sn vyas
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#🕉️सनातन धर्म🚩 #☝अनमोल ज्ञान
🌺 भूदेवी — स्वयं पृथ्वी का दिव्य स्वरूप 🌺
भूदेवी अर्थात् भूमि देवी या पृथ्वी माता। सनातन परंपरा में उन्हें उस दिव्य शक्ति के रूप में माना जाता है, जो समस्त जीव-जगत को धारण करती हैं। वे अन्न, वनस्पति, औषधि, रत्न, जल और जीवन के अनेक आधारों की अधिष्ठात्री शक्ति मानी जाती हैं।
भगवान वराह और भूदेवी का संबंध विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। वराह अवतार में भगवान विष्णु ने पृथ्वी को आदिम जलराशि से ऊपर उठाकर पुनः स्थापित किया। इसी कारण भूदेवी को भगवान वराह की दिव्य सहचरी के रूप में भी पूजा जाता है।
चित्र में उद्धृत परंपरा के अनुसार भगवान नारायण ने देवर्षि नारद को बताया कि भगवती भूदेवी की सर्वप्रथम पूजा स्वयं भगवान वराह ने की थी। इसके बाद उनकी आराधना भगवान ब्रह्मा, मुनियों, देवताओं, मनुओं और मनुष्यों द्वारा की गई।
भूदेवी के ध्यान का जो भाव दिया गया है, उसमें उन्हें—
🌸 मंद-मुस्कान से सुशोभित
🌸 तीनों लोकों द्वारा पूजित
🌸 श्वेत कमल के समान उज्ज्वल वर्ण वाली
🌸 शरद् पूर्णिमा के चंद्रमा के समान सुंदर मुख वाली
🌸 समस्त रत्नों एवं मणियों की मूल स्रोत
🌸 बहुमूल्य रत्नों और मोतियों को अपने गर्भ में धारण करने वाली
🌸 पवित्र एवं निर्मल वस्त्र धारण करने वाली देवी
के रूप में वर्णित किया गया है।
🌺 भूदेवी के आठ दिव्य भाव 🌺
१. धारणाशक्ति — समस्त प्राणियों को धारण करने वाली।
२. अन्नशक्ति — अन्न, फल और वनस्पति प्रदान करने वाली।
३. औषधिशक्ति — औषधियों और जीवनोपयोगी वनस्पतियों का आधार।
४. रत्नशक्ति — पृथ्वी के गर्भ में स्थित मणि-माणिक्यों की अधिष्ठात्री।
५. धैर्यशक्ति — सहनशीलता, स्थिरता और धैर्य की प्रतीक।
६. समृद्धिशक्ति — कृषि, धन-धान्य और समृद्धि का आधार।
७. मातृशक्ति — समस्त जीवों का पालन करने वाली जगन्माता।
८. जीवनशक्ति — सम्पूर्ण चराचर जगत के जीवन का आधार।
🌺 श्री भूदेवी अष्टकम् 🌺
श्वेताम्भोजसमप्रख्यां, शरच्चन्द्रनिभाननाम्।
रत्नगर्भां विशालाक्षीं, भूदेवीं प्रणमाम्यहम्॥१॥
सर्वलोकधरीं देवीं, सर्वजीवैकमातरम्।
अन्नदां धैर्यदां नित्यं, भूदेवीं प्रणमाम्यहम्॥२॥
वसुधां वसुधाधारां, रत्नमाणिक्यभूषिताम्।
सर्वसम्पत्प्रदां शान्तां, भूदेवीं प्रणमाम्यहम्॥३॥
औषधीनां च मूलस्थां, वनस्पतिस्वरूपिणीम्।
जीवनस्य च आधारां, भूदेवीं प्रणमाम्यहम्॥४॥
क्षमारूपां दयारूपां, स्थिररूपां सनातनीम्।
सर्वदुःखहरां पुण्यां, भूदेवीं प्रणमाम्यहम्॥५॥
वराहाङ्कसमारूढां, विष्णुपत्नीं मनोहराम्।
जगत्पालिन्यां शुभदां, भूदेवीं प्रणमाम्यहम्॥६॥
धान्यरत्नसमृद्धां च, सुवर्णादिविभूषिताम्।
सर्वाभीष्टप्रदां देवीं, भूदेवीं प्रणमाम्यहम्॥७॥
यः पठेत् श्रद्धया नित्यं, भूदेव्याः स्तवमुत्तमम्।
धनधान्यसमृद्धिः स्यात्, शान्तिः सौख्यं च वर्धते॥८॥
॥ श्री भूदेवी अष्टकम् सम्पूर्णम् ॥
🙏 भूदेवी की आराधना का संदेश
भूदेवी की पूजा केवल पुष्प और दीप अर्पित करने तक सीमित नहीं है। धरती का सम्मान करना, अन्न का आदर करना, जल एवं वनस्पति की रक्षा करना और प्रकृति को सुरक्षित रखना भी भूदेवी के प्रति श्रद्धा का सुंदर भाव है।
📖 संदर्भ: देवी भागवत — अध्याय ९ के संदर्भानुसार। भूदेवी-वराह परंपरा का वर्णन अन्य वैष्णव एवं पुराणिक स्रोतों में भी मिलता है।
🙏 जय भूदेवी माता। जय श्री वराह भगवान। 🙏
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