sn vyas
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#रामायण #रामायण ज्ञान #रामायण कथा #रामायण चौपाई क्या आपने कभी सोचा है कि जिस भगवान श्रीराम को रावण जैसी महाशक्ति भी युद्धभूमि में पराजित नहीं कर सकी, उन्हें एक रात चुपचाप कोई उठाकर पाताल लोक ले गया था? वह कौन था जिसकी माया से पूरी वानर सेना धोखा खा गई? आखिर ऐसा क्या हुआ कि स्वयं बजरंगबली को पाताल लोक में उतरना पड़ा, जहां देवताओं का भी प्रवेश अत्यंत कठिन माना जाता था? और वहां हनुमान जी को ऐसा कौन मिला जिसने स्वयं को उनका पुत्र बताया? आइए सुनते हैं यह अद्भुत, रोमांचकारी और भक्तिभाव से भरपूर कथा। लंका में युद्ध अपने चरम पर था। भगवान श्रीराम की सेना एक-एक करके रावण के सभी महाबली योद्धाओं का अंत कर रही थी। कुंभकर्ण का वध हो चुका था। मेघनाद भी अपने अंतिम समय की ओर बढ़ रहा था। रावण समझ चुका था कि अब उसका विनाश निश्चित है। उसी समय उसे अपने पुराने मित्र और पाताल लोक के महान तांत्रिक राजा अहिरावण की याद आई। अहिरावण केवल बलवान ही नहीं, बल्कि मायावी विद्या और तंत्र-मंत्र का अद्वितीय ज्ञाता था। उसकी शक्ति ऐसी थी कि देवता भी उससे सावधान रहते थे। रावण ने गुप्त साधना द्वारा अहिरावण का आह्वान किया। कुछ ही क्षणों में पाताल लोक से घना धुआं उठा और उसके बीच अहिरावण प्रकट हुआ। उसने रावण की ओर देखकर कहा, "मित्र, तुम्हें किस संकट ने मुझे स्मरण करने पर विवश कर दिया?" रावण ने कहा, "अहिरावण, यदि आज तुमने मेरी सहायता नहीं की तो लंका का अंत निश्चित है। श्रीराम और लक्ष्मण को किसी भी प्रकार पाताल लोक ले जाओ। वहां उनकी बलि देकर अपनी देवी को प्रसन्न करो। तभी यह युद्ध मेरे पक्ष में पलट सकता है।" अहिरावण मुस्कुराया। उसने शांत स्वर में कहा, "चिंता मत करो। आज की रात समाप्त होने से पहले श्रीराम और लक्ष्मण पाताल लोक में होंगे।" उधर समुद्र तट पर भगवान श्रीराम की सेना विश्राम कर रही थी। विभीषण को पहले ही संदेह था कि रावण कोई नई चाल अवश्य चलेगा। उन्होंने हनुमान जी से कहा, "महाबली, आज रात अत्यंत सावधान रहना। किसी भी परिस्थिति में प्रभु श्रीराम और लक्ष्मण को अकेला मत छोड़ना।" हनुमान जी ने अपनी विशाल पूंछ से पूरे शिविर के चारों ओर एक अभेद्य सुरक्षा घेरा बना दिया। उन्होंने प्रण किया कि जब तक प्राण हैं, कोई भी इस घेरे को पार नहीं कर सकेगा। लेकिन अहिरावण साधारण शत्रु नहीं था। उसने विभीषण का ही रूप धारण कर लिया। उसका स्वर, चाल, मुख और आभा—सब कुछ बिल्कुल विभीषण जैसा था। जब वह शिविर के निकट पहुंचा तो हनुमान जी ने पूछा, "विभीषण जी, इतनी रात गए कहां से लौट रहे हैं?" अहिरावण बोला, "मैं समुद्र तट पर संध्या पूजा करने गया था। अब वापस आया हूं।" हनुमान जी ने बिना किसी संदेह के उसे भीतर जाने दिया। जैसे ही वह प्रभु श्रीराम और लक्ष्मण के समीप पहुंचा, उसने अपनी मायावी विद्या से पूरे शिविर को गहरी निद्रा में सुला दिया। अगले ही क्षण उसने दोनों भाइयों को उठाया और आकाश मार्ग से पाताल लोक की ओर चला गया। कुछ देर बाद वास्तविक विभीषण लौटे। हनुमान जी ने उन्हें बाहर देखकर आश्चर्य से पूछा, "आप फिर बाहर कैसे आ गए?" विभीषण सब समझ गए। वे घबरा उठे और बोले, "हनुमान! मैं अभी पहली बार यहां आया हूं। कोई मायावी मेरे रूप में भीतर गया है।" इतना सुनते ही हनुमान जी बिजली की गति से भीतर पहुंचे। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। प्रभु श्रीराम और लक्ष्मण वहां नहीं थे। क्षणभर के लिए पूरा शिविर स्तब्ध रह गया। हनुमान जी ने अपनी मुट्ठी भींच ली। उनकी आंखों में अग्नि प्रज्वलित हो उठी। उन्होंने गर्जना करते हुए कहा, "अहिरावण! तूने मेरे प्रभु को छूने का साहस किया है। अब चाहे तू पाताल में छिपा हो या किसी और लोक में, मैं तुझे ढूंढ़ निकालूंगा।" विभीषण ने उन्हें बताया कि अहिरावण पाताल लोक का राजा है और वहीं दोनों भाइयों की बलि देने की तैयारी करेगा। इतना सुनते ही हनुमान जी बिना एक क्षण गंवाए पाताल लोक की ओर प्रस्थान कर गए। पाताल लोक का मार्ग अत्यंत भयावह था। वहां चारों ओर घना अंधकार था। विषैले नाग, अग्नि की नदियां, मायावी वन और ऐसे भ्रम थे जिनमें देवता तक भटक जाएं। लेकिन हनुमान जी के मुख पर केवल एक ही नाम था—"जय श्रीराम।" वे जैसे-जैसे आगे बढ़ते गए, हर बाधा स्वयं हटती चली गई। कुछ देर बाद वे पाताल लोक के विशाल द्वार पर पहुंचे। वहां एक पराक्रमी योद्धा विशाल गदा लेकर पहरा दे रहा था। उसने गर्जना की, "रुक जाओ! इस द्वार से आगे कोई नहीं जा सकता।" हनुमान जी ने शांत स्वर में कहा, "मैं अपने प्रभु श्रीराम को लेने आया हूं। मुझे कोई नहीं रोक सकता।" क्षणभर में दोनों के बीच भीषण युद्ध आरंभ हो गया। गदाओं की टक्कर से पूरा पाताल लोक कांप उठा। अंततः हनुमान जी ने उसे परास्त कर दिया। पराजित योद्धा मुस्कुराया और बोला, "प्रभु, मैं आपका शत्रु नहीं हूं। मैं आपका पुत्र हूं।" हनुमान जी एक क्षण के लिए आश्चर्यचकित रह गए। योद्धा ने अपना परिचय देते हुए कहा, "मेरा नाम मकरध्वज है। जब आपने लंका दहन के बाद समुद्र में प्रवेश किया था, तब आपके शरीर से निकली पसीने की एक बूंद एक मछली ने निगल ली थी। उसी से मेरा जन्म हुआ। बाद में अहिरावण ने मेरा पालन-पोषण किया और मुझे इस द्वार का रक्षक बना दिया।" हनुमान जी ने उसे स्नेह से देखा। उन्होंने कहा, "पुत्र, आज मेरा धर्म मेरे प्रभु की रक्षा करना है।" मकरध्वज ने सिर झुका दिया और बोला, "पिताश्री, अब आपको कोई नहीं रोकेगा।" हनुमान जी आगे बढ़े। उधर अहिरावण अपने विशाल मंदिर में देवी की पूजा कर रहा था। उसने श्रीराम और लक्ष्मण को बलिवेदी पर बांध रखा था। वह हंसते हुए बोला, "आज इन दोनों की बलि से मेरी शक्ति अमर हो जाएगी।" तभी पूरे मंदिर में एक गर्जना गूंज उठी। "अहिरावण! मेरे प्रभु की ओर आंख उठाने की कीमत अब तुझे अपने प्राणों से चुकानी होगी।" हनुमान जी मंदिर के मध्य में प्रकट हो चुके थे। अहिरावण हंस पड़ा। उसने कहा, "वानर! तू मेरे पाताल लोक में आकर मुझे चुनौती देता है?" हनुमान जी ने उत्तर दिया, "मैं कोई साधारण वानर नहीं। मैं श्रीराम का दास हूं। जहां प्रभु का नाम है, वहां किसी माया की शक्ति नहीं चलती।" दोनों के बीच भयंकर युद्ध छिड़ गया। अहिरावण कभी अदृश्य हो जाता, कभी हजारों रूप बना लेता, कभी विषैले नाग छोड़ देता, तो कभी अग्नि वर्षा करने लगता। लेकिन हनुमान जी हर बार "जय श्रीराम" का उच्चारण करते और उसकी सारी माया नष्ट हो जाती। तभी विभीषण द्वारा बताई गई बात उन्हें स्मरण आई। अहिरावण को ऐसा वरदान प्राप्त था कि उसका वध तभी संभव होगा जब उसके सामने जल रहे पांचों दीपक एक ही क्षण में बुझा दिए जाएं। यदि एक भी दीपक जलता रह गया तो वह फिर जीवित हो जाएगा। हनुमान जी ने तुरंत दिव्य पंचमुखी रूप धारण किया। पूर्व दिशा में हनुमान मुख, दक्षिण में नरसिंह, पश्चिम में गरुड़, उत्तर में वराह और ऊपर की ओर हयग्रीव मुख प्रकट हुआ। पांचों मुखों ने एक साथ प्रचंड श्वास छोड़ी। अगले ही क्षण पांचों दीपक एक साथ बुझ गए। अहिरावण घबरा उठा। "नहीं! यह असंभव है!" लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी। हनुमान जी ने अपनी गदा उठाई और एक ही प्रहार में अहिरावण का अंत कर दिया। उसकी सारी मायावी शक्तियां उसी क्षण समाप्त हो गईं। पूरा पाताल लोक दिव्य प्रकाश से भर गया। हनुमान जी ने तुरंत प्रभु श्रीराम और लक्ष्मण के बंधन खोले। दोनों भाइयों ने अपने परम भक्त को प्रेम से देखा। भगवान श्रीराम मुस्कुराए और बोले, "हनुमान, हमें पता था कि जब तक तुम हो, कोई भी हमें अधिक देर तक अपने वश में नहीं रख सकता।" हनुमान जी विनम्र होकर प्रभु के चरणों में झुक गए। उन्होंने कहा, "प्रभु, आपका सेवक केवल अपना कर्तव्य निभा रहा था।" इसके बाद वे दोनों भाइयों को लेकर पुनः लंका लौट आए। पूरी वानर सेना ने उन्हें सुरक्षित देखकर आनंद से जयघोष किया। चारों दिशाओं में केवल एक ही स्वर गूंज उठा—"जय श्रीराम! जय बजरंगबली!" यह कथा हमें सिखाती है कि जहां सच्ची भक्ति, अटूट निष्ठा और प्रभु के प्रति पूर्ण समर्पण होता है, वहां पाताल की सबसे बड़ी माया भी टिक नहीं सकती। हनुमान जी ने केवल अपने बल से नहीं, बल्कि श्रीराम के नाम की शक्ति से उस असंभव कार्य को संभव कर दिखाया जिसे देवता भी असंभव मानते थे। 🙏
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