sn vyas
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#👉 लोगों के लिए सीख👈 #🙏 प्रेरणादायक विचार #🕉️सनातन धर्म🚩 #🌸 जय श्री कृष्ण😇
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‼ *भगवत्कृपा हि केवलम्* ‼
🚩 *"सनातन परिवार"* 🚩
*की प्रस्तुति*
🔴 *आज का प्रात: संदेश* 🔴
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*इस संसार में जन्म लेकर जब मनुष्य समझदार होता है तो वह संसार के सारे कार्य अपने मन के अनुसार करना चाहता है | मनुष्य यही विचार करता है कि उसके मन में जो आए भगवान उसे पूरा करते रहे परंतु भगवान मन की सारी बातें पूरी नहीं करते हैं | यह भगवान का मनुष्य के प्रति कोई द्वेष नहीं है बल्कि इसमें भी भगवान की कृपा भरी हुई है , क्योंकि यदि मनुष्य के मन की सारी बातें पूरी होने लगेगी तो ऐसी भयानक स्थिति पैदा हो जाएगी जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती | मनुष्य अपने मन की सारी कामनाएं पूरी करके सुखी होना चाहता है जबकि वास्तविकता यह है कि मनुष्य को अपने सुख और दुख का ज्ञान ही नहीं है | मनुष्य अपने मन की बात पूरी होने को सुख और बात पूरी ना होने को दुख मानता है | जब मनुष्य सचमुच दुखी हो जाता है तब उस समय उसको किसी प्रकार के सुख भोग में प्रवृति नहीं होती और भोग वासना का अंत हो जाता है | जब संसार से अरुचि हो जाती है तब वह दुख मनुष्य को प्रभु से मिला देता है क्योंकि सुख भोग की रूचि और प्रवृति से ही मनुष्य उन से विमुख होता है और भोग वासना की निवृत्ति से भगवान के सम्मुख और संसार से विमुख होता है | तो विचार कीजिये कि जब मनुष्य को दुख मिलता है तभी वह भगवान की शरण में जाता है तो यह भगवान की विशेष कृपा हुई कि नहीं हुई ? यदि मनुष्य के मन की सारी बातें पूरी होती रहे और उसको कभी दुख ही ना हो तो भगवान की शरण में नहीं जाएगा और जब मनुष्य भगवान की शरण में नहीं जाता तो यह मान लो कि उसके ऊपर भगवान की कृपा नहीं हुई है | इसीलिए हमारे महापुरुष सांसारिक भोग वासना से निवृत्त होकर ईश्वर की ओर उन्मुख होते रहे हैं और इससे उन्हें जो चिरस्थाई सुख प्राप्त हुआ उसका वर्णन कर पाना हमारी लेखनी के बस में नहीं है | प्रत्येक मनुष्य को सच्चा सुख ढूंढने का प्रयास करना चाहिए और सच्चा सुख सुख भोग की चाह मिटाने में ही मिल सकता है |*
*आज आधुनिक युग में प्रत्येक मनुष्य सुखी ही रहना चाहता है परंतु प्रत्येक सुख मनुष्य को मिल नहीं पाता | मनुष्य दो प्रकार के जीवन का उपयोग करता है :- सुखी जीवन एवं दुखी जीवन | दुखी एवं सुखी जीवन के पहले यह जान लिया जाए कि जीवन क्या है ? क्योंकि जिसको लोग जीवन कहते हैं वह तो जीवन है ही नहीं ! वह तो मृत्यु का ही दूसरा नाम है | एक अवस्था की मृत्यु को ही दूसरी अवस्था का जन्म कहा जाता है | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" बताना चाहूंगा कि जिस प्रकार बीज की मृत्यु के बाद ही पौधे की उत्पत्ति होती है ! बाल्यावस्था की मृत्यु और कुमार एवं युवावस्था की क्रम से उत्पत्ति होती है | इनमें कोई व्यवस्था स्थाई नहीं है , प्रत्येक क्षण परिवर्तनशील है | जिस शरीर को सुखी रखने के लिए मनुष्य अनेकों प्रकार के विषय भोगों की कामना करता है वह शरीर तो वास्तव में एक अस्थिपिंजर मात्र है | इसकी चाह ने आत्मा की चाह को अर्थात अमर जीवन की चाह को ढक कर रख दिया है | भोग की चाह ने मनुष्य को ईश्वर से विमुख कर दिया है इसीलिए मनुष्य दुखी है क्योंकि ईश्वर से विमुख रहकर कोई भी सुखी नहीं रह सकता है | इसीलिए प्रत्येक मनुष्य को इंद्रियों एवं विषयों के संबंध से होने वाले सुख भोगो की चाह को मिटा कर भगवान के सम्मुख होने का प्रयास करना चाहिए |*
*जब मनुष्य को सारे ऐश्वर्य प्राप्त हो जाते हैं फिर भी उसे कुछ न कुछ अभाव का अनुभव ही होता रहता है | इच्छाओं की पूर्ति कभी नहीं हो सकती | यदि सच्चे सुख की कामना है तो इच्छाओं का दमन करना होगा | जिस दिन मनुष्य सुख भोगने की चाह को मिटा देता है उसी दिन उसको सच्चा सुख प्राप्त होने लगता है |*
🌺💥🌺 *जय श्री हरि* 🌺💥🌺
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सभी भगवत्प्रेमियों को आज दिवस की *"मंगलमय कामना*🙏🏻🙏🏻🌹
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आचार्य अर्जुन तिवारी
प्रवक्ता
श्रीमद्भागवत/श्रीरामकथा
संरक्षक
संकटमोचन हनुमानमंदिर
बड़ागाँव श्रीअयोध्याजी
(उत्तर-प्रदेश)
9935328830
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