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-ramkumardhiwar - Author on ShareChat
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श्रीरामचरितमानस  .........46
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    7-4 शीगानकीवल्लभी चिगयते  श्रीरामचरितमानस 32 @II3 साधु  सुखारी II किए भगत हित नर तनु धारी| सहि संकट रम भगत   होहिं मुद मंगल  মসপ जपत अनयासा नामु ~1 शरीगमनन्दजीने भकीकि ढितकै लियै मनुप्य शरीर  धारण ऊरकै स्वर्य ऋष्ट सहकर साधओको  सहजहीगें आनन्द ओर कल्याणके  सुखी कियाः पान्तु भकतगण प्रैगकै साय নাদব্দা ভ্প কবে ৫ৈ 5ಞ7 Ri' / तिय तारी नाम कोटि खल कुमति  सुथारी যাস एक तापस মন মুন रिषि हित राम सुकेतुसुता की सहित कीन्हि बिबाकी सहित दोष दुख दास  दुग़ासा  दलड नामु जिमि रबि निसि नासा।। भंजेउ  भजन चापू आपु ganq Il राम भव भव भय नाम तीगमजीने एक तपस्नीको स्त्री (अहल्या) को ली नाग़॰ परन्न नामन लरौड़ी दररको चिगढी बद्धिको सुधार दिय। चीरमजीने ऋषि विष्रामित्रके ढितके तिय सकत यक्षकी V तादकाकी सन। ओरपन (सवार ) सहित समात्त को नाम अपने भकोक दाप दःख  फान তাম মূর্ব যমিকা ! সযামনান না दरशाओका रस स्य्यशिवगीच  777  Il नामका प्रतपःढी संसारक सनभ्यीकी नाश करनेवला 6 । २०३।l पान |61 दंडक बनु प्रभु कीन्ह सुहावन  अमित नाम किए पावन লন সন नामु सकल कलि कलुप निकंदन।।  निसिचर   निकर दले रयुनंदन সখ[ সাদেনীন बनको सुरावन  परन्च नामने असख्य সনুষাক  भवानक ] O<l कलियुगके सात तीरपनायनीने रक्षसोके  1l' मनीाकी पवन्न कर HபI 45 =1ப எ1 समरकी ர் 7 பIடI 7"i মনযী যীথ মুমনন্ধনি दीन्हि   रघुनाथ। सुगति  दो॰ नाम उधारे अमित खल बेद बिदित गुन गाथII २४।। तीरपनापजीने ता शवत  जटायु आदि ठत्तम सोबकोको ढी गुकति दीः परन्त नागने अगनित " दष्टीका उद्धार किया। नामकै गुर्णाकी  எ்பு ஈf1 ~13*1 क
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    शीणानकीाचललभा चिगयत  श्रीरामचरितमानस 24 बालकाड बंदउँ अवध पुरी अति पावनि सरजू सरि कलि कलुष नसावनि ।। नारि   बहोरी  प्रनवउँ  ममता जिन्ह पर प्रभुहि न थोरी Il पुर  नर नाश करनेवाली श्रीसरय नदीकी न अति पनिप्र शोअयोग्गापरी ओर कलियुगके पापांका  चन्दना करता ह। फिर अवथपुरीके उन नर॰नारियाको प्रणाम करता हूँ बिनपर प्रभु श्रीरामचन्दणीकी  थोड़ी नही யா ' 5)11?1 Hमता মিম নিবব্ধ विसोक अघ ओघ नसाए लोक ননাs बसाए। बंदउँ   कौसल्या   दिसि সানী कीरति जासु सकल जग माची Il उन्होने [अपनी पुरीनें रनेवाले ] सीताजीकी निन्दा करनेवाले (योयी और उसके समर्थक पुर॰नानारियों ) क प्ापसमहको नाश कर तनको शोकरहित बनाकर अपने लोक খাস ) ৭ যমা ஈ 7 கரசார் 75 ஈாங் 4 ५ जिसकी   काति  ससारम 71 ঘদ T1;l ?1 प्रगटेउ जह মমি নামে बिस्व सुखद खल कमल तुसारू ll रघुपति  रानी1 सुकृत  Ta सहित TTTI নমাথ सुमगल 73 Ha करउँ करहु कृपा सुत सेवक   जानी।।  எர் प्रनाम करम ಗ जिन्हहि बिरचि बड़ भयउ बिधाता  महिमा अवधि সানা |l T৭ जहा ( कोमल्यारूपी पूर्व दिशा) सेचिश्को सख देनेवाले और कमलींके लिये पालके  ६षएरूपी समान श्रोरमचन्द्रजीरूपो सुन्दर नन्द्रमा प्रकट ६ए। सब सानियोंसहित रजा दशर्थजीको पुण् ओर मन्दर कल्याणकी भूरति मानकर मै भन वचन और कर्मसे प्रणाम करता हँ। अपने पुत्नका सेवक  मद्षपर कषाको॰ ञिनको रचकर ब्रह्ाजीने भी बदाई पागी तयाजो श्रीगमजीके माता " Hlah7 4 M1l Mh  M  M 1 /1 HIMI ( l 471 बंदउँ अवध भुआल सत्य प्रेम जेहि राम  पद। '11o' fgd दीनदयाल प्रिय तनु तृन इव परिहरेउ।। १६।। अवयक राजा शोदशर्थजीकी बन्दना करता ढ जिनका श्रीरमजीके चरणा्म सचचा प्रेम था दीनदयाल प्रभके बिछड़ते ही अपने प्यार शरीरको मामूली तिनकेको तरह त्याग दिया।। १६ ।
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    #श्रीरामचरितमानस 🪷 ........23
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