M P SINGH
536 views 4 hours ago AI indicator
राजा बहुलाश्व और भक्त श्रुतदेव की निष्काम भक्ति : जनकपुर में बहुलाश्व नाम के एक धर्मनिष्ठ और प्रतापी राजा राज्य करते थे। वे भगवान श्री कृष्ण के अनन्य भक्त थे। उसी नगर में श्रुतदेव नाम के एक अत्यंत निर्धन, शांत, संतोषी और भगवद्भक्त ब्राह्मण भी रहते थे। श्रुतदेव जी की जीवनचर्या अत्यंत सरल थी। वे कभी किसी से कुछ माँगते नहीं थे। प्रारब्ध से जो कुछ सहज रूप से प्राप्त हो जाता, उसी से अपनी पत्नी के साथ भगवान का भोग लगाकर संतोषपूर्वक जीवन बिताते थे। झोपड़ी साधारण थी, वस्त्र पुराने थे, लेकिन हृदय में निरंतर श्री कृष्ण का ध्यान और भक्ति विद्यमान रहती थी। एक बार भगवान श्री कृष्ण अपने प्रिय सखा अर्जुन तथा महर्षि व्यास, नारद, कश्यप आदि ऋषियों के साथ जनकपुर पधारे। जब राजा बहुलाश्व और श्रुतदेव को भगवान के आगमन का समाचार मिला, तो दोनों आनंद से भर उठे और हाथ जोड़कर प्रभु से अपने-अपने घर पधारने की प्रार्थना करने लगे। भगवान ने दोनों भक्तों के निष्कपट प्रेम को देखा। वे किसी एक भक्त को प्रसन्न करके दूसरे को निराश नहीं करना चाहते थे। अतः भगवान श्री कृष्ण ने अपनी योगमाया से दो स्वरूप धारण किए। एक स्वरूप राजा बहुलाश्व के साथ उनके राजमहल की ओर चला और दूसरा स्वरूप श्रुतदेव के साथ उनकी साधारण झोपड़ी की ओर। राजा बहुलाश्व ने भगवान को रत्नजटित सिंहासन पर विराजमान किया। सुगंधित द्रव्यों, उत्तम वस्त्रों और विविध प्रकार के भोगों से उनका पूजन किया। दूसरी ओर, श्रुतदेव जी ने अपनी सामर्थ्य के अनुसार चटाई बिछाकर प्रभु को बैठाया। कुएँ का शीतल जल लाकर भगवान और ऋषियों के चरण पखारे तथा उस चरणामृत को परिवार सहित अपने मस्तक पर लगाया। फिर जंगल से प्राप्त फल और घर में उपलब्ध साधारण अन्न को अत्यंत प्रेम और श्रद्धा से प्रभु को अर्पित किया। भगवान श्री कृष्ण दोनों भक्तों के घर एक ही समय उपस्थित थे और दोनों के प्रेम को समान भाव से स्वीकार कर रहे थे। भगवान के लिए भक्ति का मूल्य बाहरी वैभव से नहीं, बल्कि भक्त के भाव, श्रद्धा और निष्कपट प्रेम से होता है। राजा ने अपनी सामर्थ्य के अनुसार प्रभु का सत्कार किया और श्रुतदेव ने अपनी छोटी-सी सामर्थ्य में अपना पूरा हृदय अर्पित कर दिया। दोनों का प्रेम भगवान को समान रूप से प्रिय था। इस प्रसंग का यह संदेश है कि भगवान को धन, वैभव या बाहरी आडंबर नहीं, बल्कि सच्ची श्रद्धा, संतोष और निष्काम भक्ति प्रिय है। जिस हृदय में प्रेम और समर्पण है, वहीं प्रभु का वास्तविक निवास है। 🙏 जय श्री कृष्ण 🙏 #❤️Love You ज़िंदगी ❤️
15 likes
11 shares

More like this