sn vyas
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#जय शनिदेव *॥ पद्म पुराणोक्त श्रीदशरथकृत शनि स्तोत्र – २२ श्लोक सम्पूर्ण पाठ ॥* *नमः कृष्णाय नीलाय , शिति कण्ठ निभाय च ।* *नमो नील मयूखाय , नीलोत्पल निभाय च ॥१॥* `अर्थात 👉🏻 काले , नीले , शिव के समान नीलकण्ठ वाले , नीलमणि एवं नीलकमल के समान शनि को नमस्कार ।` *नमो निर्मांस देहाय , दीर्घश्मश्रु जटाय च ।* *नमो विशाल नेत्राय, स्थूल रोम्णे नमो नमः॥२॥* `अर्थात 👉🏻 मांसरहित कृश शरीर वाले , लंबी दाढ़ी-जटा वाले , विशाल नेत्र तथा मोटे रोम वाले को नमस्कार ।` *नमो दीर्घाय शुष्काय , कालदंष्ट्र नमोऽस्तुते ।* *नमस्ते कोटरस्थाय, दुर्निरीक्ष्याय ते नमः ॥३॥* `अर्थात 👉🏻 लंबे-सूखे शरीर वाले , काल के समान दाढ़ वाले , गड्ढे में धँसी आँख वाले , कठिनता से दिखने वाले को नमस्कार ।` *नमो घोराय रौद्राय , भीषणाय करालिने ।* *नमस्ते सर्व भक्ष्याय, बली मुख नमोऽस्तुते ॥४॥* `अर्थात 👉🏻 घोर , रौद्र , भीषण , विकराल रूप वाले औऱ सब कर्मों का फल भक्षण कराने वाले , वानर समान मुख वाले को नमस्कार ।` *सूर्यपुत्र नमस्तेऽस्तु , सर्वातर्क्य नमोऽस्तुते ।* *नमः कालाग्नि रुद्राय, कृतान्ताय च वै नमः॥५॥* `अर्थात 👉🏻 सूर्यपुत्र , तर्क से परे , कालाग्नि रुद्र एवं यमस्वरूप कृतान्त को नमस्कार ।` *नमो मन्दगते तुभ्यं , निस्त्रिंशाय नमो नमः ।* *तपसा दग्ध देहाय , नित्यं योगरताय च ॥६॥* `अर्थात 👉🏻 मंद गति वाले , तलवार समान तीक्ष्ण , तप से जले शरीर वाले , सदा योग में लीन को नमस्कार ।` *ज्ञानचक्षुर्नमस्तेऽस्तु , कश्यपात्मज सूनवे ।* *तुष्टो ददासि वै राज्यं , रुष्टो वै हरसि क्षणात् ॥७॥* `अर्थात 👉🏻 ज्ञाननेत्र वाले , कश्यप पुत्र सूर्य के पुत्र , तुष्ट होने पर राज्य देने वाले तथा रुष्ट होने पर क्षण में राज्य हरने वाले ।` *देवासुर मनुष्याश्च सिद्ध विद्याधरोरगाः ।* *त्वया विलोकिताः सर्वे , दैन्यमाशु व्रजन्ति ते ॥८॥* `अर्थात 👉🏻 देव-असुर-मनुष्य-सिद्ध-विद्याधर-नाग सभी आपकी दृष्टि पड़ते ही दीन हो जाते हैं ।` *ब्रह्मा शक्रो मनु श्र्वैव , ऋषयः सप्त तारकाः।* *भ्रष्टराज्याः पतन्त्येते तव दृष्ट्यावलोकिताः ॥९॥* `अर्थात 👉🏻 ब्रह्मा , इन्द्र , मनु , सप्तर्षि औऱ तारा मंडल भी आपकी दृष्टि से राज्यभ्रष्ट होकर गिर जाते हैं ।` *देशा श्च नगरग्रामाः , दिश श्चैव द्रुमास्तथा ।* *त्वया विलोकिताः सर्वे , नाशं यान्ति समूलतः ॥१०॥* `अर्थात 👉🏻 देश-नगर-गाँव-दिशा-वृक्ष सभी आपकी दृष्टि से समूल नष्ट हो जाते हैं ।` *प्रसादं कुरु मे सौरे , वरार्थं तव संस्थितः ।* *एवं स्तुत स्तदा सौरिर्ग्रहराजो महाबलः ॥११॥* `अर्थात 👉🏻 हे सौरि मुझ पर कृपा करो , मैं वर के लिए आपके समक्ष/सामने खड़ा हूँ – इस प्रकार स्तुति से महाबली ग्रहराज प्रसन्न हुए ।` *तुष्टोऽहं तव राजेन्द्र , स्तवेनानेन मानद ।* *वरं ब्रूहि प्रदास्यामि , स्वेच्छया रघुनन्दन ॥१२॥* `अर्थात 👉🏻 शनि बोले – हे राजेन्द्र रघुनन्दन , तुम्हारी स्तुति से प्रसन्न हूँ , मनचाहा वर माँगो मैं दूँगा ।` *प्रसन्नस्त्वं यदा सौरे , वरं देहि ममेप्सितम् ।* *अद्य प्रभृति सौरे ते , पीडा कार्या न कस्यचित् ॥१३॥* `अर्थात 👉🏻 दशरथ बोले – यदि आप प्रसन्न हो तो वर दो कि आज से किसी को भी पीड़ा नहीं दोगे ।` *ग्रहाणां स ग्रहो जेयो , यस्तु पीडाकरः स्मृतः ।* *अदेयो हि यस्तु , तुभ्यं चैव ददामि तमम् ॥१४॥* `अर्थात 👉🏻 शनि बोले – ग्रहों में जो पीडाकर ग्रह माना जाता है , वह अजेय वर तुम्हें देता हूँ ।` *त्वया प्रोक्तं च मे स्तोत्रं , यः पठिष्यति मानवः ।* *एककालं द्विकालं वा , पीडा मुंचामि तस्य वै ॥१५॥* `अर्थात 👉🏻 तुमने जो मेरा स्तोत्र कहा है , जो मनुष्य एक बार अथवा दो बार भी इसे पढ़ेगा मैं उसकी पीड़ा हर लूँगा ।` *देवासुर मनुष्याणां , सिद्ध विद्याधर राक्षसाम् ।* *मृत्युस्थान स्थितो वापि , जन्मस्थानगतोपि वा ॥१६॥* `अर्थात 👉🏻 देव-असुर-मनुष्य आदि की कुंडली में मृत्यु स्थान (८वाँ) या जन्म स्थान में स्थित होने पर भी ।` *यः पुनः श्रद्धया युक्तः , शुचिः स्नातः समाहितः ।* *भक्त्योपचारैः सम्पूज्य प्रतिमां लोहजां मम ॥१७॥* `अर्थात 👉🏻 जो मनुष्य श्रद्धायुक्त होकर , पवित्र होकर स्नान कर , मन को एकाग्र कर भक्ति के उपचारों से मेरी लोहे की प्रतिमा की पूजा करेगा ।` *मद्धिने तु विशेषेण , स्तोत्रेणानेन पूजयेत् ।* *पूजयित्वा जपः स्तोत्रं;, भूत्वा चैव कृतांजलिः ॥१८॥* `अर्थात 👉🏻 विशेषरूप से शनिवार के दिन इस स्तोत्र से मेरी पूजा करे , पूजा करके हाथ जोड़कर इस स्तोत्र का जप करे ।` *माषौदनं तिलैर्मिश्र , दद्यात् लोहं च दक्षिणाम् ।* *कृष्णांगां वृषभं वापि, दद्याद् विप्राय धीमते ॥१९॥* `अर्थात 👉🏻 उड़द-चावल का भात तिल मिलाकर , लोहा दक्षिणा में दे तथा काला बैल बुद्धिमान ब्राह्मण को दान दे ।` *तस्य पीडा न चैवाहं , करिष्यामि कदाचन ।* *गोचरे जन्मलग्ने वा , दशास्वन्तर्दशासु च ॥२०॥* `अर्थात 👉🏻 तो मैं गोचर में , जन्म लग्न में , महादशा-अन्तर्दशा में भी कभी उसको पीड़ित नहीं करूँगा ।` *रक्षामि सततं तस्य , पीडा मन्यग्रहैः कृताम् ।* *अनेनैव विधानने पीडामुक्तं जगद् भवेत् ॥२१॥* `अर्थात 👉🏻 अन्य ग्रहों की पीड़ा से भी सदैव रक्षा करूँगा , इस विधान से समस्त जगत पीड़ा से मुक्त हो जाएगा ।` *वरद्वयं तु सम्प्राप्य राजा दशरथ स्तदा ।* *स्वस्थानं च ततो गत्वा , प्राप्त कामोऽभवन्नृपः ॥२२॥* `अर्थात 👉🏻 दो वर प्राप्त करके राजा दशरथ अपने स्थान को गए औऱ उनकी मनोकामना पूर्ण हुई ।` *जय शनिदेव महाराज* *ॐ शं शनैश्चराय नमः* `हर हर शङ्कर🚩` `जय जय शङ्कर🚩` `~सर्वज्ञ शङ्कर🚩` `🌄🌄 प्रभात वन्दन 🌄🌄` `© सर्वाधिकार सुरक्षित । सर्वज्ञ शङ्कर🚩 चैनल` `#शनिवार` `#शनिदोष_निवारण` `#सर्वज्ञ_शङ्कर` `#प्रभात_वंदन` `#दशरथकृतशनिस्तोत्र` `#शनिस्तोत्र_२२श्लोक` `#शनिवारविशेष` `#शनिदेव` `#साढ़ेसाती_उपाय` `#नवग्रह_शांति`
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