sn vyas
#श्रीरामचरितमानस चोपाई #श्रीरामचरितमानस 🪷 #जय श्री राम #रामायण ज्ञान #रामायण चौपाई
यह चौपाई हमें सिखाती है कि जीवन की वास्तविक संपन्नता और शांति धन-दौलत में नहीं, बल्कि ईश्वर के प्रति निष्काम भक्ति और समर्पण में है।
प्रभु चरणों में प्रीति होते ही मन के सारे विकार दूर हो जाते हैं और जीवन में परम आनंद व शांति का आगमन होता है।
ईश्वर से विमुख व्यक्ति सदैव अपनी इच्छाओं और वासनाओं का दास बना रहता है। वह संसार के सामने हाथ फैलाता है और भीतर से स्वयं को हमेशा अधूरा तथा असहाय महसूस करता है।
सांसारिक सुख क्षणिक होते हैं। भौतिक वस्तुएँ मिलने पर खोने का भय और न मिलने पर असंतोष रहता है। इसलिए प्रभु प्रेम से वंचित व्यक्ति मानसिक और आत्मिक रूप से निरंतर दुखी रहता है।
तुलसीदास जी समझाते हैं कि ईश्वर के चरण ही जीव के लिए अंतिम आश्रय हैं। जब तक जीव संसार के नश्वर पदार्थों, धन, पद और मान-सम्मान में सुख खोजता रहता है, तब तक उसे स्थायी शांति नहीं मिलती। सच्चा और अक्षय आनंद केवल ईश्वर के चरणों की भक्ति में ही निहित है।
अति दीन मलीन दुखी नितहीं।
जिन्ह कें पद पंकज प्रीति नहीं॥
अवलंब भवंत कथा जिन्ह कें।
प्रिय संत अनंत सदा तिन्ह कें॥
भावार्थ
जिन्हें आपके चरणकमलों में प्रीति नहीं है वे नित्य ही अत्यंत दीन, मलिन (उदास) और दुःखी रहते हैं और जिन्हें आपकी लीला कथा का आधार है, उनको संत और भगवान सदा प्रिय लगने लगते हैं॥