sn vyas
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#महाकाली #मां
प्राचीन काल की बात है, जब संसार में धर्म और अधर्म के बीच संघर्ष लगातार बढ़ रहा था। देवताओं और ऋषियों के मन में एक ही चिंता थी कि यदि आसुरी शक्तियों का प्रभाव इसी प्रकार बढ़ता रहा, तो पृथ्वी पर सत्य, करुणा और धर्म का अस्तित्व संकट में पड़ जाएगा। तभी देवताओं ने उस परम शक्ति का स्मरण किया, जो सृष्टि की आदि ऊर्जा मानी जाती है। वही शक्ति, जो कभी करुणामयी माता बनकर अपने भक्तों को आश्रय देती है और आवश्यकता पड़ने पर प्रचंड रूप धारण करके अधर्म का अंत करती है। इसी अनंत शक्ति का एक अत्यंत रहस्यमय और प्रचंड स्वरूप है माँ काली।
कहा जाता है कि माँ काली का प्राकट्य केवल किसी एक घटना तक सीमित नहीं है। देवी परंपराओं में उन्हें आदिशक्ति का वह रूप माना जाता है, जो समय, परिवर्तन और अधर्म के विनाश की शक्ति का प्रतीक है। उनका स्वरूप भले ही अत्यंत उग्र दिखाई देता हो, लेकिन उनके हृदय में अपने भक्तों के लिए असीम करुणा है। उनका काला वर्ण उस अनंत आकाश और उस परम सत्ता का प्रतीक माना जाता है, जिसमें अंततः समस्त नाम, रूप और संसार विलीन हो जाते हैं। इसलिए माँ काली का स्वरूप भय का नहीं, बल्कि उस भय के अंत का प्रतीक है जो अधर्म और अज्ञान से उत्पन्न होता है।
एक समय दैत्य शुंभ और निशुंभ ने कठोर तपस्या और शक्तियों के बल पर देवताओं तथा तीनों लोकों पर अपना प्रभाव स्थापित कर लिया। उनके अत्याचारों से देवता और साधारण प्राणी दोनों परेशान होने लगे। देवी के विभिन्न रूपों ने समय-समय पर इन आसुरी शक्तियों का सामना किया। इसी संघर्ष के दौरान शुंभ-निशुंभ की विशाल सेना के सेनापति चंड और मुंड भी देवी के विरुद्ध युद्ध करने के लिए आगे बढ़े। रणभूमि में देवी का स्वरूप अत्यंत तेजस्वी था, लेकिन जब असुरों की सेना चारों दिशाओं से बढ़ती चली गई, तब देवी के क्रोध से एक अद्भुत और प्रचंड शक्ति प्रकट हुई।
उस दिव्य शक्ति का स्वरूप इतना उग्र था कि उसे देखकर असुरों के भीतर भी भय उत्पन्न होने लगा। उनका वर्ण गहन काला था, केश खुले हुए थे और उनकी आंखों में ऐसा तेज था मानो स्वयं समय की ज्वाला प्रकट हो गई हो। उनके हाथों में दिव्य अस्त्र थे और वे सिंहनाद करते हुए रणभूमि की ओर बढ़ीं। यह थीं माँ काली। देवी का यह रूप किसी व्यक्तिगत क्रोध का प्रतीक नहीं था। यह उस शक्ति का प्रतीक था जो अधर्म की सीमा समाप्त होने पर स्वयं प्रकट होती है।
माँ काली ने असुरों की विशाल सेना का सामना किया। चंड और मुंड अपने बल और सेना पर अत्यंत गर्व कर रहे थे। उन्हें विश्वास था कि कोई भी शक्ति उनके सामने टिक नहीं सकती। लेकिन जैसे ही वे माँ काली के सामने पहुंचे, युद्ध का स्वरूप ही बदल गया। देवी ने अपने प्रचंड पराक्रम से असुर सेना को पीछे धकेल दिया और अंततः चंड तथा मुंड का भी अंत कर दिया। जब देवी ने उनके सिर लेकर आदिशक्ति के सामने प्रस्तुत किए, तब उन्हें चामुंडा नाम से भी संबोधित किया गया। इस प्रकार देवी के इस रूप ने संसार को संदेश दिया कि अधर्म चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, सत्य और दिव्य शक्ति के सामने उसका अंत निश्चित है।
लेकिन यह तो केवल उस महान लीला का एक चरण था। असली संकट अभी बाकी था। शुंभ और निशुंभ की सेना में रक्तबीज नाम का एक अत्यंत शक्तिशाली असुर था। उसे एक अद्भुत वरदान प्राप्त था कि उसके शरीर से जब भी रक्त की एक बूंद धरती पर गिरती, उसी रक्त की बूंद से उसके समान एक नया असुर उत्पन्न हो जाता। इस कारण जितना अधिक उस पर प्रहार किया जाता, उतनी ही अधिक उसकी संख्या बढ़ती जाती। देवताओं और देवी की सेना के लिए यह एक असाधारण चुनौती बन गई।
रणभूमि में रक्तबीज ने अपना भयंकर रूप दिखाना शुरू किया। देवी के अस्त्रों से उसके शरीर पर घाव होते और जैसे ही रक्त की बूंदें धरती पर गिरतीं, उसी क्षण नए-नए रक्तबीज उत्पन्न होने लगते। कुछ ही समय में पूरी रणभूमि उसके असंख्य रूपों से भरने लगी। देवता चिंतित हो उठे। यदि यही चलता रहा तो उस असुर की संख्या अनंत होती चली जाएगी।
तभी माँ काली ने अपनी दिव्य शक्ति का ऐसा रूप प्रकट किया जिसने युद्ध की दिशा ही बदल दी। देवी ने रक्तबीज के रक्त को धरती पर गिरने से रोकना शुरू किया। जहां-जहां रक्त गिरने वाला होता, वहां माँ काली उसे अपने भीतर समाहित कर लेतीं, जिससे नए असुर उत्पन्न होने का अवसर ही समाप्त हो गया। धीरे-धीरे रक्तबीज की शक्ति कमजोर पड़ने लगी और अंततः उसका अंत हुआ। इस प्रसंग को देवी परंपरा में अत्यंत गहरे आध्यात्मिक अर्थ से भी देखा जाता है। रक्तबीज उस नकारात्मकता का प्रतीक माना जाता है जो एक विचार से अनेक विचारों को जन्म देती रहती है। जब उसके मूल स्रोत को रोक दिया जाता है, तभी उसका विस्तार समाप्त होता है।
रक्तबीज के अंत के बाद भी युद्ध समाप्त नहीं हुआ। शुंभ और निशुंभ अपने सामर्थ्य पर अत्यंत गर्वित थे। उन्हें विश्वास था कि वे देवी को पराजित कर सकते हैं। लेकिन देवी ने उन्हें स्पष्ट कर दिया कि उनकी सारी शक्ति उसी एक परम शक्ति से उत्पन्न होती है। देवियों के अनेक रूप अंततः उसी एक आदिशक्ति में समाहित होने लगे और रणभूमि में देवी का अद्वितीय स्वरूप प्रकट हुआ। यह दृश्य इस बात का प्रतीक था कि संसार में दिखाई देने वाली अनेक शक्तियों का मूल स्रोत एक ही दिव्य चेतना है।
शुंभ ने देवी को चुनौती दी और कहा कि वे अकेली नहीं हैं, उनके साथ अनेक शक्तियां हैं। तब देवी ने कहा कि संसार में जो भी शक्ति दिखाई देती है, वह उसी परम शक्ति का विस्तार है। इसके बाद देवी का युद्ध शुंभ के साथ हुआ। दोनों के बीच भयंकर संघर्ष हुआ। आकाश और पृथ्वी उस युद्ध के साक्षी बने। अंततः देवी ने अपने दिव्य पराक्रम से शुंभ का भी अंत कर दिया और तीनों लोकों को उसके आतंक से मुक्त कर दिया।
युद्ध समाप्त होने के बाद माँ काली का उग्र रूप शांत होने लगा, लेकिन देवी की शक्ति का एक और प्रसिद्ध प्रसंग आगे आता है। जब संसार में अधर्म का भार कम हो गया था, तब भी देवी का प्रचंड रूप रणभूमि में गतिशील था। उनके चरणों की गति से धरती कांप रही थी और उनकी ऊर्जा इतनी तीव्र थी कि देवताओं को चिंता होने लगी कि यदि यह शक्ति इसी प्रकार आगे बढ़ती रही तो संसार का संतुलन प्रभावित हो सकता है।
तब भगवान शिव ने एक अद्भुत लीला रची। वे स्वयं माँ काली के मार्ग में शांत भाव से लेट गए। देवी अपने उग्र वेग में आगे बढ़ रही थीं और अनजाने में उनका चरण भगवान शिव के ऊपर पड़ गया। जैसे ही देवी को इसका बोध हुआ, उनका उग्र भाव क्षण भर में शांत हो गया। यह दृश्य देवी और शिव के उस दिव्य संबंध का प्रतीक माना जाता है जिसमें शक्ति और चेतना एक-दूसरे के बिना पूर्ण नहीं हैं। शिव बिना शक्ति के निष्क्रिय माने जाते हैं और शक्ति बिना चेतना के दिशाहीन। दोनों का संतुलन ही सृष्टि की पूर्णता है।
माँ काली के इस स्वरूप को देखकर भक्तों के मन में एक महत्वपूर्ण संदेश प्रकट होता है। उनका काला स्वरूप अंधकार का प्रतीक नहीं, बल्कि उस अनंत सत्ता का प्रतीक माना जाता है जिसमें समस्त ब्रह्मांड समाया हुआ है। उनकी खुली जटाएं प्रकृति की स्वतंत्र शक्ति का संकेत देती हैं, उनकी उग्र दृष्टि अधर्म के प्रति अडिग संकल्प को दर्शाती है और उनका भयानक रूप यह बताता है कि जो शक्ति भक्तों के लिए करुणामयी माता है, वही अधर्म के लिए प्रचंड काल बन सकती है।
माँ काली को समय और परिवर्तन से भी जोड़ा जाता है। संसार में जो कुछ जन्म लेता है, उसका परिवर्तन निश्चित है। कोई भी शक्ति, धन, अहंकार या साम्राज्य हमेशा के लिए नहीं रहता। यही कारण है कि काली का अर्थ केवल भयावह शक्ति के रूप में नहीं, बल्कि काल की उस अनिवार्यता के रूप में भी समझा जाता है जो हर असत्य और अहंकार को अंततः समाप्त कर देती है।
भक्तों की दृष्टि में माँ काली अत्यंत करुणामयी माता हैं। जो व्यक्ति भय, अन्याय और कठिन परिस्थितियों से घिर जाता है, वह माता को पुकारकर अपने भीतर साहस और विश्वास अनुभव करता है। देवी की कथा हमें यह भी सिखाती है कि बाहरी अंधकार से अधिक खतरनाक मन के भीतर का अंधकार है। अहंकार, क्रोध, लोभ, हिंसा और अन्याय जब मनुष्य के भीतर बढ़ने लगते हैं, तब उसे अपनी ही चेतना में मौजूद दिव्य शक्ति को जागृत करने की आवश्यकता होती है।
माँ काली की कथा इसलिए केवल युद्ध और असुरों के विनाश की कहानी नहीं है। यह मनुष्य के भीतर चलने वाले संघर्ष की भी कथा है। रक्तबीज हमारे भीतर बार-बार जन्म लेने वाले नकारात्मक विचारों का प्रतीक हो सकता है, शुंभ और निशुंभ अहंकार और अधिकार की भावना का प्रतीक हो सकते हैं और माँ काली उस जागृत चेतना का प्रतीक हैं जो इन सभी अंधकारों का सामना करने का साहस देती है।
कहा जाता है कि जब भक्त सच्चे मन से माता को स्मरण करता है तो उसे केवल बाहरी सुरक्षा की नहीं, बल्कि अपने भीतर की शक्ति को पहचानने की प्रेरणा भी मिलती है। माँ काली का संदेश यही है कि भय से भागना नहीं चाहिए, बल्कि सत्य और धर्म के साथ उसका सामना करना चाहिए। अधर्म चाहे कितना ही विशाल क्यों न दिखाई दे, उसका अस्तित्व स्थायी नहीं होता। समय बदलता है, परिस्थितियां बदलती हैं और अंततः सत्य अपना मार्ग बना लेता है।
इसीलिए माँ काली को विनाश की देवी कहकर सीमित करना उनके स्वरूप को अधूरा समझना होगा। वे विनाश के माध्यम से नए सृजन का मार्ग खोलने वाली शक्ति हैं। जैसे रात के बाद सुबह आती है, वैसे ही अधर्म के अंत के बाद धर्म की स्थापना होती है। उनका प्रचंड रूप संसार को यह स्मरण कराता है कि परम शक्ति सदैव धर्म, सत्य और निर्दोष जीवन की रक्षा के लिए उपस्थित है।
माँ काली की यह दिव्य कथा हमें अंत में यही संदेश देती है कि मनुष्य को अपने भीतर के भय पर विजय प्राप्त करनी चाहिए, अहंकार को त्यागना चाहिए, अन्याय का साथ नहीं देना चाहिए और सत्य तथा करुणा के मार्ग पर चलना चाहिए। क्योंकि जिस शक्ति ने असंख्य आसुरी शक्तियों का अंत किया, वही शक्ति एक सच्चे भक्त के हृदय में साहस, विश्वास और भक्ति बनकर भी प्रकट हो सकती है। माँ काली का स्मरण हमें याद दिलाता है कि अंधकार कितना भी गहरा क्यों न हो, दिव्य चेतना का प्रकाश उससे कहीं अधिक शक्तिशाली है। जय माँ काली।
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