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- sn vyas##रामायण #रामायण #रामायण कथा #रामायण चौपाई #रामायण ज्ञान रामायण पवित्र ग्रंथ है। इसकी कथा जितनी आदर्श है उसके पात्र उतने ही प्रेरणादायी। क्या आप रामायण के सभी पात्रों को जानते हैं, नहीं, तो यह जानकारी आपके लिए है। प्रस्तुत है रामायण के प्रमुख पात्र और उनका परिचय ... दशरथ – रघुवंशी राजा इन्द्र के मित्र कौशल के राजा तथा राजधानी एवं निवास अयोध्या कौशल्या – दशरथ की बड़ी रानी,राम की माता सुमित्रा - दशरथ की मंझली रानी,लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न की माता कैकयी - दशरथ की छोटी रानी, भरत की माता सीता – जनकपुत्री,राम की पत्नी उर्मिला – जनकपुत्री, लक्ष्मण की पत्नी मांडवी – जनक के भाई कुशध्वज की पुत्री,भरत की पत्नी श्रुतकीर्ति - जनक के भाई कुशध्वज की पुत्री,शत्रुघ्न की पत्नी राम – दशरथ तथा कौशल्या के पुत्र, सीता के पति लक्ष्मण - दशरथ तथा सुमित्रा के पुत्र,उर्मिला के पति भरत – दशरथ तथा कैकयी के पुत्र,मांडवी के पति शत्रुघ्न - दशरथ तथा सुमित्रा के पुत्रश्रुतकीर्ति के पति,मथुरा के राजा लवणासूर के संहारक शान्ता – दशरथ की पुत्री,राम भगिनी बाली – किष्किन्धा (पंपापुर) का राजा,रावण का मित्र तथा साढ़ू,साठ हजार हाथियों का बल सुग्रीव – बाली का छोटा भाई,जिनकी हनुमान जी ने मित्रता करवाई तारा – बाली की पत्नी,अंगद की माता, पंचकन्याओं में स्थान रुमा – सुग्रीव की पत्नी,सुषेण वैद्य की बेटी अंगद – बाली तथा तारा का पुत्र । रावण – ऋषि पुलस्त्य का पौत्र, विश्रवा तथा पुष्पोत्कटा का पुत्र कुंभकर्ण – रावण तथा कुंभिनसी का भाई, विश्रवा तथा पुष्पोत्कटा का पुत्र कुंभिनसी – रावण तथा कुुंंभकर्ण की भगिनी,विश्रवा तथा पुष्पोत्कटा की पुत्री विश्रवा - ऋषि पुलस्त्य का पुत्र, पुष्पोत्कटा-राका-मालिनी का पति विभीषण – विश्रवा तथा राका का पुत्र,राम का भक्त पुष्पोत्कटा – विश्रवा की पत्नी,रावण, कुंभकर्ण तथा कुंभिनसी की माता राका – विश्रवा की पत्नी,विभीषण की माता मालिनी - विश्रवा की तीसरी पत्नी,खर-दूषण,त्रिसरा तथा शूर्पणखा की माता । त्रिसरा – विश्रवा तथा मालिनी का पुत्र,खर-दूषण का भाई एवं सेनापति शूर्पणखा - विश्रवा तथा मालिनी की पुत्री, खर-दूषण एवं त्रिसरा की भगिनी,विंध्य क्षेत्र में निवास । मंदोदरी – रावण की पत्नी,तारा की भगिनी, पंचकन्याओं में स्थान मेघनाद – रावण का पुत्र इंद्रजीत,लक्ष्मण द्वारा वध दधिमुख – सुग्रीव का मामा ताड़का – राक्षसी,मिथिला के वनों में निवास,राम द्वारा वध। मारिची – ताड़का का पुत्र,राम द्वारा वध (स्वर्ण मृग के रूप में)। सुबाहू – मारिची का साथी राक्षस,राम द्वारा वध। सुरसा – सर्पों की माता। त्रिजटा – अशोक वाटिका निवासिनी राक्षसी, रामभक्त,सीता की अनुरागी त्रिजटा विभीषण की पुत्री थी। प्रहस्त – रावण का सेनापति,राम-रावण युद्ध में मृत्यु। विराध – दंडक वन में निवास,राम लक्ष्मण द्वारा मिलकर वध। शंभासुर – राक्षस, इन्द्र द्वारा वध, इसी से युद्ध करते समय कैकेई ने दशरथ को बचाया था तथा दशरथ ने वरदान देने को कहा। सिंहिका(लंकिनी) – लंका के निकट रहने वाली राक्षसी,छाया को पकड़कर खाती थी। कबंद – दण्डक वन का दैत्य,इन्द्र के प्रहार से इसका सर धड़ में घुस गया,बाहें बहुत लम्बी थी,राम-लक्ष्मण को पकड़ा राम-लक्ष्मण ने गड्ढा खोद कर उसमें गाड़ दिया। जामवंत – रीछ,रीछ सेना के सेनापति। नल – सुग्रीव की सेना का वानरवीर। नील – सुग्रीव का सेनापति जिसके स्पर्श से पत्थर पानी पर तैरते थे,सेतुबंध की रचना की थी। नल और नील – सुग्रीव सेना मे इंजीनियर व राम सेतु निर्माण में महान योगदान। (विश्व के प्रथम इंटरनेशनल हाईवे “रामसेतु”के आर्किटेक्ट इंजीनियर) शबरी – अस्पृश्य जाति की रामभक्त, मतंग ऋषि के आश्रम में राम-लक्ष्मण का आतिथ्य सत्कार। संपाती – जटायु का बड़ा भाई,वानरों को सीता का पता बताया। जटायु – रामभक्त पक्षी,रावण द्वारा वध, राम द्वारा अंतिम संस्कार। गुह – श्रंगवेरपुर के निषादों का राजा, राम का स्वागत किया था। हनुमान – पवन के पुत्र,राम भक्त,सुग्रीव के मित्र। सुषेण वैद्य – सुग्रीव के ससुर । केवट – नाविक,राम-लक्ष्मण-सीता को गंगा पार कराई। शुक्र-सारण – रावण के मंत्री जो बंदर बनकर राम की सेना का भेद जानने गए। अगस्त्य – पहले आर्य ऋषि जिन्होंने विन्ध्याचल पर्वत पार किया था तथा दक्षिण भारत गए। गौतम – तपस्वी ऋषि,अहिल्या के पति,आश्रम मिथिला के निकट। अहिल्या - गौतम ऋषि की पत्नी,इन्द्र द्वारा छलित तथा पति द्वारा शापित,राम ने शाप मुक्त किया,पंचकन्याओं में स्थान। ऋण्यश्रंग – ऋषि जिन्होंने दशरथ से पुत्र प्राप्ति के लिए यज्ञ कराया था। सुतीक्ष्ण – अगस्त्य ऋषि के शिष्य,एक ऋषि। मतंग – ऋषि,पंपासुर के निकट आश्रम, यहीं शबरी भी रहती थी। वशिष्ठ – अयोध्या के सूर्यवंशी राजाओं के गुरु। विश्वामित्र – राजा गाधि के पुत्र,राम-लक्ष्मण को धनुर्विद्या सिखाई थी। शरभंग – एक ऋषि, चित्रकूट के पास आश्रम। सिद्धाश्रम – विश्वमित्र के आश्रम का नाम। भारद्वाज – वाल्मीकि के शिष्य,तमसा नदी पर क्रौंच पक्षी के वध के समय वाल्मीकि के साथ थे,मां-निषाद’ वाला श्लोक कंठाग्र कर तुरंत वाल्मीकि को सुनाया था। सतानन्द – राम के स्वागत को जनक के साथ जाने वाले ऋषि। युधाजित – भरत के मामा। जनक – मिथिला के राजा। सुमन्त – दशरथ के आठ मंत्रियों में से प्रधान । मंथरा – कैकयी की मुंह लगी दासी,कुबड़ी। देवराज – जनक के पूर्वज-जिनके पास परशुराम ने शंकर का धनुष सुनाभ (पिनाक) रख दिया था। मय दानव - रावण का ससुर और उसकी पत्नी मंदोदरी का पिता मायावी --मय दानव का पुत्र और रावण का साला, जिसका बालि ने वध किया था मारीच --रावण का मामा सुमाली --रावण का नाना माल्यवान --सुमाली का भाई, रावण का वयोवृद्ध मंत्री नारंतक - रावण का पुत्र,मूल नक्षत्र में जन्म लेने के कारण रावण ने उसे सागर में प्रवाहित कर दिया था। रावण ने अकेले पड़ जाने के कारण युद्ध में उसकी सहायता ली थी। दधिबल - अंगद का पुत्र जिसने नारंतक का वध किया था। नारंतक शापित था कि उसका वध दधिबल ही करेगा। अयोध्या – राजा दशरथ के कौशल प्रदेश की राजधानी,बारह योजन लंबी तथा तीन योजन चौड़ी नगर के चारों ओर ऊंची व चौड़ी दीवारों व खाई थी,राजमहल से आठ सड़कें बराबर दूरी पर परकोटे तक जाती थी। 🙏जयश्रीराम🚩1416
- sn vyas#रामायण #रामायण ज्ञान #रामायण कथा #रामायण चौपाई क्या आपने कभी सोचा है कि जिस भगवान श्रीराम को रावण जैसी महाशक्ति भी युद्धभूमि में पराजित नहीं कर सकी, उन्हें एक रात चुपचाप कोई उठाकर पाताल लोक ले गया था? वह कौन था जिसकी माया से पूरी वानर सेना धोखा खा गई? आखिर ऐसा क्या हुआ कि स्वयं बजरंगबली को पाताल लोक में उतरना पड़ा, जहां देवताओं का भी प्रवेश अत्यंत कठिन माना जाता था? और वहां हनुमान जी को ऐसा कौन मिला जिसने स्वयं को उनका पुत्र बताया? आइए सुनते हैं यह अद्भुत, रोमांचकारी और भक्तिभाव से भरपूर कथा। लंका में युद्ध अपने चरम पर था। भगवान श्रीराम की सेना एक-एक करके रावण के सभी महाबली योद्धाओं का अंत कर रही थी। कुंभकर्ण का वध हो चुका था। मेघनाद भी अपने अंतिम समय की ओर बढ़ रहा था। रावण समझ चुका था कि अब उसका विनाश निश्चित है। उसी समय उसे अपने पुराने मित्र और पाताल लोक के महान तांत्रिक राजा अहिरावण की याद आई। अहिरावण केवल बलवान ही नहीं, बल्कि मायावी विद्या और तंत्र-मंत्र का अद्वितीय ज्ञाता था। उसकी शक्ति ऐसी थी कि देवता भी उससे सावधान रहते थे। रावण ने गुप्त साधना द्वारा अहिरावण का आह्वान किया। कुछ ही क्षणों में पाताल लोक से घना धुआं उठा और उसके बीच अहिरावण प्रकट हुआ। उसने रावण की ओर देखकर कहा, "मित्र, तुम्हें किस संकट ने मुझे स्मरण करने पर विवश कर दिया?" रावण ने कहा, "अहिरावण, यदि आज तुमने मेरी सहायता नहीं की तो लंका का अंत निश्चित है। श्रीराम और लक्ष्मण को किसी भी प्रकार पाताल लोक ले जाओ। वहां उनकी बलि देकर अपनी देवी को प्रसन्न करो। तभी यह युद्ध मेरे पक्ष में पलट सकता है।" अहिरावण मुस्कुराया। उसने शांत स्वर में कहा, "चिंता मत करो। आज की रात समाप्त होने से पहले श्रीराम और लक्ष्मण पाताल लोक में होंगे।" उधर समुद्र तट पर भगवान श्रीराम की सेना विश्राम कर रही थी। विभीषण को पहले ही संदेह था कि रावण कोई नई चाल अवश्य चलेगा। उन्होंने हनुमान जी से कहा, "महाबली, आज रात अत्यंत सावधान रहना। किसी भी परिस्थिति में प्रभु श्रीराम और लक्ष्मण को अकेला मत छोड़ना।" हनुमान जी ने अपनी विशाल पूंछ से पूरे शिविर के चारों ओर एक अभेद्य सुरक्षा घेरा बना दिया। उन्होंने प्रण किया कि जब तक प्राण हैं, कोई भी इस घेरे को पार नहीं कर सकेगा। लेकिन अहिरावण साधारण शत्रु नहीं था। उसने विभीषण का ही रूप धारण कर लिया। उसका स्वर, चाल, मुख और आभा—सब कुछ बिल्कुल विभीषण जैसा था। जब वह शिविर के निकट पहुंचा तो हनुमान जी ने पूछा, "विभीषण जी, इतनी रात गए कहां से लौट रहे हैं?" अहिरावण बोला, "मैं समुद्र तट पर संध्या पूजा करने गया था। अब वापस आया हूं।" हनुमान जी ने बिना किसी संदेह के उसे भीतर जाने दिया। जैसे ही वह प्रभु श्रीराम और लक्ष्मण के समीप पहुंचा, उसने अपनी मायावी विद्या से पूरे शिविर को गहरी निद्रा में सुला दिया। अगले ही क्षण उसने दोनों भाइयों को उठाया और आकाश मार्ग से पाताल लोक की ओर चला गया। कुछ देर बाद वास्तविक विभीषण लौटे। हनुमान जी ने उन्हें बाहर देखकर आश्चर्य से पूछा, "आप फिर बाहर कैसे आ गए?" विभीषण सब समझ गए। वे घबरा उठे और बोले, "हनुमान! मैं अभी पहली बार यहां आया हूं। कोई मायावी मेरे रूप में भीतर गया है।" इतना सुनते ही हनुमान जी बिजली की गति से भीतर पहुंचे। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। प्रभु श्रीराम और लक्ष्मण वहां नहीं थे। क्षणभर के लिए पूरा शिविर स्तब्ध रह गया। हनुमान जी ने अपनी मुट्ठी भींच ली। उनकी आंखों में अग्नि प्रज्वलित हो उठी। उन्होंने गर्जना करते हुए कहा, "अहिरावण! तूने मेरे प्रभु को छूने का साहस किया है। अब चाहे तू पाताल में छिपा हो या किसी और लोक में, मैं तुझे ढूंढ़ निकालूंगा।" विभीषण ने उन्हें बताया कि अहिरावण पाताल लोक का राजा है और वहीं दोनों भाइयों की बलि देने की तैयारी करेगा। इतना सुनते ही हनुमान जी बिना एक क्षण गंवाए पाताल लोक की ओर प्रस्थान कर गए। पाताल लोक का मार्ग अत्यंत भयावह था। वहां चारों ओर घना अंधकार था। विषैले नाग, अग्नि की नदियां, मायावी वन और ऐसे भ्रम थे जिनमें देवता तक भटक जाएं। लेकिन हनुमान जी के मुख पर केवल एक ही नाम था—"जय श्रीराम।" वे जैसे-जैसे आगे बढ़ते गए, हर बाधा स्वयं हटती चली गई। कुछ देर बाद वे पाताल लोक के विशाल द्वार पर पहुंचे। वहां एक पराक्रमी योद्धा विशाल गदा लेकर पहरा दे रहा था। उसने गर्जना की, "रुक जाओ! इस द्वार से आगे कोई नहीं जा सकता।" हनुमान जी ने शांत स्वर में कहा, "मैं अपने प्रभु श्रीराम को लेने आया हूं। मुझे कोई नहीं रोक सकता।" क्षणभर में दोनों के बीच भीषण युद्ध आरंभ हो गया। गदाओं की टक्कर से पूरा पाताल लोक कांप उठा। अंततः हनुमान जी ने उसे परास्त कर दिया। पराजित योद्धा मुस्कुराया और बोला, "प्रभु, मैं आपका शत्रु नहीं हूं। मैं आपका पुत्र हूं।" हनुमान जी एक क्षण के लिए आश्चर्यचकित रह गए। योद्धा ने अपना परिचय देते हुए कहा, "मेरा नाम मकरध्वज है। जब आपने लंका दहन के बाद समुद्र में प्रवेश किया था, तब आपके शरीर से निकली पसीने की एक बूंद एक मछली ने निगल ली थी। उसी से मेरा जन्म हुआ। बाद में अहिरावण ने मेरा पालन-पोषण किया और मुझे इस द्वार का रक्षक बना दिया।" हनुमान जी ने उसे स्नेह से देखा। उन्होंने कहा, "पुत्र, आज मेरा धर्म मेरे प्रभु की रक्षा करना है।" मकरध्वज ने सिर झुका दिया और बोला, "पिताश्री, अब आपको कोई नहीं रोकेगा।" हनुमान जी आगे बढ़े। उधर अहिरावण अपने विशाल मंदिर में देवी की पूजा कर रहा था। उसने श्रीराम और लक्ष्मण को बलिवेदी पर बांध रखा था। वह हंसते हुए बोला, "आज इन दोनों की बलि से मेरी शक्ति अमर हो जाएगी।" तभी पूरे मंदिर में एक गर्जना गूंज उठी। "अहिरावण! मेरे प्रभु की ओर आंख उठाने की कीमत अब तुझे अपने प्राणों से चुकानी होगी।" हनुमान जी मंदिर के मध्य में प्रकट हो चुके थे। अहिरावण हंस पड़ा। उसने कहा, "वानर! तू मेरे पाताल लोक में आकर मुझे चुनौती देता है?" हनुमान जी ने उत्तर दिया, "मैं कोई साधारण वानर नहीं। मैं श्रीराम का दास हूं। जहां प्रभु का नाम है, वहां किसी माया की शक्ति नहीं चलती।" दोनों के बीच भयंकर युद्ध छिड़ गया। अहिरावण कभी अदृश्य हो जाता, कभी हजारों रूप बना लेता, कभी विषैले नाग छोड़ देता, तो कभी अग्नि वर्षा करने लगता। लेकिन हनुमान जी हर बार "जय श्रीराम" का उच्चारण करते और उसकी सारी माया नष्ट हो जाती। तभी विभीषण द्वारा बताई गई बात उन्हें स्मरण आई। अहिरावण को ऐसा वरदान प्राप्त था कि उसका वध तभी संभव होगा जब उसके सामने जल रहे पांचों दीपक एक ही क्षण में बुझा दिए जाएं। यदि एक भी दीपक जलता रह गया तो वह फिर जीवित हो जाएगा। हनुमान जी ने तुरंत दिव्य पंचमुखी रूप धारण किया। पूर्व दिशा में हनुमान मुख, दक्षिण में नरसिंह, पश्चिम में गरुड़, उत्तर में वराह और ऊपर की ओर हयग्रीव मुख प्रकट हुआ। पांचों मुखों ने एक साथ प्रचंड श्वास छोड़ी। अगले ही क्षण पांचों दीपक एक साथ बुझ गए। अहिरावण घबरा उठा। "नहीं! यह असंभव है!" लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी। हनुमान जी ने अपनी गदा उठाई और एक ही प्रहार में अहिरावण का अंत कर दिया। उसकी सारी मायावी शक्तियां उसी क्षण समाप्त हो गईं। पूरा पाताल लोक दिव्य प्रकाश से भर गया। हनुमान जी ने तुरंत प्रभु श्रीराम और लक्ष्मण के बंधन खोले। दोनों भाइयों ने अपने परम भक्त को प्रेम से देखा। भगवान श्रीराम मुस्कुराए और बोले, "हनुमान, हमें पता था कि जब तक तुम हो, कोई भी हमें अधिक देर तक अपने वश में नहीं रख सकता।" हनुमान जी विनम्र होकर प्रभु के चरणों में झुक गए। उन्होंने कहा, "प्रभु, आपका सेवक केवल अपना कर्तव्य निभा रहा था।" इसके बाद वे दोनों भाइयों को लेकर पुनः लंका लौट आए। पूरी वानर सेना ने उन्हें सुरक्षित देखकर आनंद से जयघोष किया। चारों दिशाओं में केवल एक ही स्वर गूंज उठा—"जय श्रीराम! जय बजरंगबली!" यह कथा हमें सिखाती है कि जहां सच्ची भक्ति, अटूट निष्ठा और प्रभु के प्रति पूर्ण समर्पण होता है, वहां पाताल की सबसे बड़ी माया भी टिक नहीं सकती। हनुमान जी ने केवल अपने बल से नहीं, बल्कि श्रीराम के नाम की शक्ति से उस असंभव कार्य को संभव कर दिखाया जिसे देवता भी असंभव मानते थे। 🙏1627
- Abha#रामायण कथा9651K
- sn vyas#रामायण #रामायण कथा #रामायण चौपाई #रामायण ज्ञान #रामचरितमानस कथा रावण के वंश की 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ सृष्टि के आदिकाल का समय था। चारों ओर केवल अथाह जलराशि थी। उसी अनंत जल के मध्य कमल पर विराजमान प्रजापति ब्रह्मा ने जब इस संसार की रचना आरंभ की तो उनके मन में एक चिंता उत्पन्न हुई। उन्होंने सोचा कि इस जीवनदायिनी जलराशि की रक्षा कौन करेगा? तब उन्होंने अनेक प्रकार के प्राणियों की उत्पत्ति की। वे सभी जीव भूख और प्यास से व्याकुल होकर ब्रह्मा जी के सामने उपस्थित हुए और विनम्र होकर बोले, "हे पितामह, हमारा कर्तव्य क्या होगा?" तब ब्रह्मा जी ने कहा, "तुम सब इस जल की रक्षा करो।" कुछ जीवों ने कहा, "हम यक्षण करेंगे," और वे यक्ष कहलाए। अन्य जीवों ने कहा, "हम इसकी रक्षा करेंगे," और वही आगे चलकर राक्षस कहलाए। इन्हीं राक्षसों के वंश में दो पराक्रमी भाई उत्पन्न हुए—हेति और प्रहेति। प्रहेति धर्मप्रिय था, इसलिए वह तपस्या के मार्ग पर चल पड़ा। किंतु हेति ने गृहस्थ जीवन अपनाया और काल की बहन भया से विवाह किया। उनके पुत्र का नाम विद्युतकेश रखा गया, जिसका तेज सूर्य के समान था। समय बीता और विद्युतकेश का विवाह संध्या की पुत्री सालकटंका से हुआ। कुछ समय बाद उसने मंदराचल पर्वत पर एक तेजस्वी बालक को जन्म दिया, परंतु मोह और आसक्ति में पड़कर वह नवजात को वहीं छोड़कर अपने पति के साथ चली गई। वह बालक निर्जन पर्वत पर अकेला रोता रहा। उसी समय भगवान शिव माता पार्वती के साथ नंदी पर विहार करते हुए वहां पहुंचे। बालक का करुण रुदन सुनकर माता पार्वती का हृदय द्रवित हो उठा। उनकी करुणा देखकर भगवान शिव ने अपनी दिव्य शक्ति से उस शिशु को तुरंत युवा बना दिया और उसे आकाश में विचरण करने वाला दिव्य नगर प्रदान किया। माता पार्वती ने भी वरदान दिया कि भविष्य में राक्षसियों के पुत्र जन्म लेते ही युवावस्था को प्राप्त होंगे। यही बालक आगे चलकर सुकेश के नाम से प्रसिद्ध हुआ। भगवान शिव की कृपा से वह महान बलशाली और अजेय बन गया। सुकेश का विवाह गंधर्व ग्रामणी की रूपवती पुत्री देववती से हुआ। उनके तीन पुत्र उत्पन्न हुए—माल्यवान, सुमाली और माली। तीनों बचपन से ही असाधारण पराक्रमी थे। जब उन्हें ज्ञात हुआ कि उनके पिता ने भगवान शिव की आराधना से यह वैभव प्राप्त किया है, तब उन्होंने भी सुमेरु पर्वत पर जाकर कठोर तपस्या आरंभ की। उनकी तपस्या इतनी प्रचंड थी कि देवता और ऋषि तक विचलित हो उठे। अंततः स्वयं ब्रह्मा जी प्रकट हुए और वर मांगने को कहा। तीनों भाइयों ने अमरता, युद्ध में अजेयता और आपसी प्रेम का वरदान मांगा। ब्रह्मा जी ने "तथास्तु" कहकर उन्हें वरदान प्रदान किया और अंतर्ध्यान हो गए। वरदान प्राप्त करते ही तीनों भाइयों के भीतर अभिमान जाग उठा। वे देवशिल्पी विश्वकर्मा के पास पहुंचे और अपने योग्य नगर की मांग की। तब विश्वकर्मा ने उन्हें दक्षिण समुद्र के तट पर स्थित त्रिकूट पर्वत पर बनी स्वर्णमयी लंका का परिचय दिया। उन्होंने बताया कि यह नगरी अभेद्य है, चारों ओर स्वर्ण की प्राचीरें हैं और इसका वैभव स्वर्ग की अमरावती से भी कम नहीं। यह सुनकर तीनों भाई अपने विशाल राक्षस दल सहित लंका में जाकर बस गए। वहीं से राक्षसों का नया साम्राज्य आरंभ हुआ। कालांतर में माल्यवान का विवाह सुंदरी से, सुमाली का विवाह केतुमती से और माली का विवाह वसुधा से हुआ। इन्हीं वंशों में अनेक पराक्रमी राक्षस उत्पन्न हुए। सुमाली की पुत्री कैकसी भी इन्हीं में से एक थी, जो आगे चलकर रावण, कुंभकर्ण और विभीषण की माता बनी। धीरे-धीरे तीनों भाइयों का आतंक तीनों लोकों में फैलने लगा। ब्रह्मा के वरदान ने उन्हें मृत्यु के भय से मुक्त कर दिया था। वे देवताओं के यज्ञ नष्ट करने लगे, ऋषियों को सताने लगे और धर्म का विनाश करने लगे। भयभीत देवता कैलाश पहुंचे और भगवान शिव से रक्षा की प्रार्थना की। किंतु भगवान शिव बोले, "सुकेश मेरा कृपापात्र है। उसके पुत्रों का वध मैं स्वयं नहीं कर सकता। तुम भगवान विष्णु की शरण में जाओ।" देवता वैकुंठ पहुंचे और भगवान विष्णु से प्रार्थना की। भगवान श्रीहरि ने आश्वासन दिया, "भय मत करो। धर्म की रक्षा मेरा कर्तव्य है। मैं इन अधर्मी राक्षसों का अवश्य संहार करूंगा।" जब यह समाचार माल्यवान, सुमाली और माली तक पहुंचा तो वे क्रोध से भर उठे। उन्होंने विशाल सेना संग देवलोक पर चढ़ाई का निश्चय किया। उनके प्रस्थान के समय भयंकर अपशकुन हुए—आकाश से रक्त की वर्षा हुई, समुद्र उफन पड़े, पशु-पक्षी विचित्र स्वर करने लगे। किंतु अहंकार ने उनकी बुद्धि हर ली और वे किसी संकेत को समझ न सके। रणभूमि में एक ओर करोड़ों राक्षसों की सेना थी और दूसरी ओर गरुड़ पर विराजमान भगवान श्रीहरि विष्णु। राक्षसों ने अस्त्रों की वर्षा आरंभ कर दी। तभी भगवान विष्णु ने अपना पांचजन्य शंख बजाया। उस शंखनाद से तीनों लोक कांप उठे। राक्षसों के हाथों से अस्त्र गिर पड़े, हाथी और घोड़े भयभीत होकर भागने लगे और सेना में भगदड़ मच गई। इसके बाद भगवान विष्णु ने शारंग धनुष उठाया और उनके दिव्य बाण राक्षसों का संहार करने लगे। रणभूमि रक्त से भर उठी। गरुड़ भी अपने विशाल पंखों से राक्षसों को दूर-दूर तक उड़ा रहे थे। अपनी सेना को टूटता देख माली स्वयं युद्धभूमि में उतरा। उसने भगवान विष्णु और गरुड़ पर तीव्र बाणों की वर्षा की। कुछ समय के लिए गरुड़ विचलित हुए, किंतु यह दृश्य देखकर भगवान विष्णु का रौद्र रूप प्रकट हुआ। उन्होंने अपनी उंगली पर सुदर्शन चक्र धारण किया। सूर्य के समान प्रज्वलित वह चक्र बिजली की गति से माली की ओर बढ़ा और अगले ही क्षण उसका मस्तक धड़ से अलग कर दिया। माली का विशाल शरीर पृथ्वी पर गिरा तो पूरी रणभूमि कांप उठी। यह देखकर राक्षस सेना का साहस टूट गया। माल्यवान और सुमाली भयभीत होकर भागने लगे। भगवान विष्णु उनका पीछा करते हुए आगे बढ़े। तभी माल्यवान पीछे मुड़ा और बोला, "हे विष्णु! भागते हुए शत्रु पर प्रहार करना क्षत्रिय धर्म नहीं है। यदि युद्ध करना है तो मेरे सामने आइए।" भगवान विष्णु ने शांत स्वर में उत्तर दिया, "देवताओं की रक्षा मेरा परम धर्म है। मैंने उन्हें वचन दिया है कि तुम्हारे आतंक का अंत करूंगा। चाहे तुम रसातल में ही क्यों न छिप जाओ, मैं तुम्हें छोड़ूंगा नहीं।" यह सुनकर माल्यवान ने क्रोध में अपना दिव्य अस्त्र चलाया, किंतु भगवान विष्णु ने उसे पलभर में नष्ट कर दिया। फिर दोनों के बीच भयंकर युद्ध हुआ। अंततः भगवान विष्णु के एक प्रचंड बाण से माल्यवान गंभीर रूप से घायल होकर भूमि पर गिर पड़ा। जब उसे होश आया तो वह समझ चुका था कि भगवान विष्णु को पराजित करना असंभव है। माली के वध और माल्यवान की पराजय के बाद सुमाली सहित समस्त राक्षस भयभीत होकर अपनी पत्नियों और संतानों को लेकर रसातल की ओर भाग गए। स्वर्णमयी लंका एक बार फिर वीरान हो गई। राक्षसों का अभिमान धूल में मिल चुका था और धर्म की विजय हुई। किंतु यही अंत नहीं था। रसातल में छिपे सुमाली ने भविष्य में एक नया षड्यंत्र रचा। उसने अपनी पुत्री कैकसी का विवाह महर्षि विश्रवा से कराया और उसी वंश में आगे चलकर जन्म हुआ उस महाबली रावण का, जिसने फिर एक बार तीनों लोकों को चुनौती दी। इस प्रकार राक्षसों का इतिहास समाप्त नहीं हुआ, बल्कि एक नए अध्याय की शुरुआत हुई, जिसने आगे चलकर रामायण की महान कथा को जन्म दिया। साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️1714
- sn vyas#जय श्री राम #श्रीरामचरितमानस चोपाई #श्रीरामचरितमानस 🪷 #रामायण #रामायण कथा अयोध्या के प्रतापी राजा सत्यव्रत (इक्ष्वाकु वंश के राजा) का जीवन धर्म-पालन से परिपूर्ण था, परंतु उनके भीतर अपने शरीर और बल का अहंकार जाग उठा। वे नश्वर पंचभौतिक देह के साथ ही जीवित स्वर्ग जाना चाहते थे। जब वे अपने कुलगुरु महर्षि वशिष्ठ के पास पहुँचे, तो वशिष्ठ जी ने स्पष्ट कर दिया कि प्रकृति के नियमों के विरुद्ध जीवित शरीर से स्वर्ग जाना संभव नहीं है। इस पर अभिमानी राजा ने गुरु के निर्णय की अवहेलना करते हुए वशिष्ठ जी के पुत्रों से संपर्क किया। गुरु की मर्यादा का अनादर देखकर वशिष्ठ-पुत्रों ने अत्यंत क्रुद्ध होकर सत्यव्रत को नीच 'चांडाल' बनने का शाप दे दिया, जिससे उनका राजसी सौंदर्य तुरंत भयानक कुरूपता में बदल गया। अपमानित और बेघर होकर चांडाल बने राजा महर्षि विश्वामित्र के आश्रम में शरण लेने पहुँचे। विश्वामित्र और वशिष्ठ के बीच पुरानी प्रतिस्पर्धा थी; इसलिए वशिष्ठ के ठुकराए कार्य को पूरा करके अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के उद्देश्य से विश्वामित्र ने सत्यव्रत को सशरीर स्वर्ग भेजने की प्रतिज्ञा कर ली। विश्वामित्र ने एक विशाल यज्ञ रचाया, परंतु धर्म-विरुद्ध होने के कारण देवताओं ने हविर्भाग स्वीकार करने से मना कर दिया। इससे कुपित होकर विश्वामित्र ने अपनी वर्षों की तपस्या के पुण्य-बल से राजा सत्यव्रत को सीधे आकाश में स्वर्ग की ओर उछाल दिया। जैसे ही चांडाल रूपी सत्यव्रत स्वर्ग के द्वार पर पहुँचे, देवराज इंद्र ने उन्हें रोक दिया और गुरु-द्रोही तथा प्राकृतिक विधान का उल्लंघन करने वाला बताकर नीचे फेंक दिया। सत्यव्रत सिर के बल धरती की ओर गिरने लगे और भयभीत होकर चिल्लाने लगे। विश्वामित्र ने अपनी तपोशक्ति से उन्हें बीच आकाश में ही रोक दिया। ऊपर से इंद्र का दबाव और नीचे से विश्वामित्र की शक्ति टकराने के कारण राजा न तो स्वर्ग जा सके और न धरती पर आ सके। तीनों लोकों के बीच फँस जाने के कारण उनका नाम 'त्रिशंकु' पड़ा। क्रुद्ध विश्वामित्र ने अधर में ही एक नया समानांतर स्वर्ग और नक्षत्र-मंडल रचना शुरू कर दिया। अंततः ब्रह्मा जी के हस्तक्षेप से समझौता हुआ और त्रिशंकु को उसी अधर-लोक में उलटे लटके रहने का स्थान मिला, जहाँ से टपकी लार से अपवित्र 'कर्मनाशा नदी' का जन्म हुआ और राजा का अहंकार सदा के लिए चूर हो गया। पौराणिक ग्रंथों और श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार, इस कथा का आध्यात्मिक सत्य मनुष्य के भीतर छिपे तीन प्रमुख पापों ('त्रिशंकु') और देह-आसक्ति का दुष्परिणाम समझाता है। राजा सत्यव्रत के तीन सबसे बड़े पाप (शंकु) थे—पिता का अनादर, गुरु वशिष्ठ की आज्ञा का उल्लंघन, और भीषण अकाल के समय कामधेनु का वध। यह कहानी हमें सिखाती है कि भौतिक शरीर केवल इस मृत्युलोक की यात्रा के लिए एक साधन है। जो व्यक्ति सांसारिक मोह-माया को भी नहीं छोड़ पाता और आध्यात्मिक रूप से पूर्ण भी नहीं हो पाता, उसकी स्थिति समाज में 'त्रिशंकु' जैसी हो जाती है—वह न इधर का रहता है और न उधर का। यह कथा यह संदेश भी देती है कि तपोबल या अहंकार से प्रकृति और धर्म के शाश्वत विधान को कभी नहीं बदला जा सकता।1810
- sn vyas##रामायण #रामायण #रामायण कथा #रामायण चौपाई #रामायण ज्ञान 🚩 क्या आप जानते हैं माता कैकेयी ने श्री राम को वनवास क्यों भेजा था? 👑 रघुकुल का सौभाग्य: माता कैकेयी के त्याग की अनसुनी कथा 👑 ⚔️ महाराजा दशरथ और बाली का युद्ध एक बार युद्ध में महाराजा दशरथ का सामना वानरराज बाली से हो गया। उस समय अस्त्र-शस्त्र और रथ चालन में निपुण रानी कैकेयी भी उनके साथ थीं। बाली को यह वरदान प्राप्त था कि जिस पर भी उसकी दृष्टि पड़ जाए, उसका आधा बल उसमें समा जाता था। स्वाभाविक रूप से इस युद्ध में महाराजा दशरथ परास्त हो गए। 👑 राजमुकुट या रानी? विजयी बाली ने महाराजा दशरथ के सामने एक कठोर शर्त रखी— "पराजय के मोल स्वरूप या तो अपनी रानी कैकेयी को यहीं छोड़ जाओ, या फिर रघुकुल की शान अपना राजमुकुट मुझे सौंप दो।" दशरथ जी ने भारी मन से अपना मुकुट बाली के पास रख छोड़ा और कैकेयी को लेकर अयोध्या लौट आए। 💔 कैकेयी की पीड़ा और मौन बलिदान कैकेयी स्वयं एक कुशल योद्धा थीं। रघुकुल के मुकुट का इस तरह जाना उनके हृदय में शूल की तरह चुभता रहा। जब श्री राम के राजतिलक का समय आया, तब दशरथ जी और कैकेयी के बीच उस खोए हुए मुकुट की चर्चा हुई। रघुकुल की आन को वापस लाने के लिए, माता कैकेयी ने एक बहुत बड़ा निर्णय लिया। उन्होंने श्री राम के वनवास का कलंक अपने सिर ले लिया और राम जी को वन भिजवाया। वन जाते समय उन्होंने श्री राम को गुप्त रूप से यह आदेश भी दिया था कि— "बाली से रघुकुल का मुकुट वापस लेकर ही आना है।" 🏹 मुकुट का रहस्य और रावण की चोरी वनवास के दौरान जब श्री राम ने बाली का वध किया, तब उन्होंने अपने कुल की शान, उस राजमुकुट के बारे में पूछा। बाली ने बताया— "प्रभु! मैंने रावण को बंदी बनाया था, लेकिन जब वह भागा तो छल से आपका वह मुकुट भी चुरा ले गया। आप मेरे पुत्र अंगद को अपनी सेवा में ले लें, वह प्राणों की बाजी लगाकर आपका मुकुट वापस लाएगा।" 🦶 अंगद की चुनौती और मुकुट की वापसी जब अंगद श्री राम के दूत बनकर रावण की सभा में गए, तो उन्होंने अपना पैर जमाकर लंका के वीरों को उसे हिलाने की चुनौती दी। जब सभी वीर असफल रहे, तो अंत में स्वयं रावण अंगद का पैर डिगाने के लिए आगे आया। जैसे ही रावण अंगद के पैर पकड़ने के लिए झुका, उसका मुकुट (जिसमें रघुकुल का मुकुट भी था) गिर गया! अंगद तुरंत वह मुकुट लेकर श्री राम के पास लौट आए। 🌸 कथा का सार रघुकुल के उस राजमुकुट का ऐसा प्रताप था कि जिसने भी उसे खोया या चुराया, उसे भारी कीमत चुकानी पड़ी: महाराजा दशरथ ने मुकुट गंवाया, तो उन्हें पीड़ा झेलनी पड़ी और प्राण त्यागने पड़े। बाली ने मुकुट छीना, तो उसे भी अपने प्राण गंवाने पड़े। रावण ने मुकुट चुराया, तो उसे भी काल का मुंह देखना पड़ा। यदि माता कैकेयी श्री राम को वनवास न भेजतीं, तो रघुकुल का वह सौभाग्य और गौरव कभी वापस न लौटता। कुल के हित के लिए इतना बड़ा कार्य करने और जीवन भर का अपयश झेलने के कारण ही श्री राम अपनी तीनों माताओं में से कैकेयी जी से सर्वाधिक प्रेम करते थे। ।। जय श्री राम ।। 🙏✨1818
- sn vyas#🪔सावन का पवित्र महीना 🙏 #🕉️सनातन धर्म🚩 #🔱शिवपुराण कथा📖 #रामायण कथा 🌺 सुलभा की कथा — जब एक अकेली स्त्री ने राजा जनक के अहंकार को चुनौती दी 🌺 प्राचीन भारत में मिथिला के राजा जनक केवल एक महान शासक ही नहीं, बल्कि ज्ञानी और वैरागी राजा के रूप में भी प्रसिद्ध थे। उनकी सभा में बड़े-बड़े ऋषि, मुनि और दार्शनिक आते थे। जनक कहा करते थे— “मैं राजमहल में रहते हुए भी संसार से मुक्त हूँ। राज्य मेरा है, पर मैं राज्य का नहीं।” उनकी यह प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैल गई। उसी समय भारतवर्ष में सुलभा नाम की एक विदुषी तपस्विनी भ्रमण करती थीं। वे किसी आश्रम या परिवार से बंधी नहीं थीं। उन्होंने वेद, दर्शन, योग और आत्मज्ञान का गहरा अध्ययन किया था। जब सुलभा ने सुना कि राजा जनक स्वयं को जीवन्मुक्त कहते हैं, तो उनके मन में एक प्रश्न उठा— “क्या जनक वास्तव में अहंकार से मुक्त हो चुके हैं… या उन्हें अपनी मुक्ति पर भी गर्व हो गया है?” वे मिथिला पहुँचीं। 👑 राजसभा में एक अनजान स्त्री राजा की सभा भरी हुई थी। ऋषि, ब्राह्मण, मंत्री और विद्वान बैठे थे। तभी साधारण तपस्विनी के वेश में सुलभा सभा में प्रवेश कर गईं। जनक ने उनका सम्मान किया और पूछा— “देवि, आप कौन हैं? किस कुल से हैं? कहाँ से आई हैं?” सुलभा मुस्कुराईं। उन्होंने तुरंत उत्तर नहीं दिया। फिर बोलीं— “राजन्, जो स्वयं को आत्मज्ञानी कहता है, वह सबसे पहले मेरा कुल, मेरा जन्म और मेरी पहचान क्यों पूछ रहा है?” सभा शांत हो गई। जनक कुछ क्षण उन्हें देखते रहे। सुलभा ने आगे कहा— “यदि शरीर ही मैं हूँ, तो मेरा कुल पूछना उचित है।” “लेकिन यदि आत्मा ही मेरा वास्तविक स्वरूप है, तो बताइए—आत्मा का कुल क्या है?” राजा के पास तत्काल उत्तर नहीं था। 🔥 सुलभा का पहला प्रश्न सुलभा बोलीं— “राजन्! आप कहते हैं कि यह राज्य आपका है।” “तो बताइए—वास्तव में आपका क्या है?” “यह शरीर?” “एक दिन इसे भी छोड़ना पड़ेगा।” “यह महल?” “आपसे पहले भी किसी का था और आपके बाद भी किसी और का होगा।” “यह सिंहासन?” “आप सोते हैं, तब भी सिंहासन वहीं रहता है।” फिर वह बोलीं— “जिस वस्तु को आप अपने साथ ले नहीं जा सकते, उसे ‘मेरा’ कहने का अधिकार आपको किसने दिया?” सभा में बैठे विद्वानों के चेहरे बदलने लगे। जनक गंभीर हो गए। 🌿 राजा ने कहा—मैं वैरागी हूँ जनक बोले— “देवि, मैं राज्य करता अवश्य हूँ, किंतु मेरे भीतर राज्य की आसक्ति नहीं है।” सुलभा ने पूछा— “यदि आसक्ति नहीं है, तो आपको यह बताने की आवश्यकता क्यों महसूस होती है कि आप आसक्त नहीं हैं?” राजा मौन हो गए। सुलभा बोलीं— “कभी-कभी मनुष्य धन के अहंकार से मुक्त हो जाता है…” “लेकिन फिर उसे अपने त्याग का अहंकार हो जाता है।” “कभी वह ज्ञान के अहंकार को छोड़ देता है…” “और फिर उसे यह अहंकार हो जाता है कि ‘मैं ज्ञानी हूँ।’” “अहंकार वस्त्र बदल सकता है, राजन्… मरता बहुत कठिनाई से है।” ⚡ सबसे कठिन प्रश्न सुलभा ने राजा से कहा— “मान लीजिए कोई आपको राजा कहना बंद कर दे।” “कोई आपके ज्ञान की प्रशंसा न करे।” “कोई आपको महान न माने।” “और कोई आपके वैराग्य को स्वीकार भी न करे…” फिर उन्होंने पूछा— “क्या तब भी आपके भीतर वही शांति बनी रहेगी?” जनक ने सिर झुका लिया। अब उन्हें समझ आने लगा था कि सुलभा उनकी परीक्षा क्यों लेने आई थीं। सुलभा बोलीं— “सच्ची मुक्ति संसार छोड़ने में नहीं है।” “सच्ची मुक्ति उस ‘मैं’ को पहचान लेने में है जो संसार को पकड़ना चाहता है।” “राजा होना बंधन नहीं है।” “गरीब होना भी मुक्ति नहीं है।” “वन में रहना मुक्ति नहीं है।” “महल में रहना भी बंधन नहीं है।” बंधन केवल आसक्ति है। और मुक्ति— अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान। 🌸 जनक का उत्तर राजा जनक सिंहासन से उठे। उन्होंने सुलभा को प्रणाम किया और कहा— “देवि, आज आपने मुझे पराजित नहीं किया।” “आपने मेरे भीतर छिपे उस सूक्ष्म अहंकार को दिखाया है जिसे मैं स्वयं नहीं देख पा रहा था।” सुलभा मुस्कुराईं। उन्होंने कहा— “जिस दिन मनुष्य अपनी भूल देख लेता है, उसी दिन उसकी विजय शुरू हो जाती है।” और फिर वे मिथिला छोड़कर अपनी यात्रा पर आगे बढ़ गईं। 🙏 कथा का संदेश सबसे खतरनाक अहंकार वह नहीं जो कहता है— “मेरे पास बहुत धन है।” कभी-कभी उससे भी सूक्ष्म अहंकार कहता है— “मुझे किसी चीज़ का अहंकार नहीं है।” मनुष्य दूसरों को धोखा दे सकता है। संसार को भी प्रभावित कर सकता है। लेकिन अपने भीतर छिपे “मैं” से बचना बहुत कठिन है। इसलिए आत्मज्ञान का पहला प्रश्न यह नहीं होना चाहिए— “मैंने संसार को कितना समझ लिया?” बल्कि— “क्या मैंने स्वयं को समझ लिया?” 🌺 आप क्या मानते हैं—धन का अहंकार अधिक खतरनाक है या ज्ञान का अहंकार?1615
- sn vyas#🪔सावन का पवित्र महीना 🙏 #रामायण कथा #रामायण ज्ञान याज्ञवल्क्य घर बार छोड़ कर जा रहे हैं। जीवन के अंतिम दिन आ गए हैं और अब वह चाहते है कि दूर खो जाए किन्हीं पर्वतों की गुफाओं में। उनकी दो पत्नियां थीं और बहुत धन था उनके पास। वह उस समय के प्रकांड पंडित थे। उनका कोई मुकाबला नहीं था पंडितों में। तर्क में उनकी प्रतिष्ठा थी। ऐसी उनकी प्रतिष्ठा थी कि राजा जनक ने एक बार एक बहुत बड़ा सम्मेलन किया और एक हजार गौएं, उनके सींग सोने से मढ़वा कर और उनके ऊपर बहुमूल्य वस्त्र डाल कर महल के द्वार पर खड़ी कर दीं और कहा: जो पंडित विवाद जीतेगा, वह इन हजार गौओं को अपने साथ ले जाने का हकदार होगा। यह पुरस्कार है। बड़े पंडित इकट्ठे हुए। दोपहर हो गई। बड़ा विवाद चला। कुछ तय भी नहीं हो पा रहा था कि कौन जीता, कौन हारा। और तब दोपहर को याज्ञवल्क्य आये अपने शिष्यों के साथ। दरवाजे पर उन्होंने देखा–गौएं खड़ी-खड़ी सुबह से थक गई हैं, धूप में उनका पसीना बह रहा है। तब अपने शिष्यों से कहा, ऐसा करो, तुम गौओं को खदेड़ कर घर ले जाओ, मैं विवाद निपटा कर आता हूं। राजा जनक की भी हिम्मत नहीं पड़ी यह कहने की कि यह क्या हिसाब हुआ, पहले विवाद तो जीतो! किसी एकाध पंडित ने कहा कि यह तो नियम के विपरीत है–पुरस्कार पहले ही! लेकिन याज्ञवल्क्य ने कहा, मुझे भरोसा है। तुम फिक्र न करो। विवाद तो मैं जीत ही लूंगा, विवादों में क्या रखा है! लेकिन गौएं थक गई हैं, इन पर भी कुछ ध्यान करना जरूरी है। शिष्यों से कहा, तुम फिक्र ही मत करो, बाकी मैं निपटा लूंगा। शिष्य गौएं खदेड़ कर घर ले गए। याज्ञवल्क्य ने विवाद बाद में जीता। पुरस्कार पहले ले लिया। बड़ी प्रतिष्ठा के व्यक्ति थे। बहुत धन उनके पास था। बड़े सम्राट उसके शिष्य थे। और जब वह जाने लगे, उनकी दो पत्नियां थीं, उन्होंने उन दोनों पत्नियों को बुला कर कहा कि आधा-आधा धन तुम्हें बांट देता हूं। बहुत है, सात पीढ़ियों तक भी चुकेगा नहीं। इसलिए तुम निश्चिंत रहो, तुम्हें कोई अड़चन न आएगी। और मैं अब जंगल जा रहा हूं। अब मेरे अंतिम दिन आ गए। अब ये अंतिम दिन मैं परमात्मा के साथ समग्रता से लीन हो जाना चाहता हूं। अब मैं कोई और दूसरा प्रपंच नहीं चाहता। एक क्षण भी मैं किसी और बात में नहीं लगाना चाहता। एक पत्नी तो बड़ी प्रसन्न हुई, क्योंकि इतना धन था याज्ञवल्क्य के पास, उसमें से आधा मुझे मिल रहा है, अब तो मजे ही मजे करूंगी। लेकिन दूसरी पत्नी ने कहा कि इसके पहले कि आप जाएं, एक प्रश्न का उत्तर दे दें। इस धन से आपको शांति मिली? इस धन से आपको आनंद मिला? इस धन से आपको परमात्मा मिला? अगर मिल गया तो फिर कहां जाते हो? और अगर नहीं मिला तो यह कचरा मुझे क्यों पकड़ाते हो? फिर मैं भी तुम्हारे साथ चलती हूं। और याज्ञवल्क्य जीवन में पहली बार निरुत्तर खड़ा रहे। अब इस स्त्री को क्या कहे! कहे कि नहीं मिला, तो फिर बांटने की इतनी अकड़ क्या! बड़े गौरव से बांट रहा थे कि देखो इतने हीरे-जवाहरात, इतना सोना, इतने रुपये, इतनी जमीन, इतना विस्तार! बड़े गौरव से बांट रहा थे। उसमें थोड़ा अहंकार तो रहा ही होगा उस क्षण में कि देखो कितना दे जा रहा हूं! किस पति ने कभी अपनी पत्नियों को इतना दिया है! लेकिन दूसरी पत्नी ने उनके सारे अहंकार पर पानी फेर दिया। उसने कहा, अगर तुम्हें इससे कुछ भी नहीं मिला तो यह कचरा हमें क्यों पकड़ाते हो? यह उलझन हमारे ऊपर क्यों डाले जाते हो? अगर तुम इससे परेशान होकर जंगल जा रहे हो तो आज नहीं कल हमें भी जाना पड़ेगा। तो कल क्यों, आज ही क्यों नहीं? मैं चलती हूं तुम्हारे साथ। तो जो धन बांट रहा है वह क्या खाक बांट रहा है! उसके पास कुछ और मूल्यवान नहीं है। और जो ज्ञान बांट रहा है, पाठशालाएं खोल रहा है, धर्मशास्त्र समझा रहा है, अगर उसने स्वयं ध्यान और समाधि में डुबकी नहीं मारी है, तो कचरा बांट रहा है। उसका कोई मूल्य नहीं है। बांटने योग्य तो बात एक ही है: परमात्मा। मगर उसे तुम तभी बांट सकते हो जब पाओ, जब जानो, जब जीओ। सदैव प्रसन्न रहिये। जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।109
- sn vyas#रामायण #रामायण कथा #रामायण ज्ञान का युद्ध अपने चरम पर पहुंच चुका था। चारों ओर युद्ध की भयंकर गर्जना सुनाई दे रही थी। वानर सेना और राक्षस सेना के बीच घमासान युद्ध चल रहा था। श्रीराम अपनी सेना का उत्साह बढ़ा रहे थे और लक्ष्मण जी भी पूरी वीरता के साथ राक्षसों का सामना कर रहे थे। तभी रावण ने अपने सबसे शक्तिशाली योद्धाओं में से एक मेघनाद को युद्धभूमि में भेजा। मेघनाद ने मायावी शक्तियों और दिव्य अस्त्रों का प्रयोग करते हुए वानर सेना को परेशान करना शुरू कर दिया। लक्ष्मण जी ने भी उसका डटकर सामना किया। दोनों के बीच लंबे समय तक भयंकर युद्ध हुआ। आखिरकार मेघनाद ने एक दिव्य शक्ति अस्त्र का प्रयोग किया। वह अस्त्र सीधे लक्ष्मण जी को लगा और वे मूर्छित होकर युद्धभूमि में गिर पड़े। लक्ष्मण जी को धरती पर गिरा देखकर श्रीराम का हृदय व्याकुल हो उठा। उन्होंने तुरंत अपने भाई को अपनी गोद में उठा लिया और भावुक होकर बोले, "लक्ष्मण, तुम मेरे लिए केवल भाई नहीं हो, तुम मेरे जीवन का आधार हो। तुम्हारे बिना मैं इस संसार में स्वयं को अधूरा महसूस करूंगा।" श्रीराम की आंखों में चिंता देखकर पूरी वानर सेना भी दुखी हो गई। तभी वानरराज सुग्रीव की सहायता से वैद्य सुशेण को बुलाया गया। सुशेण ने लक्ष्मण जी की स्थिति देखकर गंभीर स्वर में कहा, "प्रभु, चिंता मत कीजिए। इनके प्राण बचाए जा सकते हैं, लेकिन इसके लिए हिमालय के द्रोण पर्वत पर उगने वाली कुछ दिव्य औषधियों की आवश्यकता होगी। यदि वे औषधियां सूर्योदय से पहले यहां पहुंच गईं तो लक्ष्मण जी को बचाया जा सकता है।" श्रीराम ने तुरंत हनुमान जी की ओर देखा। हनुमान जी सब समझ चुके थे। उन्होंने बिना एक पल गंवाए हाथ जोड़कर कहा, "प्रभु, आप चिंता न करें। जब तक मेरे शरीर में प्राण हैं, मैं लक्ष्मण जी के लिए औषधि लेकर अवश्य लौटूंगा।" इतना कहते ही हनुमान जी ने भगवान श्रीराम का नाम लिया और विशाल रूप धारण कर लिया। उनके शरीर का आकार बढ़ता गया। उन्होंने अपनी पूंछ को संभाला, पर्वत के समान मजबूत शरीर बनाया और एक ही छलांग में आकाश की ओर उड़ गए। उनके वेग से वृक्ष हिलने लगे और आकाश में बादल बिखर गए। उनके मन में केवल एक ही विचार था कि किसी भी तरह सूर्योदय से पहले औषधियां लंका पहुंचानी हैं। हनुमान जी आकाश मार्ग से हिमालय की ओर बढ़ते जा रहे थे। रास्ते में उन्हें विशाल पर्वत, घने जंगल, नदियां और बादलों से घिरे ऊंचे शिखर दिखाई दे रहे थे। लेकिन उनके कदम नहीं रुके। उन्हें समय का ध्यान था। लंका में लक्ष्मण जी की स्थिति गंभीर थी और हर पल महत्वपूर्ण था। आखिरकार हनुमान जी द्रोण पर्वत के पास पहुंचे। पर्वत का दृश्य अत्यंत अद्भुत था। चारों ओर असंख्य प्रकार की वनस्पतियां और दिव्य औषधियां चमक रही थीं। कई पौधों से अद्भुत प्रकाश निकल रहा था। हनुमान जी ने वैद्य सुशेण द्वारा बताए गए संकेतों के आधार पर औषधियों को खोजने का प्रयास किया, लेकिन समस्या यह थी कि वे उन विशेष औषधियों को निश्चित रूप से पहचान नहीं पा रहे थे। समय लगातार बीत रहा था। हनुमान जी ने सोचा कि यदि उन्होंने किसी एक औषधि को चुनने में गलती कर दी तो लक्ष्मण जी के प्राणों पर संकट आ सकता है। तभी उनके मन में एक अद्भुत विचार आया। उन्होंने मन ही मन भगवान श्रीराम को प्रणाम किया और कहा, "प्रभु, मैं आपकी सेवा में कोई गलती नहीं करना चाहता। जब मैं औषधियों को पहचान नहीं पा रहा हूं, तो क्यों न पूरा पर्वत ही अपने साथ ले चलूं?" इसके बाद हनुमान जी ने अपनी विशाल शक्ति का परिचय दिया और द्रोण पर्वत के उस भाग को ही उठा लिया जिस पर दिव्य औषधियां थीं। पूरा पर्वत उनके हाथ में था और वे उसे लेकर तेज गति से लंका की ओर उड़ चले। कथा में इन दिव्य औषधियों के नाम विसल्यकरणी, संधानकरणी, सौवर्णकरणी और मृतसंजीवनी बताए जाते हैं। विसल्यकरणी को शस्त्रों और बाणों से हुए घावों के उपचार से जोड़ा जाता है। संधानकरणी को शरीर के क्षतिग्रस्त अंगों को पुनः जोड़ने वाली दिव्य औषधि माना गया है। सौवर्णकरणी घायल शरीर में तेज और शक्ति लौटाने वाली औषधि के रूप में वर्णित है, जबकि मृतसंजीवनी को मरणासन्न व्यक्ति में जीवन शक्ति वापस लाने वाली दिव्य औषधि माना जाता है। इन औषधियों का वर्णन रामायण की परंपराओं में अलग-अलग रूपों में मिलता है, लेकिन कथा का मूल संदेश हनुमान जी की अद्भुत सेवा, बुद्धि और समर्पण पर केंद्रित है। उधर लंका में श्रीराम की चिंता लगातार बढ़ती जा रही थी। लक्ष्मण जी अभी भी मूर्छित अवस्था में पड़े थे। वानर सेना भी मौन थी। सभी की नजरें उस दिशा में लगी थीं जहां से हनुमान जी के लौटने की प्रतीक्षा की जा रही थी। तभी अचानक आकाश में एक विशाल छाया दिखाई दी। कुछ वानरों ने ऊपर देखा तो उनके चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गई। हनुमान जी पर्वत लेकर वापस लौट रहे थे। वे तेजी से युद्धभूमि की ओर उतरे। वैद्य सुशेण ने तुरंत औषधियों की सहायता से लक्ष्मण जी का उपचार शुरू किया। कुछ ही समय बाद लक्ष्मण जी की चेतना लौटने लगी। उनकी आंखें खुलीं और उन्होंने सामने श्रीराम को देखा। लक्ष्मण जी को होश में देखकर श्रीराम की आंखों में खुशी के आंसू आ गए। उन्होंने अपने भाई को हृदय से लगा लिया। पूरी वानर सेना में उत्साह की लहर दौड़ गई। सभी जयकारे लगाने लगे। श्रीराम ने हनुमान जी की ओर देखा और कहा, "हनुमान, आज तुमने केवल लक्ष्मण के प्राण नहीं बचाए। तुमने मेरे हृदय को फिर से जीवन दिया है। तुम्हारे जैसा सेवक और भक्त संसार में दुर्लभ है।" हनुमान जी ने सिर झुका लिया और विनम्रता से कहा, "प्रभु, इसमें मेरा क्या है? यह सब आपकी कृपा है। मैं तो केवल आपका सेवक हूं।" कथा के अनुसार दिव्य औषधियों के प्रभाव से युद्धभूमि में घायल पड़े अनेक वानर योद्धाओं को भी नई शक्ति और चेतना प्राप्त हुई। जिस युद्धभूमि में कुछ समय पहले निराशा छाई हुई थी, वहीं अब फिर से उत्साह दिखाई देने लगा। हनुमान जी ने जिस पर्वत को उठाकर लंका तक पहुंचाया था, वह उनके बल से अधिक उनकी बुद्धि और समय पर लिए गए निर्णय का प्रतीक बन गया। क्योंकि जब उन्हें औषधि पहचानने में कठिनाई हुई, तब उन्होंने समस्या में उलझने के बजाय पूरा पर्वत ही उठा लिया। यही कारण है कि हनुमान जी को केवल बल और पराक्रम का प्रतीक नहीं माना जाता, बल्कि उन्हें बुद्धि, साहस, सेवा और अटूट भक्ति का भी प्रतीक माना जाता है। इस घटना से एक गहरा संदेश भी मिलता है। जब किसी प्रिय व्यक्ति के जीवन पर संकट आया, तब हनुमान जी ने अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने के लिए यह कार्य नहीं किया था। उनके सामने केवल एक उद्देश्य था, अपने प्रभु की सेवा करना और लक्ष्मण जी के प्राण बचाना। उन्होंने यह नहीं सोचा कि रास्ता कितना कठिन है, पर्वत कितना दूर है या उनके सामने कितनी बाधाएं आएंगी। उन्होंने केवल अपने कर्तव्य को देखा और भगवान श्रीराम का नाम लेकर आगे बढ़ते गए। सच्ची भक्ति भी शायद यही होती है, जहां अपने स्वार्थ से पहले सेवा आती है और कठिनाई से पहले विश्वास। लंका के युद्ध में हनुमान जी का यह पराक्रम हमेशा के लिए अमर हो गया। उन्होंने यह साबित कर दिया कि जब मन में सच्ची श्रद्धा और हृदय में अपने आराध्य के प्रति समर्पण हो, तो असंभव दिखाई देने वाला कार्य भी संभव हो सकता है। उनके लिए समुद्र पार करना हो, पर्वत उठाना हो या संकट के बीच अपने प्रभु का साथ देना हो, हर कार्य केवल सेवा था। इसलिए आज भी जब भक्त हनुमान जी का स्मरण करते हैं तो उनके साथ शक्ति के अलावा साहस, बुद्धि, निष्ठा और समर्पण को भी याद करते हैं। क्योंकि हनुमान जी हमें सिखाते हैं कि सच्ची भक्ति केवल भगवान का नाम लेने में नहीं, बल्कि जरूरत के समय पूरे मन से अपना कर्तव्य निभाने में है। जय श्रीराम। जय बजरंगबली।2060
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