sn vyas
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#🙏शुभ नवरात्रि💐🥢 #📖नवरात्रि की पौराणिक कथाएं 🗣️📿 *_🚩 श्रीशङ्कर कृत भवानी स्तुति — त्रयोदश श्लोकी — सम्पूर्ण — सविस्तार भाष्य सहित 🚩_* `📖 मूल ग्रन्थ — श्रीशङ्कराचार्य विरचित भवानी अष्टक — भुजंग —` *_गतिस्त्वं_* `एकीकृत पाठ — १३ श्लोक — शार्दूलविक्रीडित — शिखरिणी छन्द 🙏🏻🚩` `🪶 सम्पूर्ण प्रसङ्ग — काशी मणिकर्णिका घाट — शिव शव वत् — पण्डित विवाद — तर्क त्याग — अनाथ बालक वत् माँ की चूनर ग्रहण — वाणी हारी — विश्वास टिका — नाते छूटे सहित` `🎯 सन्दर्भ —` *_ऐं_* `बीज वाक् स्तम्भ —` *_ह्रीं_* `बीज मौन —` *_सौः_* `सौभाग्य महिमा —` *_इकार भवानी_* `— शिव शव भेद —` *_चरणावेव निपुणौ_* `— अपर्णा सेव्या —` *_अयःस्पर्शं वज्र_* `— नेति नेति भक्ति भाष्य` *_॥ सम्पूर्ण प्रसङ्ग–वर्णन — सविस्तार ॥_* `प्रसङ्ग क्रम 👉🏻` `क. काशी — मणिकर्णिका घाट — जहाँ शिव भी शव बन कर पड़े हैं — वहाँ पण्डित ब्रह्म क्या है इस विषय पर लड़ रहे हैं — किन्तु कोई रो नहीं रहा — तब शङ्कर ने तर्क त्याग अनाथ बालक वत् माँ की चूनर पकड़ी — ब्रह्म को जानना नहीं माँ को पुकारना है — तो मुख से १३ श्लोक फूटे —` `ख. प्रथम षट्क — वाणी का हारना —` *_भवानि स्तोतुं त्वां — चतुर्भिर्न वदनैः — पञ्चभिः — षड्भिः — दशशतमुखैः —_* `अहंकार का जलना — मैं कर लूँगा समाप्त — मैं नहीं कर सकता आरंभ —` `ग. द्वितीय चतुष्क — मध्य त्रिक — विश्वास का टिकना —` *_कृपापाङ्गालोकं — महान्तं विश्वासं — अयःस्पर्शं — कल्पलता विशेष — निरालम्बो लम्बोदरजननि कं यामि —_* `पारस दृष्टि —` `घ. तृतीय चतुष्क — अन्तिम चतुष्क — समस्त/सब सम्बंधों/नातों का छूटना —` *_न तातो न माता — विवादे विषादे — अनाथो दरिद्रो — नेति नेति पर्यवसान — गतिस्त्वं_* `वज्र कवच —` `ङ. श्रीविद्या मठ प्रकाशन — ३ पृष्ठ — भवानी अष्टक भुजंग गतिस्त्वं एकीकृत पाठ — कुल १३ श्लोक — शार्दूलविक्रीडित शिखरिणी —` `च. वज्र निष्कर्ष — वाणी हारी — चरण जीते — सौभाग्य जीता — त्याग फला — कल्पलता ने बिना परखे दिया — निरालम्ब को गोद मिली — पारस दृष्टि ने पवित्र किया — समस्त/सब सम्बंध/नाते छूटे तो एक बची — भवानि —` *_॥ श्लोकाः — विस्तृत श्लोकार्थ — तात्पर्य ॥_* *_भवानि स्तोतुं त्वां प्रभवति चतुर्भिर्न वदनैः_* *`प्रजानामीशानो विपुरमथनः पञ्चभिरपि ।`* *_न षड्भिः सेनानीर्दशशतमुखैरप्यहिपतिः_* *_तदान्येषां केषां कथय कथमस्मिन् भवति ॥१॥_* `श्लोकार्थ — हे भव भय हारिणी भवानि , तुम्हारी स्तुति करने में चार मुखों वाले प्रजापति ब्रह्मा भी समर्थ नहीं हुए , जो सदा वेद पढ़ते हैं — पाँच मुख वाले त्रिपुर नाशक ईशान शिव भी समर्थ नहीं हुए , जो स्वयं तुम्हारे स्वामी हैं — छह मुख वाले देव सेनापति कार्तिकेय भी नहीं , जो शक्ति के पुत्र हैं — एवं दस सौ अर्थात हजार मुख वाले अहिपति शेषनाग भी नहीं , जो सदैव तुम्हारी शय्या बनते हैं — फिर हे माँ , अन्य दो मुख , एक मुख वाले सामान्य जीवों की तो बात ही क्या —` *_तदन्येषां केषां कथय कथमस्मिन् भवति_* `अर्थात यह कार्य वाणी के सामर्थ्य से परे है —` `भावार्थ — पहला श्लोक अहंकार को जलाता है — हम सोचते हैं — हम स्तुति कर लेंगे , हम पुस्तक लिख देंगे — शङ्कर कहते हैं — जहाँ ब्रह्मा शिव हार गए , वहाँ तुम्हारी विद्वत्ता क्या है — यह दीनता का बीज है — वज्र वेदान्त वहीं आरंभ होता है जहाँ मैं कर लूँगा समाप्त होता है — तथा मैं नहीं कर सकता आरंभ होता है — वही शरणागति का द्वार है —` `गूढार्थ — यह` *_ऐं_* `बीज का वाक् स्तम्भ है — जहाँ चार वेद , पाँच मुख , छह शास्त्र , हजार तर्क — सब मौन हो जाते हैं , वहीं` *_ह्रीं_* `प्रकट होता है —` *_ऐं_* `से वाणी ,` *_ह्रीं_* `से मौन — इसलिए श्रीविद्या में सर्वप्रथम वाणी को हराया जाता है , तब देवी मिलती है —` *_त्वमेका नैवासि प्रकटितवराभीत्यभिनया_* *_भवत्रातुं दातुं फलमपि च वाञ्छासमधिकम् ।_* *_शरण्ये लोकानां तव हि चरणावेव निपुणौ ॥२॥_* `श्लोकार्थ — हे लोकों की एकमात्र शरण्ये , तुम अकेली ऐसी हो जो वर औऱ अभय का केवल अभिनय प्रकट करती हो —` *_प्रकटितवराभीत्यभिनया_* `— हाथों में वर मुद्रा एवं अभय मुद्रा तो दिखावे के लिए है — वास्तव में भव सागर से त्राण करने के लिए तथा वाञ्छा से भी अधिक फल देने के लिए तुम्हारे दो चरण ही निपुण हैं —` *_तव हि चरणावेव निपुणौ_* `अर्थात असली काम चरण करते हैं , हाथ नहीं —` `भावार्थ — माँ के हाथ में वर अभय दिखता है , परन्तु असली कृपा चरणों में है — क्योंकि हाथ तो आशीर्वाद दे कर छोड़ देते हैं , किन्तु चरण तो भव से उठा कर गोद में ले लेते हैं — ज्ञानी इसलिए तुम्हारे हाथ नहीं , चरण पूजते हैं — चरण ही उठाते हैं , हाथ तो केवल दिखाते हैं —` `गूढार्थ — हाथ माया हैं , चरण ब्रह्म हैं — देवी के हाथों में पाश अंकुश दिखते हैं , परन्तु मुक्ति चरणों से मिलती है — यही श्रीविद्या का रहस्य है —` *_चरणावेव निपुणौ_* `— गुरु के चरण , माँ के चरण — वही निपुण — वही पार करते हैं —` *_त्वमेव विश्वं जननि भुवनानां भवसि च_* *_स्थितौ धात्री संहृतौ च रुद्राणी त्रिनयने ।_* *_तथापि त्वां वक्तुं न प्रभवति वेदैरपि गिरा_* *_न ते सौभाग्यस्य क्वचिदपि मनागस्ति तुलना ॥३॥_* `श्लोकार्थ — हे जननि त्रिनयने , तुम ही विश्व की उत्पत्ति हो , स्थिति में धात्री धारण पोषण करने वाली हो , औऱ संहार में रुद्राणी घोर रूपा बन जाती हो — तथापि तुम्हें वेदों की वाणी भी कहने में समर्थ नहीं — तुम्हारे सौभाग्य की कहीं , किसी भी लोक में , तनिक/थोड़ी भी तुलना नहीं है —` `भावार्थ — तुम ही बनाती हो , तुम ही पालती हो , तुम ही मारती हो — तीनों तुम्हीं — फिर भी तुम भयानक हो कर भी भक्त के लिए कोमल हो — यही तुम्हारा सौभाग्य है — जो शिव को भी सुन्दर बनाता है — दरिद्र को धनी बनाता है —` `गूढार्थ — सृष्टि स्थिति संहार — महासरस्वती , महालक्ष्मी , महाकाली — तीनों एक भवानी में — यही` *_अपाणिपादो जवनो ग्रहीता_* `का अर्थ है — बिना हाथ पैर के सब करती है — वही ब्रह्म जो दौड़ता है , वही माँ बन कर थामता है —` *_विधात्री धात्री त्वं जननि परिपोषाय जगतां_* *_वधाय द्रुह्यन्तामसि च शमनी घोरवपुषा ।_* *_सदा भक्तानां त्वं भवसि वरदा पापनुदनी_* *_गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥४॥_* `श्लोकार्थ — हे जननि , जगत के परिपोषण के लिए तुम विधात्री बनाने वाली एवं धात्री पालने वाली हो — तथा द्रोहियों के वध के लिए घोर वपु धारण कर शमनी संहारिणी बन जाती हो — सदैव/सदा भक्तों के लिए वरदा औऱ पापों को दूर करने वाली हो —` `भावार्थ — माँ के दो स्वरूप हैं — सज्जन के लिए फूल से भी कोमल , दुर्जन के लिए वज्र से भी कठोर — दोनों में माँ ही — एक ही माँ पालती भी है व दण्ड भी देती है — जैसे अग्नि रसोई भी पकाती है एवं जंगल भी जलाती है —` `गूढार्थ — सौम्य तथा उग्र — दोनों का सामरस्य ही श्रीविद्या है — शमनी शमन करने वाली — मृत्यु को भी शमन करने वाली —` *_इषुर्भूर्भूर्भिर्बाणं शशधरशिरोभूषणमपि_* *_समग्रा सामग्री जगति यदि तेऽपि कररिपोः ।_* *_दरिद्रस्यैश्वर्यं तव जननि सौभाग्यमहिमा ॥५॥_* `श्लोकार्थ — कामदेव के बाण तो केवल फूल के हैं —` *_भूर्भूर्भिर्बाणं_* `— तुच्छ , क्षणभंगुर — औऱ शिरोभूषण में चन्द्रमा भी नहीं — फिर भी वह जगत को जीत लेता है — क्यों — क्योंकि रति साथ है — उधर कररिपु शिव के पास समग्र सामग्री है — त्रिशूल , डमरू , नाग , भस्म , चन्द्रमा — फिर भी वे दरिद्र जैसे दिखते हैं — श्मशान में — किन्तु हे जननि , तुम्हारे साथ रहने से वही दरिद्र ऐश्वर्यवान बन जाता है — यह तुम्हारे सौभाग्य की महिमा है —` `भावार्थ — सम्बन्ध से ऐश्वर्य आता है — रति से कामदेव विजयी , भवानी से शिव ऐश्वर्यवान — जिसके पास प्रेम है , वह फूल से भी जगत जीत लेता है — जिसके पास माँ नहीं , वह समस्त/सब सामग्री होते हुए भी दरिद्र —` `गूढार्थ — सौभाग्य अर्थात` *_सौः_* `— श्रीविद्या का परम् बीज —` *_सौः_* `ही सौभाग्य — इसी से शिव ईश्वर बनते हैं — शिव में शव में अन्तर इ का — इ ही भवानी — इ हटाओ तो शिव शव —` *_सपर्णाकीर्णां कतिपयगुणैः सादरमिदं_* *_श्रवणस्थं वह्नी मम तु मतिरेवं विलसति ।_* *_अपर्णा सेव्या जगति सकलैर्धीर्यविश्रुतैः_* *_पुराणोऽपि स्थाणुः फलति किमु कैवल्यपदवीम् ॥६॥_* `श्लोकार्थ — यह संसार कतिपय थोड़े से गुणों से युक्त पत्तों वाली लता को सपर्णाकीर्णां आदर से कान पर धारण करता है — कान में फूल लगाता है — परन्तु मेरी मति कुछ औऱ ही विलास करती है — वह कहती है — जगत में सब के द्वारा अपर्णा पर्ण तक का त्याग करने वाली पार्वती ही सेव्य है — क्योंकि उसके संग से पुराना स्थाणु ठूँठ शिव भी फलने लगता है — कैवल्य पदवी को फलने लगता है —` `भावार्थ — संसार गुण देख कर आदर देता है — थोड़ा गुण दिखा तो वाह वाह — पर शङ्कर कहते हैं — मैं अपर्णा को पूजता हूँ — जिसने गुणों का भी त्याग कर दिया — पत्ते तक नहीं खाए — त्याग ही सर्वाधिक बड़ा गुण है — एवं देखो , उसी त्याग के संग से शिव — जो स्वयं अकर्ता , अभोक्ता , स्थाणु हैं — वे भी फलने लगते हैं — सृष्टि करने लगते हैं — भक्त को मोक्ष देने लगते हैं —` `गूढार्थ — अपर्णा अर्थात अ से पर्णा — पर्ण अर्थात पत्ता , अन्न , गुण , व आश्रय — जिसने सब पर्ण सब आश्रय त्याग दिए — वही अपर्णा — तथा वही स्थाणु अक्रिय ब्रह्म को भी फलने पर मजबूर कर देती है — बिना पत्ते वाली लता भी फल देती है — यह त्याग का वज्र है —` *_कृपापाङ्गालोकं वितर तरसा साधुचरिते_* *_न ते युक्तोपेक्षा मयि शरणदीक्षामुपगते ।_* *_न चेदिष्टं दयानुतपदमहो कल्पलतिका_* *_विशेषः सामान्यैः कथमितरहस्तैः परिकरैः ॥७॥_* `श्लोकार्थ — हे साधुचरिते , मुझ पर शीघ्र कृपा कटाक्ष का आलोक वितरित करो — तरसा वेग से — मुझ शरणदीक्षा को प्राप्त हुए पर तुम्हारी उपेक्षा युक्त नहीं है —` *_न ते युक्तोपेक्षा_* `— यदि तुम भी यह विचार करोगी कि यह इष्ट है अथवा अनिष्ट , सुपात्र है अथवा कुपात्र , तो कल्पलता में औऱ सामान्य लता में विशेष अंतर क्या रहा — कल्पलता तो बिना परीक्षा के समस्त/सब मनोरथ पूर्ण करती है — वैसे ही तुम भी — तुम्हारे हाथों में जो परिकर कंगन , आयुध आदि हैं — वे सामान्य हाथों के परिकर से कैसे भिन्न हुए —` `भावार्थ — माँ यदि पात्रता देखने लगे , तो वह माँ नहीं , दुकानदार है — कल्पलता यह नहीं देखती कि माँगने वाला राजा है अथवा रंक — वह दे देती है — वैसे ही भवानी — यदि तुम भी परीक्षा लोगी — तो तुम्हारे कल्पवृक्ष होने का क्या अर्थ — यह शरणागत के अधिकार की घोषणा है — शरण में आया , अब परीक्षा नहीं —` `गूढार्थ — कल्पलता व सामान्य लता में भेद — सामान्य लता ऋतु देख कर फल देती है — कल्पलता बिना ऋतु तरसा तुरन्त देती है — वैसे ही भवानी — वह काल , पात्र , विधि नहीं देखती — शरणागत को तत्क्षण दे देती है — यही` *_वाञ्छासमधिकम्_* `है —` *_महान्तं विश्वासं तव चरणपङ्केरुहयुगे_* *_निधायान्यन्नैवाश्रितमिह मया दैवतमुमे ।_* *_तथापि त्वच्चेत्तो यदि भवति न जायेत सदयं_* *_निरालम्बो लम्बोदरजननि कं यामि शरणम् ॥८॥_* `श्लोकार्थ — हे उमे , मैंने तुम्हारे चरण कमल युगल में महान विश्वास का निधान कर के यहाँ किसी अन्य देवता का आश्रय नहीं लिया —` *_निधायान्यन्नैवाश्रितम्_* `— फिर भी यदि तुम्हारा चित्त सदय न हुआ — दयार्द्र न हुआ — तो हे लम्बोदर जननि गणेश जननि निरालम्ब मैं किसकी शरण में जाऊँ —` *_निरालम्बो लम्बोदरजननि कं यामि शरणम् —_* `भावार्थ — यह श्लोक इस अष्टक का हृदय है — मैंने सब देवताओं को छोड़ कर केवल तुम्हारे चरण पकड़े हैं — अब यदि तुम भी न पकड़ो तो मैं कहाँ जाऊँ — यह अनन्यता ही बन्धन का कारण बनती है — जब तक कोई दूसरा आश्रयस्थान है , माँ नहीं मिलती —` `गूढार्थ —` *_निरालम्बो कं यामि_* `यह महावाक्य है — जब तक अन्यद् आश्रितम् है — तब तक माँ नहीं मिलती — जब समस्त/सारे आलम्बन छूट जाते हैं — तभी लम्बोदर जननि मिलती है — लम्बोदर गणेश विघ्न हर्ता का भी जन्म इसी निरालम्बता से होता है —` *_अयःस्पर्शं लब्ध्वा सपदि लभते हेमपदवीं_* *_यथा रथ्यापाथः शुचि भवति गङ्गौघमिलितम् ।_* *_तथा तत्तत्पापैरतिमलिनमन्तर्मम यदि_* *_त्वयि प्रेक्षासक्तं कथमिव न जायेत विमलम् ॥९॥_* `श्लोकार्थ — जैसे लोहा पारस का स्पर्श लब्ध कर के शीघ्र ही सोने के पद को प्राप्त हो जाता है —` *_हेमपदवीं लभते_* `— जैसे रथ्या गली का अपवित्र जल गङ्गा के ओघ में मिलित हो कर पवित्र हो जाता है —` *_शुचि भवति_* `— वैसे ही अनेक पापों से अत्यन्त मलिन मेरा अन्तःकरण यदि तुम्हारी प्रेक्षा दृष्टि में आसक्त हो जाए — लग जाए — तो विमल कैसे न होगा — अवश्य होगा —` `भावार्थ — मन को धोने के लिए गङ्गाजल नहीं , माँ की दृष्टि चाहिए — जैसे लोहा स्वयं को रगड़ कर सोना नहीं बन सकता — उसे पारस चाहिए — वैसे ही पापी मन स्वयं को पवित्र नहीं कर सकता — उसे माँ की एक दृष्टि चाहिए —` *_प्रेक्षासक्तं_* `— दृष्टि में आसक्त होते ही विमल —` `गूढार्थ — यह` *_ऐं ह्रीं क्लीं_* `का समापन है —` *_अयः_* `अर्थात लोहा अर्थात मलिन मन — हेम अर्थात सोना अर्थात विमल मन — स्पर्श अर्थात दृष्टि — पारस अर्थात भवानी की प्रेक्षा —` *_रथ्यापाथः_* `अर्थात नाली का जल अर्थात वासना —` *_गङ्गौघ_* `अर्थात भवानी की करुणा धारा — मिलते ही शुचि — यही दीक्षा है — स्पर्श दीक्षा , दृष्टि दीक्षा —` *_इति प्रायः प्रायः कमलभवनाद्याश्चापि मनसा_* *_ध्यायन्तस्त्वां शान्तां न खलु विदितं तत्त्वममलम् ।_* *_तथापि त्वद्भक्तिं न जहति नितान्तं मुनिगणाः_* *_पिबन्तस्त्वत्पादामृतमिव कृपादुग्धममलम् ॥१०॥_* `श्लोकार्थ — इस प्रकार प्रायः कमल भवन ब्रह्मा आदि भी मन से तुम्हारा शान्ता स्वरूप का ध्यान करते हुए भी तुम्हारे अमल तत्त्व को नहीं जान सके — फिर भी मुनिगण तुम्हारी भक्ति को नितान्त नहीं छोड़ते — क्योंकि वे तुम्हारे पादामृत रूपी कृपा दुग्ध का पान करते हैं —` `भावार्थ — ज्ञान से तत्त्व नहीं मिला , किन्तु भक्ति नहीं छूटी — क्योंकि ज्ञान से तृप्ति नहीं , पयःपान से तृप्ति — माँ का दूध भक्ति ज्ञान — ब्रह्मा भी ध्यान कर के हार गया , पर मुनि भक्ति कर के तृप्त हो गया —` `गूढार्थ — ज्ञान से अज्ञेय , भक्ति से पेय — तत्त्व बुद्धि से नहीं , पयःपान से — यही श्रीविद्या का क्षीर सागर है —` *_न तातो न माता न सखा न बन्धुर्न पुत्रो न पुत्री_* *_न भृत्यो न भर्ता ।_* *_न जाया न विद्या न वृत्तिर्ममैव_* *_गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥११॥_* `श्लोकार्थ — न पिता , न माता , न सखा , न बन्धु , न पुत्र , न पुत्री , न भृत्य सेवक , न भर्ता स्वामी , न जाया पत्नी न विद्या , न वृत्ति आजीविका मेरा कोई नहीं — मेरी गति तुम ही हो — एकमात्र तुम ही हो भवानि —` `भावार्थ — सब नाते झूठे — अन्त में एक ही नाता सच्चा — माँ बेटे का — बाकी सब स्वार्थ के — जब तक स्वार्थ , तब तक नाता — माँ का नाता निःस्वार्थ —` `गूढार्थ —` *_नेति नेति_* `का भक्ति भाष्य —` *_न तातो न माता_* `अर्थात यह नहीं , यह नहीं — सब निषेध के बाद जो बचता है —` *_गतिस्त्वं_* `वही ब्रह्म — यही वेदान्त का पर्यवसान —` *_विवादे विषादे प्रमादे प्रवासे_* *_जले चानले पर्वते शत्रुमध्ये ।_* *_अरण्ये शरण्ये सदा मां प्रपाहि_* *_गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥१२॥_* `श्लोकार्थ — विवाद में , विषाद दुःख में , प्रमाद भूल में , प्रवास परदेश में , जल में , अनल अग्नि में , पर्वत पर , शत्रु के मध्य में , अरण्य जंगल में — हे शरण्ये , सदैव/सदा मेरी रक्षा करो —` *_प्रपाहि —_* `भावार्थ — यह कवच है — जीवन की हर आपत्ति गिना दी — विवाद , विषाद , प्रमाद , प्रवास , जल , अग्नि , पर्वत , शत्रु , जंगल — हर जगह एक ही मन्त्र —` *_गतिस्त्वं_* `— जहाँ जहाँ भय , वहाँ वहाँ माँ —` `गूढार्थ —` *_विवादे विषादे_* `कवच बीज — हर आपत्ति में` *_गतिस्त्वं_* `जप —` *_प्रपाहि_* `अर्थात प्रपत्ति — शरणागति ही रक्षा —` *_अनाथो दरिद्रो जरारोगयुक्तो_* *_महाक्षीणदीनः सदा जाड्यवक्त्रः ।_* *_विपत्तौ प्रविष्टः प्रणष्टः सदाहं_* *_गतिस्त्वं गतिस्त्वं त्वमेका भवानि ॥१३॥_* `श्लोकार्थ — अनाथ जिसका कोई नाथ न हो , दरिद्र धनहीन , जरा रोग से युक्त , महाक्षीण , दीन , सदा जड़ बुद्धि` *_जाड्यवक्त्रः_* `विपत्ति में प्रविष्ट , प्रणष्ट नष्ट प्राय ऐसा मैं — मेरी गति तुम ही हो — एकमात्र तुम ही हो —` `भावार्थ — अपने को अनाथ , दरिद्र , रोगी , जड़ मान लेना ही शरणागति का द्वार है — जब तक मैं समर्थ हूँ है, तब तक माँ नहीं मिलती है — मैं नष्ट हूँ होते ही माँ दौड़ती है — दीनता ही योग्यता है —` `गूढार्थ — दीनता में ही सिद्धि है — जो स्वयं को अनाथ मानता है , वही सनाथ होता है — दरिद्र मानता है , वही ऐश्वर्यवान होता है — यही भवानी की अन्तिम दीक्षा है —` *_॥ सभावार्थ — समग्र ॥_* `भावार्थ 👉🏻 वाणी हारी — चरण जीते — सौभाग्य जीता — त्याग फला — कल्पलता ने बिना परखे दिया — निरालम्ब को गोद मिली — पारस दृष्टि ने पवित्र किया — ज्ञान हारा भक्ति जीती — सब नाते छूटे तो एक बची — भवानि — यही वेदान्त का भक्ति में पर्यवसान है —` *_नेति नेति_* `के बाद` *_गतिस्त्वं_* `— यही भवानी वज्र है —` *_॥ गूढ़ रहस्यम् — सविस्तार ॥_–* `🎯 गूढ़ रहस्य १. 👉🏻` *_भवानि स्तोतुं वाक् स्तम्भ_* — *_चतुर्भिः पञ्चभिः षड्भिः दशशत_* `— चार वेद पाँच मुख छह शास्त्र हजार तर्क — सब मौन —` *_ऐं_* `से वाणी` *_ह्रीं_* `से मौन —` `🎯 गूढ़ रहस्य २. 👉🏻` *_चरणावेव निपुणौ_* `— हाथ माया चरण ब्रह्म — वर अभय अभिनय — असली कृपा चरणों में — गुरु चरण माँ चरण — वही निपुण — वही पार करते हैं —` `🎯 गूढ़ रहस्य ३. 👉🏻` *_सौभाग्यमहिमा सौः_* `—` *_सौः_* `ही सौभाग्य — शिव में इ जोड़ो तो शिव — इ हटाओ तो शव — इ ही भवानी — रति से कामदेव विजयी भवानी से शिव ऐश्वर्यवान —` `🎯 गूढ़ रहस्य ४ 👉🏻` *_अपर्णा सेव्या_*`— अ से पर्णा — पर्ण अर्थात पत्ता अन्न गुण आश्रय — सब आश्रय त्याग — वही अपर्णा — वही स्थाणु अक्रिय ब्रह्म को भी फलने पर मजबूर करती है — त्याग वज्र —` `🎯 गूढ़ रहस्य ५. 👉🏻` *_कल्पलतिका विशेष_* `— सामान्य लता ऋतु देख कर फल देती है — कल्पलता बिना ऋतु तुरन्त फ़ल देती है — भवानी काल पात्र विधि नहीं देखती — शरणागत तत्क्षण —` `🎯 गूढ़ रहस्य ६. 👉🏻` *_निरालम्बो कं यामि_* `— जब तक अन्यद् आश्रितम् है तब तक माँ नहीं — सारे आलम्बन छूटें तभी लम्बोदर जननि — अनन्यता ही बन्धन है —` `🎯 गूढ़ रहस्य ७. 👉🏻` *_अयःस्पर्शं वज्र_* `— लोहा पारस स्पर्श —` *_रथ्यापाथः गङ्गौघ_* `— मलिन मन भवानी प्रेक्षा — दृष्टि दीक्षा स्पर्श दीक्षा —` `🎯 गूढ़ रहस्य ८. 👉🏻` *_गतिस्त्वं कवच — न तातो न माता नेति नेति — विवादे विषादे प्रमादे प्रवासे_* `— हर भय में एक मन्त्र —` *_गतिस्त्वं — प्रपाहि प्रपत्ति_* `— दीनता सिद्धि — अनाथ ही सनाथ —` `जय भवानी🚩` `जय चरणावेव निपुणौ🚩` `जय सौभाग्यमहिमा🚩` `जय अपर्णा🚩` `जय कल्पलतिका🚩` `जय निरालम्बो🚩` `जय अयःस्पर्शं🚩` `जय गतिस्त्वं🚩` `ॐ दुं दुर्गायै नमः 🚩` `जय माँ आदिशक्ति🙏🏻🚩` `जय माँ भगवती🙏🏻❤️🚩` `ललिताम्बिकायै नमः🌺` `श्रीविद्यायै नमः🌸` `त्रिपुरसुन्दर्यै नमः🌹` `श्रीमात्रे नमः🚩` `श्रीगौर्यै नमः🚩` `श्रीअन्नपूर्णायै नमः🚩` `श्रीशिवायै नमः🚩` `श्रीअम्बिकायै नमः🚩` `श्रीदुर्गापरमेश्वर्यै नमः🚩` `नमश्चण्डिकायै🚩` `श्रीदक्षिणामूर्तये नमः🚩` `शिव शिव शिव शिव शिव🚩` `जय जय शङ्कर🚩` `हर हर शङ्कर🚩` `~सर्वज्ञ शङ्कर🚩` `🌄🌆 प्रभात वन्दन 🌆🌄` `© सर्वाधिकार सुरक्षित । सर्वज्ञ शङ्कर🚩 चैनल` `#प्रभात_वन्दन` `#आदिशङ्कर_कृत_भवानी_स्तुति` `#त्रयोदश_श्लोकी` `#भवानि_स्तोतुं_त्वां` `#चरणावेव_निपुणौ` `#सौभाग्यमहिमा` `#अपर्णा_सेव्या` `#कल्पलतिका` `#निरालम्बो_कं_यामि` `#अयःस्पर्शं_वज्र` `#गतिस्त्वं_गतिस्त्वं_त्वमेका_भवानि` `#विवादे_विषादे_कवच` `#अनाथो_दरिद्रो` `#वज्र_वेदान्त` `#श्रीविद्या_रहस्य` `#ह्रीं_बीज` `#सर्वज्ञ_शङ्कर🚩` `#आदिअनादि_अनन्तशिवहर🔱`
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