sn vyas
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#श्री राधे #जय श्री राधे ब्रह्मवैवर्त पुराण के प्रकृतिखंड में वर्णित देवी राधा के अलौकिक प्रभाव और चमत्कार की एक और अत्यंत पावन कथा: असुरराज बाणासुर का गर्व-भंग और राधा रानी का अभय वरदान भगवान शिव के परम भक्त बाणासुर को अपनी सहस्र (हजार) भुजाओं और अतुलित बल पर अत्यंत अहंकार हो गया था। वह अपनी भुजाओं की खुजली मिटाने के लिए ऐसा युद्ध चाहता था जिसमें कोई उसे पराजित न कर सके। एक बार अपनी शक्ति के घमंड में बाणासुर गोलोक के निकट जा पहुँचा और वहाँ के अलौकिक वातावरण को चुनौती देने लगा। देवी राधा का अलौकिक चमत्कार: सहस्र भुजाओं का स्तंभन (निश्चल होना): बाणासुर जैसे ही गोलोक की सीमा में अधर्म पूर्वक प्रवेश करने लगा, भगवती राधा की केवल एक टेढ़ी भृकुटी (भौंहों) के संकेत मात्र से बाणासुर की सभी हजार भुजाएँ एक पल में सुन्न और शक्तिहीन होकर जम गईं। उसका पूरा शरीर एक ही स्थान पर कील की भांति स्थिर (स्तंभित) हो गया। महा-तेज का प्रकटीकरण: बाणासुर को अनुभव हुआ कि उसके ऊपर करोड़ों पर्वतों का भार आ पड़ा है। उसने देखा कि सामने साक्षात आद्याशक्ति राधा रानी अत्यंत दिव्य प्रकाश के साथ विराजमान हैं। उनके तेज मात्र से बाणासुर के मन का सारा अहंकार और युद्ध का मद क्षण भर में भस्म हो गया। महामृत्युंजय ज्ञान और अभय दान: जब बाणासुर ने अपनी भूल स्वीकार करते हुए देवी राधा की अनन्य स्तुति की, तो राधा रानी का हृदय करुणा से भर गया। उन्होंने अपनी कृपादृष्टि से उसे पुनः शक्ति प्रदान की और ज्ञान दिया कि वास्तविक शक्ति दूसरों को पराजित करने में नहीं, बल्कि भक्ति और धर्म के पालन में है। प्रकृतिखंड की यह कथा दर्शाती है कि देवी राधा का एक मामूली संकेत भी बड़े से बड़े बलशाली के अभिमान को छिन्न-भिन्न कर सकता है, और उनकी शरण में आने वाले को वे तत्काल क्षमा और अभय का दान देती हैं।
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