sn vyas
🙏🙏🛐ॐ श्री परमात्मने नमः🛐🙏🙏
🙏कर्म का सिद्धांत पुस्तक से 🙏
#भाग_३९/३
मुझे कर्म भी नहीं करना है और फल भी नहीं भोगना है:
*गतांक से आगे*
*कोटी ब्रह्मांड के मालिक भगवान अर्जुन के रथ के घोड़ों की लगाम हाथ में लेकर उसका रथ खींचते हैं । अर्जुन की सेवा करते हैं।*
*पूरे दिन युद्ध के बाद जब थका हुआ अर्जुन रात को आराम करता था , तब जगत के मालिक भगवान श्री कृष्ण पूरी रात मजदूरी करते थे । वे घोड़ों के शरीर में लगे वाणो को संभाल कर बाहर निकालते थे, गर्म पानी से घोड़ों के घाव धोकर उन्हें खरारा करके नहलाते थे और घोड़ों को ठंडा जल पिलाकर उनकी थकावट दूर करते थे । जगत के मालिक अपने पीतांबर से चारा लाकर घोड़ों को खिलाते थे ।*
*ऐसे योगीश्वर और महान कर्म योगी श्री कृष्ण जगत और समाज को आज्ञा देते हैं कि---*
*योगस्थ: कुरु कर्माणि, संगं त्यक्त्वा धनंजय।*
*सिद्धयसिद्धयो: समो भूत्वा, समत्वं योग उच्यते ॥*
*हे जीव ,, तू योगस्थ बनकर कर्म कर । फल की आसक्ति को छोड़कर कर्म कर , और कर्म का फल तेरी धारणा के अनुसार आए अथवा ना आए,,, उसकी चिंता छोड़ कर मन की स्थिरता पूर्वक तू निष्काम भाव से कर्म कर। क्योंकि ,,,, मन की स्थिरता-- समत्व को बनाए रखने का नाम ही योग है ।*
*समत्वं योग उच्यते ।*
*"योग "अर्थात "समत्व "। भगवान ने ऐसी अलौकिक परिभाषा जगत और समाज को दी है । इसे ठीक से समझना चाहिए ।*
विश्राम
क्रमश: ✍🏽
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