sn vyas
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#रामचरितमानस #🌺 श्री रामचरितमानस चौपाई 🌺 #रामचरितमानस चौपाई त्रेतायुग का समय था। वनवास के दिनों में श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण पंचवटी के सुंदर वन में एक कुटिया बनाकर रह रहे थे। चारों ओर घना जंगल था, पेड़ों पर पक्षियों की मधुर आवाजें सुनाई देती थीं और गोदावरी नदी की धारा वातावरण को शांत बनाए रखती थी। लेकिन उसी वन में एक ऐसा षड्यंत्र जन्म ले चुका था, जो आगे चलकर पूरी रामायण की दिशा बदलने वाला था। लंकापति रावण ने छलपूर्वक माता सीता का हरण करने की योजना बनाई और अवसर पाकर वह माता सीता को अपने साथ आकाश मार्ग से लंका की ओर ले जाने लगा। माता सीता लगातार श्रीराम और लक्ष्मण को पुकार रही थीं और रावण से उन्हें छोड़ देने की प्रार्थना कर रही थीं, लेकिन रावण अपने अहंकार में डूबा हुआ था। उसे लगता था कि अब उसे रोकने वाला कोई नहीं है। रावण आकाश मार्ग से आगे बढ़ ही रहा था कि अचानक उसकी गति को किसी ने चुनौती दी। एक विशाल पक्षी आकाश में उसके सामने आकर खड़ा हो गया। उसके पंख वृद्धावस्था के कारण पहले जैसे शक्तिशाली नहीं थे, शरीर भी कमजोर हो चुका था, लेकिन उसकी आंखों में अद्भुत तेज था। वह थे पक्षीराज जटायु। जटायु कोई साधारण पक्षी नहीं थे। वे अरुणदेव के पुत्र और संपाति के भाई थे तथा उनका संबंध अयोध्या के महाराज दशरथ से भी था। वृद्ध होने के बावजूद उनके हृदय में धर्म और साहस की शक्ति आज भी उतनी ही प्रबल थी। जैसे ही उनकी नजर माता सीता पर पड़ी, उन्हें समझते देर नहीं लगी कि रावण कोई साधारण यात्रा नहीं कर रहा, बल्कि अधर्मपूर्वक माता सीता को अपने साथ ले जा रहा है। जटायु ने रावण का मार्ग रोकते हुए गर्जना की, हे रावण, ठहर जा। तू कौन है और इस देवी को इस प्रकार बलपूर्वक कहां लेकर जा रहा है? माता सीता ने जटायु को देखा तो उनके भीतर आशा की एक किरण जाग उठी। उन्होंने कहा, हे पक्षीराज, मैं अयोध्या के श्रीराम की पत्नी सीता हूं। यह राक्षसराज रावण छलपूर्वक मेरा हरण करके मुझे लंका ले जा रहा है। यदि तुम श्रीराम को जानते हो तो मेरी रक्षा करो। जटायु ने माता सीता को आश्वासन देते हुए कहा, माता, जब तक मेरे शरीर में प्राण हैं, मैं आपको इस अधर्मी के हाथों नहीं जाने दूंगा। रावण ने जटायु की बात सुनकर उपहास किया और कहा, वृद्ध पक्षी, अपनी आयु देख। तू मेरा मार्ग रोकने का साहस कैसे कर रहा है? मैं लंका का राजा रावण हूं। मेरे सामने बड़े-बड़े योद्धा टिक नहीं पाते और तू मुझे रोकने चला है। जटायु ने रावण के अहंकार का उत्तर देते हुए कहा, रावण, शक्ति का घमंड करने से कोई महान नहीं बन जाता। सच्ची शक्ति वही है जिसका उपयोग धर्म की रक्षा के लिए किया जाए। किसी दूसरे की पत्नी का हरण करना वीरता नहीं, अधर्म है। यदि तुझमें थोड़ा भी साहस है तो माता सीता को यहीं छोड़ दे और वापस लौट जा। रावण क्रोध से भर उठा। उसने जटायु को हटने का आदेश दिया, लेकिन जटायु तनिक भी पीछे नहीं हटे। उन्होंने कहा, मैं जानता हूं कि मैं वृद्ध हूं। मैं यह भी जानता हूं कि तुम शक्तिशाली हो। लेकिन मेरे सामने आज मेरी आयु नहीं, मेरा धर्म खड़ा है। मैं अपनी आंखों के सामने माता सीता को अधर्म के हाथों जाते हुए नहीं देख सकता। इसके बाद आकाश में रावण और जटायु के बीच भयंकर संघर्ष शुरू हो गया। रावण ने अपने अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग किया, लेकिन जटायु ने अद्भुत पराक्रम दिखाते हुए उसका सामना किया। उन्होंने रावण के रथ को रोकने का प्रयास किया और उसके मार्ग में बार-बार बाधा डाली। जटायु ने अपने विशाल पंखों से ऐसा प्रहार किया कि रावण को कुछ समय के लिए संभलना मुश्किल हो गया। माता सीता यह दृश्य देखकर आशा से भर उठीं। उन्हें लगा कि शायद जटायु उन्हें रावण के चंगुल से बचा लेंगे। जटायु ने पूरी शक्ति से युद्ध किया और रावण के रथ को भारी क्षति पहुंचाई। रावण के घोड़े और रथ अस्त-व्यस्त हो गए और कुछ समय के लिए उसका मार्ग रुक गया। लेकिन रावण भी अत्यंत शक्तिशाली योद्धा था। उसने क्रोध में आकर जटायु पर लगातार प्रहार किए। वृद्ध शरीर होने के कारण जटायु धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगे, फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी। उनके मन में केवल एक ही विचार था कि किसी भी कीमत पर माता सीता की रक्षा करनी है। रावण ने अंततः एक शक्तिशाली अस्त्र से जटायु को गंभीर रूप से घायल कर दिया। जटायु धरती की ओर गिरने लगे। माता सीता की आंखों से आंसू बहने लगे। उन्होंने जटायु को देखकर कहा, हे पक्षीराज, आपने मेरे लिए अपने प्राणों की चिंता तक नहीं की। कृपया श्रीराम को मेरे बारे में अवश्य बताइएगा। जटायु ने अपनी बची हुई शक्ति से माता सीता को आश्वासन दिया कि वे श्रीराम तक यह संदेश पहुंचाने का प्रयास करेंगे। रावण माता सीता को लेकर आगे बढ़ गया और कुछ ही समय बाद उसकी आंखों से जटायु ओझल हो गए। लेकिन जटायु का शरीर धरती पर पड़ा था और उनके भीतर अभी भी प्राण शेष थे। वह जानते थे कि शायद उनका समय पूरा होने वाला है, लेकिन उनके मन में एक ही इच्छा थी कि श्रीराम को माता सीता के बारे में बता दें। वह वहीं पड़े-पड़े श्रीराम के आने की प्रतीक्षा करने लगे। उधर पंचवटी में लौटकर श्रीराम और लक्ष्मण ने जब माता सीता को कुटिया में नहीं पाया तो दोनों उन्हें खोजने के लिए वन में निकल पड़े। श्रीराम की चिंता बढ़ती जा रही थी। वे पेड़ों, लताओं, नदियों और वन के जीव-जंतुओं से माता सीता के बारे में पूछते हुए आगे बढ़ रहे थे। कुछ दूर जाने पर उन्हें वन में संघर्ष के चिन्ह दिखाई दिए। टूटा हुआ रथ, बिखरे हुए अस्त्र और धरती पर पड़े पंखों को देखकर श्रीराम समझ गए कि यहां कोई भयंकर संघर्ष हुआ है। आगे बढ़ने पर उनकी नजर एक विशाल घायल पक्षी पर पड़ी। श्रीराम ने पहले सोचा कि शायद यही कोई ऐसा प्राणी है जिसने माता सीता के साथ कुछ किया हो, लेकिन जब जटायु ने श्रीराम का नाम लिया तो सब कुछ स्पष्ट हो गया। जटायु ने कमजोर आवाज में कहा, राम... मैं जटायु हूं। श्रीराम तुरंत उनके पास बैठ गए। उन्होंने जटायु का सिर अपने हाथों में लिया और पूछा, हे पक्षीराज, माता सीता कहां हैं? किसने उन्हें यहां से ले गया? जटायु ने अपनी अंतिम शक्ति जुटाई और कहा, राम, रावण... लंका का राजा रावण माता सीता का हरण करके ले गया है। वह उन्हें दक्षिण दिशा की ओर लेकर गया है। मैंने उसे रोकने का पूरा प्रयास किया। मैंने उसके रथ को रोका और माता सीता को बचाने के लिए उससे युद्ध किया, लेकिन मेरी आयु और शरीर ने मेरा साथ नहीं दिया। श्रीराम की आंखों में आंसू आ गए। उन्होंने जटायु को अपनी गोद में उठा लिया और कहा, हे तात, आपने माता सीता की रक्षा के लिए जो किया है, वह संसार में कोई साधारण कार्य नहीं है। आपने अपने प्राणों की चिंता किए बिना धर्म के लिए युद्ध किया। आप मेरे लिए पिता के समान हैं। जटायु ने श्रीराम की ओर देखा। उनके चेहरे पर संतोष था। उन्होंने कहा, प्रभु, मुझे दुख केवल इस बात का है कि मैं माता सीता को बचा नहीं पाया। श्रीराम ने तुरंत कहा, नहीं तात, ऐसा मत कहिए। आपने अपना कर्तव्य पूरी निष्ठा से निभाया है। जिस समय संसार में कोई भी वहां नहीं था, उस समय आपने अकेले रावण का सामना किया। माता सीता की रक्षा के लिए आपने अपने प्राणों की बाजी लगा दी। आपके इस त्याग को मैं कभी नहीं भूल सकता। जटायु की आंखों में आंसू आ गए। उन्होंने श्रीराम का नाम लिया और उनकी गोद में ही अपने प्राण त्याग दिए। जटायु के प्राण निकलते ही वन का वातावरण जैसे शांत हो गया। श्रीराम कुछ क्षण तक उन्हें अपनी गोद में लिए बैठे रहे। उनकी आंखों से आंसू बह रहे थे। लक्ष्मण भी यह दृश्य देखकर भावुक हो गए। श्रीराम ने कहा, लक्ष्मण, आज मैंने अपने पिता के समान एक प्रियजन को खो दिया है। जटायु ने मेरे लिए वह किया जो शायद कोई अपना भी न कर पाता। उन्होंने मेरे परिवार की रक्षा के लिए अपने प्राण दे दिए। इसके बाद श्रीराम ने स्वयं जटायु का अंतिम संस्कार करने का निर्णय लिया। उन्होंने उन्हें वही सम्मान दिया जो एक पुत्र अपने पिता को देता है। श्रीराम के हाथों से जटायु का अंतिम संस्कार हुआ और उन्होंने उन्हें भावपूर्ण श्रद्धांजलि दी। जटायु की कथा केवल एक पक्षी और एक राक्षस के युद्ध की कथा नहीं है। यह उस साहस की कथा है जिसमें जीत से अधिक महत्वपूर्ण कर्तव्य होता है। जटायु जानते थे कि रावण उनसे कहीं अधिक शक्तिशाली है। वे यह भी जानते थे कि उनकी आयु बहुत अधिक हो चुकी है और उनका शरीर पहले जैसा बलवान नहीं रहा। फिर भी जब उन्होंने माता सीता को संकट में देखा तो उन्होंने अपनी जान की परवाह नहीं की। उन्होंने यह नहीं सोचा कि मैं जीत पाऊंगा या नहीं। उन्होंने केवल यह सोचा कि मेरे सामने अधर्म हो रहा है और मुझे इसे रोकने का प्रयास करना ही होगा। यही कारण है कि श्रीराम ने जटायु को केवल एक पक्षी नहीं माना। उन्होंने उन्हें पिता के समान सम्मान दिया। जटायु ने अपने जीवन के अंतिम क्षणों में यह सिद्ध कर दिया कि धर्म की रक्षा करने के लिए शरीर की शक्ति नहीं, बल्कि मन का साहस आवश्यक होता है। उनका शरीर वृद्ध था, लेकिन उनका हृदय किसी महान योद्धा से कम नहीं था। उन्होंने अपने प्राण देकर यह संदेश दिया कि जब किसी निर्दोष पर संकट आए तो अपनी सामर्थ्य के अनुसार उसके लिए खड़ा होना ही सच्चा धर्म है। जटायु की कहानी हमें यह भी सिखाती है कि भगवान के भक्त के लिए केवल पूजा और प्रार्थना ही पर्याप्त नहीं होती। जब धर्म और सत्य की रक्षा का समय आए, तब अपने कर्मों से भी धर्म का साथ देना पड़ता है। जटायु ने श्रीराम का नाम केवल सुना नहीं था, उन्होंने श्रीराम के परिवार की रक्षा करने के लिए अपने जीवन का अंतिम क्षण तक उपयोग किया। इसलिए श्रीराम ने भी उनके त्याग को अपने हृदय में स्थान दिया। रावण माता सीता को लंका ले जाने में सफल हो गया, लेकिन जटायु का साहस अधर्म के सामने अमर हो गया। आज भी जब रामायण में जटायु का नाम लिया जाता है तो उनके साथ केवल एक पक्षी की छवि नहीं आती, बल्कि त्याग, साहस, निष्ठा और धर्म की रक्षा की भावना सामने आती है। जटायु ने यह दिखा दिया कि उम्र चाहे कितनी भी हो, परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन हों और सामने वाला कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, यदि सामने अन्याय हो तो सत्य के पक्ष में खड़ा होना ही सबसे बड़ा पराक्रम है। उन्होंने माता सीता को बचाने के लिए अपने प्राणों की आहुति दे दी और बदले में श्रीराम की गोद में अंतिम सांस लेकर ऐसा सम्मान पाया जिसे युगों तक याद किया जाएगा। इसलिए जटायु केवल रामायण के एक पात्र नहीं हैं, बल्कि धर्म के लिए अपना सर्वस्व समर्पित करने वाले अमर वीर हैं। जय श्रीराम।
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