देवताओं में भी प्रत्यभिज्ञा–शक्ति ( पहचानने की सूक्ष्म शक्ति ) का प्रायः अभाव देखा जाता है । वृत्रासुर में भगवद्भक्ति है , यह बात देवताओं के राजा इन्द्र को भी तब ज्ञात हुई , जब देवासुर संग्राम में वृत्रासुर ने भगवत्स्मृति से सर्वतः संकुल होकर अस्त्र–शस्त्र फेंक दिये औऱ वह भक्ति भावना में करुणार्द्र स्वर से भगवद्दर्शन के लिये व्याकुल होकर प्रार्थना करने लगा —` *अजातपक्षा इव मातरं खगाः स्तन्यं यथा वत्सतराः क्षुधार्ताः ।* *प्रियं प्रियेव व्युषितं विषण्णा मनोऽरविन्दाक्ष दिदृक्षते त्वाम् ॥* [ `श्रीमद्भा० ६।११।२६` ] `— रजस्तमः स्वभाव वाले वृत्रासुर में सहसा सात्त्विक गुण का गौरवगर्भित उदय देखकर इन्द्र को विवश होकर कहना पड़ा —` *अहो दानव सिद्धोऽसि यस्य ते मतिरीदृशी ।* [ `श्रीमद्भा० ६।१२।१९` ] `अर्थात 👉🏻 हे दानव ! मैं नहीं जानता था कि रजस्तमोवृत्ति वाले तुममें इतनी अचल एवं अटल सात्त्विक भावना का प्राबल्य हो सकता है । तुम तो मुझसे भी आगे निकल गए ।` `इसी प्रकार भगवद्भक्त अम्बरीष को महर्षि दुर्वासा कहाँ पहचान सके ? यदि पहचान पाते तो उसे जलाने के निमित्त कृत्या उत्पन्न नहीं करते । इस प्रकार प्रत्यभिज्ञा–शक्तिहीनता के बहुतसे उदाहरण देवताओं , दानवों तथा ऋषियों में मिलते हैं । किन्तु जब हम श्रीरामभक्त हनुमानजी महाराज की प्रत्यभिज्ञा–शक्ति का विचार करते हैं तो स्पष्टतया विदित होता है कि उनमें व्यक्ति को उसकी आकृति देखते ही पहचान जाने की विलक्षण शक्ति थी । इसीलिये उन्हें` *बुद्धिमतां वरिष्ठम्'* `— यह विरुद दिया गया ।` `सुन्दरकाण्ड में उनकी प्रत्यभिज्ञा-शक्ति का पूर्ण परिचय मिलता है । पूर्वपरिचित अथवा पूर्व–दृष्ट–श्रुत स्थान औऱ व्यक्तियों को एवं उनकी विशेषताओं तथा दुर्बलताओं को पहचान लेना सहज–साध्य है , कष्ट–साध्य नहीं ; किन्तु जिस स्थान अथवा देश–विशेष को कभी देखा–सुना नहीं , सर्वथा नवीन उस देश–विशेष के लोगों की आभ्यन्तर प्रकृति को जानकर स्वामी के कार्य को बना लेना प्रकृष्ट प्रत्यभिज्ञा–शक्ति का प्रबल परिचायक है ।` `रामायण में भगवान् श्रीराम के अति निकट रहने वाले कितने ही पात्र हैं , जो उनके स्वभाव को नहीं पहचानते । सहोदर भ्राता श्रीलक्ष्मण के विचारों तथा भावों के श्रीराम से टकराने के बहुत–से उदाहरण हैं , किन्तु श्रीहनुमानजी तो किष्किन्धा में पम्पासरोवर पर जब श्रीराम से प्रथम बार मिलते हैं , तभी श्रीराम उनकी प्रत्यभिज्ञा–शक्ति से इतने अधिक प्रभावित हो जाते हैं कि उनके श्रीमुख से यह शब्द निकलता है —` *'बहु व्याहरतानेन न किञ्चिदपशब्दितम्।'* `श्रीराम लक्ष्मणजी से कहते हैं कि श्रीहनुमानजी ने कितनी सुन्दर अर्थभाववती किन्तु शब्दतः अल्पीयसी वाणी में अपना अभिप्राय कह दिया औऱ सबसे बड़ा गुण यह है कि उनके भाषण में एक भी अक्षर व्यर्थ अथवा निष्प्रयोजन नहीं प्रयुक्त हुआ ।` `लंका में प्रवेश करते समय जितने विघ्न उनके सम्मुख आते हैं , अपनी प्रत्यभिज्ञा–शक्ति के प्रभाव से वे उन सबका मर्म समझते हुए आगे बढ़ते रहे हैं । सुरसा , राक्षसी लंका आदि को परास्त करने के बाद जब वे अशोक वाटिका में पहुँचते हैं तो श्रीसीताजी को देखते ही पहचान जाते हैं । श्रीवाल्मीकिजी ने कहा है —` *तां विलोक्य विशालाक्षीमधिकं मलिनां कृशाम् ।* *तर्कयामास सीतेति कारणैरुपपादितैः ।* [ `वा० रा० ५।१५।२६ १/२` ] `इसके अतिरिक्त श्रीहनुमानजी की प्रत्यभिज्ञा–शक्ति का परमोत्कृष्ट प्रमाण तब मिलता है , जब विभीषण के शरण आने पर श्रीराम के सन्निकट रहने वाले सुग्रीव , लक्ष्मण आदि सभी यह आशंका करते हैं कि राक्षसराज रावण का भाई विभीषण कपट से भेद लेने के लिये शरण में आया है , सम्यग्भाव से नहीं । सभी पार्श्ववासियों के विचार जानने के बाद जब भगवान् श्रीराम श्रीहनुमानजी के मुख की ओर उनका अभिमत जानने के भाव से देखते हैं , तब वे स्वाभाविक रूप से सहजभाव के साथ अपना अभिप्राय , जिसका आधार प्रबल प्रत्यभिज्ञा–शक्ति है , बताते हुए कहते हैं कि— 'विभीषण को जैसा बताया जा रहा है , वह वैसा नहीं है , उसका जन्म यद्यपि राक्षस–कुल में हुआ है , परन्तु वह स्वभाव से राक्षस नहीं , महात्मा है , धर्मात्मा है ।' श्रीहनुमानजी की प्रत्यभिज्ञा–शक्ति की विजय होती है औऱ सब लोग अपने–अपने विचार बदलकर उन्हीं के साथ हो जाते हैं । भगवान् श्रीरामजी उनकी प्रत्यभिज्ञा–शक्ति की प्रशंसा करने लगते हैं ।` *बुद्धिमतां वरिष्ठं श्रीहनुमानजी महाराज की जय🚩*`जय बजरङ्गबली🚩` `हर हर महादेव🌼` `जय श्री राम🙏🏻` `जय जय शङ्कर🚩` `हर हर शङ्कर🚩` `© सर्वाधिकार सुरक्षित । सर्वज्ञ शङ्कर🚩 चैनल` `🌄🌆 प्रभात वन्दन 🌆🌄` `#प्रभात_वंदन` `#सर्वज्ञशङ्कर` `#आदिअनादिअनन्तशिवहर` `#प्रत्यभिज्ञाशक्ति` `#श्रीहनुमानजी` `#बुद्धिमतांवरिष्ठम्` `#सुन्दरकाण्ड` `#हनुमानभक्ति` `#रामदूत`
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