sn vyas
3K views 19 hours ago
#रामायण #रामायण कथा #रामायण ज्ञान का युद्ध अपने चरम पर पहुंच चुका था। चारों ओर युद्ध की भयंकर गर्जना सुनाई दे रही थी। वानर सेना और राक्षस सेना के बीच घमासान युद्ध चल रहा था। श्रीराम अपनी सेना का उत्साह बढ़ा रहे थे और लक्ष्मण जी भी पूरी वीरता के साथ राक्षसों का सामना कर रहे थे। तभी रावण ने अपने सबसे शक्तिशाली योद्धाओं में से एक मेघनाद को युद्धभूमि में भेजा। मेघनाद ने मायावी शक्तियों और दिव्य अस्त्रों का प्रयोग करते हुए वानर सेना को परेशान करना शुरू कर दिया। लक्ष्मण जी ने भी उसका डटकर सामना किया। दोनों के बीच लंबे समय तक भयंकर युद्ध हुआ। आखिरकार मेघनाद ने एक दिव्य शक्ति अस्त्र का प्रयोग किया। वह अस्त्र सीधे लक्ष्मण जी को लगा और वे मूर्छित होकर युद्धभूमि में गिर पड़े। लक्ष्मण जी को धरती पर गिरा देखकर श्रीराम का हृदय व्याकुल हो उठा। उन्होंने तुरंत अपने भाई को अपनी गोद में उठा लिया और भावुक होकर बोले, "लक्ष्मण, तुम मेरे लिए केवल भाई नहीं हो, तुम मेरे जीवन का आधार हो। तुम्हारे बिना मैं इस संसार में स्वयं को अधूरा महसूस करूंगा।" श्रीराम की आंखों में चिंता देखकर पूरी वानर सेना भी दुखी हो गई। तभी वानरराज सुग्रीव की सहायता से वैद्य सुशेण को बुलाया गया। सुशेण ने लक्ष्मण जी की स्थिति देखकर गंभीर स्वर में कहा, "प्रभु, चिंता मत कीजिए। इनके प्राण बचाए जा सकते हैं, लेकिन इसके लिए हिमालय के द्रोण पर्वत पर उगने वाली कुछ दिव्य औषधियों की आवश्यकता होगी। यदि वे औषधियां सूर्योदय से पहले यहां पहुंच गईं तो लक्ष्मण जी को बचाया जा सकता है।" श्रीराम ने तुरंत हनुमान जी की ओर देखा। हनुमान जी सब समझ चुके थे। उन्होंने बिना एक पल गंवाए हाथ जोड़कर कहा, "प्रभु, आप चिंता न करें। जब तक मेरे शरीर में प्राण हैं, मैं लक्ष्मण जी के लिए औषधि लेकर अवश्य लौटूंगा।" इतना कहते ही हनुमान जी ने भगवान श्रीराम का नाम लिया और विशाल रूप धारण कर लिया। उनके शरीर का आकार बढ़ता गया। उन्होंने अपनी पूंछ को संभाला, पर्वत के समान मजबूत शरीर बनाया और एक ही छलांग में आकाश की ओर उड़ गए। उनके वेग से वृक्ष हिलने लगे और आकाश में बादल बिखर गए। उनके मन में केवल एक ही विचार था कि किसी भी तरह सूर्योदय से पहले औषधियां लंका पहुंचानी हैं। हनुमान जी आकाश मार्ग से हिमालय की ओर बढ़ते जा रहे थे। रास्ते में उन्हें विशाल पर्वत, घने जंगल, नदियां और बादलों से घिरे ऊंचे शिखर दिखाई दे रहे थे। लेकिन उनके कदम नहीं रुके। उन्हें समय का ध्यान था। लंका में लक्ष्मण जी की स्थिति गंभीर थी और हर पल महत्वपूर्ण था। आखिरकार हनुमान जी द्रोण पर्वत के पास पहुंचे। पर्वत का दृश्य अत्यंत अद्भुत था। चारों ओर असंख्य प्रकार की वनस्पतियां और दिव्य औषधियां चमक रही थीं। कई पौधों से अद्भुत प्रकाश निकल रहा था। हनुमान जी ने वैद्य सुशेण द्वारा बताए गए संकेतों के आधार पर औषधियों को खोजने का प्रयास किया, लेकिन समस्या यह थी कि वे उन विशेष औषधियों को निश्चित रूप से पहचान नहीं पा रहे थे। समय लगातार बीत रहा था। हनुमान जी ने सोचा कि यदि उन्होंने किसी एक औषधि को चुनने में गलती कर दी तो लक्ष्मण जी के प्राणों पर संकट आ सकता है। तभी उनके मन में एक अद्भुत विचार आया। उन्होंने मन ही मन भगवान श्रीराम को प्रणाम किया और कहा, "प्रभु, मैं आपकी सेवा में कोई गलती नहीं करना चाहता। जब मैं औषधियों को पहचान नहीं पा रहा हूं, तो क्यों न पूरा पर्वत ही अपने साथ ले चलूं?" इसके बाद हनुमान जी ने अपनी विशाल शक्ति का परिचय दिया और द्रोण पर्वत के उस भाग को ही उठा लिया जिस पर दिव्य औषधियां थीं। पूरा पर्वत उनके हाथ में था और वे उसे लेकर तेज गति से लंका की ओर उड़ चले। कथा में इन दिव्य औषधियों के नाम विसल्यकरणी, संधानकरणी, सौवर्णकरणी और मृतसंजीवनी बताए जाते हैं। विसल्यकरणी को शस्त्रों और बाणों से हुए घावों के उपचार से जोड़ा जाता है। संधानकरणी को शरीर के क्षतिग्रस्त अंगों को पुनः जोड़ने वाली दिव्य औषधि माना गया है। सौवर्णकरणी घायल शरीर में तेज और शक्ति लौटाने वाली औषधि के रूप में वर्णित है, जबकि मृतसंजीवनी को मरणासन्न व्यक्ति में जीवन शक्ति वापस लाने वाली दिव्य औषधि माना जाता है। इन औषधियों का वर्णन रामायण की परंपराओं में अलग-अलग रूपों में मिलता है, लेकिन कथा का मूल संदेश हनुमान जी की अद्भुत सेवा, बुद्धि और समर्पण पर केंद्रित है। उधर लंका में श्रीराम की चिंता लगातार बढ़ती जा रही थी। लक्ष्मण जी अभी भी मूर्छित अवस्था में पड़े थे। वानर सेना भी मौन थी। सभी की नजरें उस दिशा में लगी थीं जहां से हनुमान जी के लौटने की प्रतीक्षा की जा रही थी। तभी अचानक आकाश में एक विशाल छाया दिखाई दी। कुछ वानरों ने ऊपर देखा तो उनके चेहरे पर खुशी की लहर दौड़ गई। हनुमान जी पर्वत लेकर वापस लौट रहे थे। वे तेजी से युद्धभूमि की ओर उतरे। वैद्य सुशेण ने तुरंत औषधियों की सहायता से लक्ष्मण जी का उपचार शुरू किया। कुछ ही समय बाद लक्ष्मण जी की चेतना लौटने लगी। उनकी आंखें खुलीं और उन्होंने सामने श्रीराम को देखा। लक्ष्मण जी को होश में देखकर श्रीराम की आंखों में खुशी के आंसू आ गए। उन्होंने अपने भाई को हृदय से लगा लिया। पूरी वानर सेना में उत्साह की लहर दौड़ गई। सभी जयकारे लगाने लगे। श्रीराम ने हनुमान जी की ओर देखा और कहा, "हनुमान, आज तुमने केवल लक्ष्मण के प्राण नहीं बचाए। तुमने मेरे हृदय को फिर से जीवन दिया है। तुम्हारे जैसा सेवक और भक्त संसार में दुर्लभ है।" हनुमान जी ने सिर झुका लिया और विनम्रता से कहा, "प्रभु, इसमें मेरा क्या है? यह सब आपकी कृपा है। मैं तो केवल आपका सेवक हूं।" कथा के अनुसार दिव्य औषधियों के प्रभाव से युद्धभूमि में घायल पड़े अनेक वानर योद्धाओं को भी नई शक्ति और चेतना प्राप्त हुई। जिस युद्धभूमि में कुछ समय पहले निराशा छाई हुई थी, वहीं अब फिर से उत्साह दिखाई देने लगा। हनुमान जी ने जिस पर्वत को उठाकर लंका तक पहुंचाया था, वह उनके बल से अधिक उनकी बुद्धि और समय पर लिए गए निर्णय का प्रतीक बन गया। क्योंकि जब उन्हें औषधि पहचानने में कठिनाई हुई, तब उन्होंने समस्या में उलझने के बजाय पूरा पर्वत ही उठा लिया। यही कारण है कि हनुमान जी को केवल बल और पराक्रम का प्रतीक नहीं माना जाता, बल्कि उन्हें बुद्धि, साहस, सेवा और अटूट भक्ति का भी प्रतीक माना जाता है। इस घटना से एक गहरा संदेश भी मिलता है। जब किसी प्रिय व्यक्ति के जीवन पर संकट आया, तब हनुमान जी ने अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने के लिए यह कार्य नहीं किया था। उनके सामने केवल एक उद्देश्य था, अपने प्रभु की सेवा करना और लक्ष्मण जी के प्राण बचाना। उन्होंने यह नहीं सोचा कि रास्ता कितना कठिन है, पर्वत कितना दूर है या उनके सामने कितनी बाधाएं आएंगी। उन्होंने केवल अपने कर्तव्य को देखा और भगवान श्रीराम का नाम लेकर आगे बढ़ते गए। सच्ची भक्ति भी शायद यही होती है, जहां अपने स्वार्थ से पहले सेवा आती है और कठिनाई से पहले विश्वास। लंका के युद्ध में हनुमान जी का यह पराक्रम हमेशा के लिए अमर हो गया। उन्होंने यह साबित कर दिया कि जब मन में सच्ची श्रद्धा और हृदय में अपने आराध्य के प्रति समर्पण हो, तो असंभव दिखाई देने वाला कार्य भी संभव हो सकता है। उनके लिए समुद्र पार करना हो, पर्वत उठाना हो या संकट के बीच अपने प्रभु का साथ देना हो, हर कार्य केवल सेवा था। इसलिए आज भी जब भक्त हनुमान जी का स्मरण करते हैं तो उनके साथ शक्ति के अलावा साहस, बुद्धि, निष्ठा और समर्पण को भी याद करते हैं। क्योंकि हनुमान जी हमें सिखाते हैं कि सच्ची भक्ति केवल भगवान का नाम लेने में नहीं, बल्कि जरूरत के समय पूरे मन से अपना कर्तव्य निभाने में है। जय श्रीराम। जय बजरंगबली।
20 shares

More like this