sn vyas
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बहुत समय पहले देवताओं के बीच एक प्रश्न उठा कि जब-जब भगवान विष्णु पृथ्वी पर किसी अवतार में प्रकट होते हैं, तब उनके साथ शेषनाग भी किसी न किसी रूप में क्यों आते हैं। श्रीराम के साथ वही अनंत शेष लक्ष्मण बनकर उनके चरणों की सेवा करते हैं और श्रीकृष्ण के साथ बलराम बनकर उनके जीवन की हर लीला में सहभागी बनते हैं। क्या यह केवल संयोग है, या इसके पीछे सृष्टि का कोई गहरा रहस्य छिपा है? इसी रहस्य को समझने के लिए हमें सृष्टि के उस दिव्य समय में जाना होगा, जब नागवंश की अद्भुत कथा आरंभ हुई थी। कहा जाता है कि सर्पों की दुनिया में अनेक शक्तिशाली नाग हुए, लेकिन उनमें कुछ ऐसे भी थे जिनकी भूमिका केवल नाग के रूप में नहीं बल्कि युगों की घटनाओं से जुड़ी हुई थी। लोककथाओं और पुराण परंपराओं में तक्षक, वासुकी, कालिय और अनंत शेष के नाम विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं। हालांकि अलग-अलग पुराणों और परंपराओं में इनके संबंध और कथाओं का वर्णन अलग-अलग मिलता है, लेकिन अनंत शेष की महिमा सबसे अलग मानी गई है। उन्हें केवल एक विशाल सर्प नहीं, बल्कि भगवान नारायण की अनंत सेवा और दिव्य आधार-शक्ति का प्रतीक माना जाता है। तक्षक नाग का नाम महाभारत की कथा में विशेष रूप से आता है। राजा परीक्षित के जीवन से जुड़ी घटना के बाद तक्षक की भूमिका सामने आती है और आगे चलकर कलियुग के आगमन की कथा कही जाती है। दूसरी ओर वासुकी नाग का संबंध समुद्र मंथन से जुड़ा है। देवताओं और असुरों ने जब अमृत प्राप्त करने के लिए समुद्र मंथन किया, तब वासुकी को मंथन की रस्सी बनाया गया। इस महान कार्य में उनके शरीर को अत्यंत कष्ट सहना पड़ा, लेकिन उन्होंने देवकार्य में अपना योगदान दिया। भगवान शिव ने समुद्र मंथन से निकले विष को अपने कंठ में धारण किया और इसी कारण वासुकी का संबंध महादेव से भी अत्यंत निकट माना जाता है। फिर आती है कालिय नाग की कथा, जिसका नाम भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं से जुड़ा हुआ है। कालिय ने यमुना के जल को विषैला बना दिया था और उसके भय से आसपास के लोग परेशान थे। जब बालक कृष्ण ने यमुना में प्रवेश किया तो कालिय ने उन्हें रोकने का प्रयास किया। लेकिन श्रीकृष्ण ने उसके फनों पर नृत्य करके उसके अहंकार को समाप्त किया और उसे यमुना छोड़कर दूर जाने का आदेश दिया। इस लीला में भगवान ने यह संदेश दिया कि शक्ति का अर्थ दूसरों को भयभीत करना नहीं, बल्कि अपनी शक्ति का उपयोग धर्म और जीवन की रक्षा के लिए करना है। लेकिन इन सभी में सबसे अद्भुत थे अनंत शेष। शेष का अर्थ ही है वह जो सबके समाप्त हो जाने के बाद भी शेष रहे। उन्हें अनंत भी कहा जाता है, क्योंकि उनकी सीमा का वर्णन करना संभव नहीं माना गया। जब सृष्टि के पालनकर्ता भगवान नारायण क्षीरसागर में योगनिद्रा में विराजमान होते हैं, तब अनंत शेष उनकी शय्या बनकर उनकी सेवा करते हैं। उनके असंख्य फनों पर दिव्य मणियों का प्रकाश बताया गया है और वे स्वयं भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण के प्रतीक माने जाते हैं। अनंत शेष के बारे में एक प्रसिद्ध पुराणिक कथा यह बताती है कि वे संसार की भौतिक इच्छाओं से दूर होकर तपस्या में लीन हो गए थे। उनकी तपस्या इतनी गहरी थी कि ब्रह्मा जी उनसे प्रसन्न हुए। ब्रह्मा जी ने उन्हें सृष्टि के आधार का महान दायित्व सौंपा। इसी कारण अनंत शेष को पृथ्वी के आधार के रूप में वर्णित किया गया है। लेकिन उनका सबसे बड़ा सौभाग्य केवल पृथ्वी का भार उठाना नहीं था। वे भगवान नारायण की सेवा को अपना परम धर्म मानते थे। अनंत शेष के मन में केवल एक इच्छा थी कि वे हर जन्म में भगवान की सेवा कर सकें। उन्हें न राज्य चाहिए था, न वैभव, न कोई व्यक्तिगत शक्ति। उनका एकमात्र भाव था—जहां नारायण हों, वहां उनकी सेवा हो। इसी भाव को भगवान विष्णु के अवतारों में शेषनाग के साथ आने की परंपरा से जोड़ा जाता है। जब भगवान श्रीराम के रूप में अवतरित हुए, तब अनंत शेष लक्ष्मण के रूप में उनके साथ आए। लक्ष्मण ने राजमहल का सुख छोड़कर वनवास में श्रीराम का साथ दिया और हर परिस्थिति में उनकी सेवा की। चौदह वर्ष के वनवास में लक्ष्मण ने अपने भाई श्रीराम और माता सीता की रक्षा को ही अपना जीवन बना लिया। जंगल की कठिन रातें हों, राक्षसों का संकट हो या युद्ध का भयंकर समय, लक्ष्मण हमेशा श्रीराम के साथ खड़े रहे। उनके भीतर अपने लिए कुछ पाने की इच्छा नहीं थी। यही कारण है कि लक्ष्मण को अनंत शेष का अवतार मानने वाली परंपरा में सेवा और समर्पण को उनकी सबसे बड़ी विशेषता माना जाता है। फिर द्वापर युग आया और भगवान श्रीकृष्ण ने पृथ्वी पर अवतार लिया। इस बार अनंत शेष बलराम के रूप में उनके बड़े भाई बनकर आए। बलराम श्रीकृष्ण के साथ बचपन से ही रहे। गोकुल और वृंदावन की लीलाओं से लेकर आगे के जीवन तक उन्होंने कृष्ण का साथ निभाया। उनके हाथ में हल और मूसल को उनकी पहचान माना गया और उन्हें बल, धर्म तथा कृषि संस्कृति से भी जोड़ा गया। यही कारण है कि कृष्ण और बलराम का संबंध केवल दो भाइयों का संबंध नहीं माना जाता। भक्त परंपरा में बलराम को भगवान कृष्ण की सेवा और उनके दिव्य विस्तार से जुड़ा हुआ माना जाता है। जहां कृष्ण लीला करते हैं, वहां बलराम उनके सहचर बनकर उपस्थित रहते हैं। श्रीराम के समय लक्ष्मण और श्रीकृष्ण के समय बलराम के रूप में शेष की यही सेवा-भावना अलग-अलग रूपों में दिखाई देती है। लेकिन इस कथा का सबसे सुंदर संदेश यह है कि शेषनाग की महानता उनकी शक्ति में नहीं, बल्कि उनके समर्पण में है। जिसके पास अनंत शक्ति हो, फिर भी वह अपने आराध्य की सेवा को सबसे बड़ा सौभाग्य माने, वही सच्चे अर्थों में अनंत कहलाता है। इसी कारण भगवान नारायण की शय्या बनने से लेकर उनके अवतारों में भाई और सेवक के रूप में साथ रहने तक शेषनाग का स्वरूप भगवान के प्रति अटूट प्रेम और सेवा का प्रतीक बन जाता है। पुराणिक परंपराओं में नागों से जुड़ी अनेक कथाएं मिलती हैं और अलग-अलग ग्रंथों में इनके विवरण भी अलग हो सकते हैं। इसलिए तक्षक, वासुकी, कालिय और शेष को एक ही कथा में चार सगे भाइयों के रूप में प्रस्तुत करना सर्वमान्य शास्त्रीय विवरण नहीं माना जाता। लेकिन अनंत शेष का भगवान विष्णु के साथ संबंध और श्रीराम के साथ लक्ष्मण तथा श्रीकृष्ण के साथ बलराम के रूप में उनकी पहचान वैष्णव परंपरा में अत्यंत महत्वपूर्ण है। अंततः यह कथा हमें यही सिखाती है कि भगवान के सबसे निकट वही पहुंचता है जो अपने अहंकार को छोड़कर सेवा का मार्ग चुनता है। अनंत शेष की पूरी महिमा इसी समर्पण में छिपी है। वे शक्ति के प्रतीक होकर भी सेवा चुनते हैं, अनंत होकर भी अपने आराध्य के चरणों में विनम्र रहते हैं और हर युग में यही संदेश देते हैं कि सच्ची भक्ति का सबसे सुंदर रूप है—प्रेम, समर्पण और निस्वार्थ सेवा। नारायण की लीला में शेष केवल एक दिव्य सर्प नहीं, बल्कि अनंत भक्ति और अखंड सेवा-भाव के प्रतीक हैं। नारायण नारायण। #ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
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