sn vyas
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#🔱शिवपुराण कथा📖 #🪔सावन का पवित्र महीना 🙏 #🔱हर हर महादेव #🕉 ओम नमः शिवाय 🔱 उमा–हैमवती और देवताओं का अहंकार:: (केन उपनिषद् का अद्भुत दार्शनिक प्रसंग) भारतीय उपनिषदों में कुछ कथाएँ ऐसी हैं जो बहुत छोटी होते हुए भी अपने भीतर अत्यंत गहरा दर्शन समेटे हुए हैं। केन उपनिषद् में वर्णित यक्षोपाख्यान ऐसी ही एक कथा है। यह कथा केवल देवताओं और एक रहस्यमय यक्ष की कहानी नहीं है। इसके भीतर एक गहरा प्रश्न छिपा है— “हमारे भीतर जो शक्ति कार्य कर रही है, उसका वास्तविक स्रोत क्या है?” मनुष्य हो या देवता—जब वह अपनी उपलब्धियों का श्रेय स्वयं को देने लगता है, तब वह अपने मूल स्रोत को भूल जाता है। केन उपनिषद् इसी अहंकार को तोड़कर उस परम सत्य की ओर संकेत करता है, जिसे शब्दों और इंद्रियों से पूरी तरह नहीं जाना जा सकता। 1. देवताओं की विजय: देवताओं और असुरों के युद्ध से होता है। देवताओं ने असुरों पर विजय प्राप्त की। विजय के बाद देवताओं के मन में धीरे-धीरे अहंकार उत्पन्न होने लगा। उन्हें लगा— “यह विजय हमारी शक्ति, हमारे पराक्रम और हमारी सामर्थ्य से मिली है।” लेकिन उपनिषद् का संकेत बिल्कुल अलग है। देवताओं की विजय के पीछे भी वही परम ब्रह्म की शक्ति थी, जिसके कारण अग्नि जलती है, वायु चलती है, इंद्र शासन करते हैं और मनुष्य सोच पाता है। अर्थात् देवताओं की शक्ति भी उनकी अपनी स्वतंत्र शक्ति नहीं थी। 2. तभी एक रहस्यमय यक्ष प्रकट हुआ: देवताओं के अहंकार को देखकर ब्रह्म ने उनके सामने एक रहस्यमय यक्ष का रूप धारण किया। केन उपनिषद् कहता है— तद् ह तद् वनं नाम तद् वनमित्युपासितव्यम्। यहाँ “यक्ष” किसी साधारण प्राणी के अर्थ में नहीं है। वह उस परम सत्ता का रहस्यमय संकेत है, जो देवताओं की अपनी शक्ति के पीछे विद्यमान थी। देवताओं ने उस यक्ष को देखा, लेकिन पहचान नहीं पाए कि वह कौन है। उन्होंने सोचा— “यह कौन है, जो हमारे सामने इस प्रकार खड़ा है?” 3. अग्निदेव की परीक्षा: देवताओं ने अग्निदेव से कहा— “तुम जाकर पता करो कि यह यक्ष कौन है।” अग्निदेव उसके पास पहुँचे। यक्ष ने पूछा— त्वं कः?” “तुम कौन हो?”» अग्नि ने उत्तर दिया— अहमग्निरस्मि।” “मैं अग्नि हूँ। उन्होंने अपनी शक्ति बताते हुए कहा कि वे पृथ्वी की हर वस्तु को जला सकते हैं। तब यक्ष ने उनके सामने एक तृण—घास का छोटा-सा तिनका—रख दिया और कहा— “इसे जला दो।” अग्नि ने अपनी पूरी शक्ति लगा दी। लेकिन वह उस तिनके को जला नहीं सके। अग्नि लौटकर देवताओं के पास आ गए। उन्होंने स्वीकार किया— “मैं इसे जान नहीं सका और अपनी शक्ति से इसे जला भी नहीं सका।” यहाँ तिनका केवल घास का तिनका नहीं है। वह अहंकार के सामने रखा गया ज्ञान का प्रश्न है। अग्नि का अर्थ है शक्ति, तेज और सामर्थ्य। लेकिन वह भी परम सत्ता के आधार के बिना स्वतंत्र नहीं है। 4. वायुदेव की परीक्षा: अब देवताओं ने वायु को भेजा। वायु यक्ष के पास पहुँचे। यक्ष ने पूछा— त्वं कः? वायु ने उत्तर दिया— वायुरहमस्मि। उन्होंने कहा— “मैं वायु हूँ। मैं पृथ्वी की हर वस्तु को उड़ा सकता हूँ।” यक्ष ने फिर वही तिनका उनके सामने रखा और कहा— “इसे उड़ा दो।” वायु ने पूरी शक्ति लगा दी। लेकिन तिनका अपनी जगह से नहीं हिला। वायु भी अपनी सामर्थ्य पर विजय प्राप्त नहीं कर सके। वे लौटकर देवताओं के पास आए। 5. इंद्र का आगमन: अब देवताओं के राजा इंद्र स्वयं उस यक्ष के पास गए। इंद्र के पहुँचते ही यक्ष वहाँ से अदृश्य हो गया। उपनिषद् में आता है— तस्मिन् एवाकाशे स्त्रियमाजगाम बहुशोभमानाम् उमाꣳ हैमवतीम्। अर्थात् उसी आकाशीय क्षेत्र में एक अत्यंत तेजस्विनी स्त्री प्रकट हुईं—उमा हैमवती। इंद्र ने उनसे पूछा— यह यक्ष कौन था? तब उमा ने इंद्र को उस परम सत्य का ज्ञान कराया। केन उपनिषद् कहता है— सा ब्रह्मेति होवाच, ब्रह्मणो वा एतद् विजये महीयध्वमिति। अर्थात् उमा ने कहा— “वह ब्रह्म था; उसी ब्रह्म की विजय में तुम लोग स्वयं को महान समझ रहे थे।” 6. उमा हैमवती कौन हैं? यहाँ “उमा हैमवती” का उल्लेख अत्यंत महत्वपूर्ण है। उमा ज्ञान और दिव्य प्रज्ञा की प्रतीक हैं। हैमवती का अर्थ है—हिमवान की पुत्री। परंपरा में उमा को पार्वती से जोड़ा जाता है। लेकिन केन उपनिषद् में उनका स्वरूप केवल पारिवारिक परिचय तक सीमित नहीं है। वे यहाँ ब्रह्मविद्या का प्रकाश देने वाली शक्ति के रूप में सामने आती हैं। ध्यान देने योग्य बात यह है कि अग्नि और वायु जैसी शक्तियाँ यक्ष को पहचान नहीं सकीं, इंद्र भी उसे प्रत्यक्ष रूप से जान नहीं सके; लेकिन उमा के माध्यम से इंद्र को उस रहस्य का ज्ञान प्राप्त हुआ। यह कथा हमें बताती है कि— शक्ति हमारी होकर भी वास्तव में पूर्णतः हमारी नहीं है। हम कहते हैं— “मैंने किया।” लेकिन प्रश्न यह है— हमें शक्ति किसने दी? बुद्धि किसने दी? प्राण किसके कारण चल रहे हैं? वाणी बोलने की क्षमता कहाँ से आती है? आँखों को देखने की शक्ति कौन देता है? मन को सोचने की शक्ति कौन देता है? इसी प्रश्न से केन उपनिषद् आरंभ होता है। 8. केन उपनिषद् का मूल प्रश्न: प्रारंभ में शिष्य पूछता है— केनेषितं पतति प्रेषितं मनः केन प्राणः प्रथमः प्रैति युक्तः। केनेषितां वाचमिमां वदन्ति चक्षुः श्रोत्रं क उ देवो युनक्ति॥ अर्थात्— मन किसकी प्रेरणा से अपने विषयों की ओर जाता है? प्राण किसके द्वारा प्रेरित होकर कार्य करता है? मनुष्य किसकी शक्ति से वाणी बोलता है? आँख और कान को कौन शक्ति प्रदान करता है? यह प्रश्न ही पूरी उपनिषद्-कथा की आत्मा है। 9. ब्रह्म इंद्रियों से परे है: केन उपनिषद् आगे कहता है— यद् वाचाऽनभ्युदितं येन वागभ्युद्यते। तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते॥ जिसे वाणी व्यक्त नहीं कर सकती, लेकिन जिसके कारण वाणी बोलने में समर्थ होती है—उसी को ब्रह्म जानो। ब्रह्म कोई ऐसी वस्तु नहीं जिसे हम सामान्य वस्तुओं की तरह आँखों से देखकर कह दें— “यह रहा ब्रह्म।” वह तो स्वयं उस देखने की शक्ति का आधार है। 10. मन भी उसे पूरी तरह नहीं पकड़ सकता उपनिषद् कहता है— यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम्। तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते॥ जिसे मन अपने द्वारा नहीं जान सकता, बल्कि जिसके कारण मन जानने में समर्थ होता है—उसी को ब्रह्म जानो। यहाँ उपनिषद् हमें एक अद्भुत दिशा देता है। ब्रह्म को केवल विचारों की वस्तु बनाकर नहीं समझा जा सकता। वह स्वयं चेतना का आधार है। 11. आँखों से भी परे: फिर कहा गया— यच्चक्षुषा न पश्यति येन चक्षूंषि पश्यन्ति। तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते॥ जिसे आँख नहीं देख सकती, लेकिन जिसके कारण आँख देखने में समर्थ होती है—उसी को ब्रह्म जानो। इसी प्रकार— श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो मनो यद्वाचो ह वाचं स उ प्राणस्य प्राणः। वह कान का भी कान है, मन का भी मन है, वाणी की भी वाणी है और प्राणों का भी प्राण है। 12. देवताओं का अहंकार क्यों टूटा? अब कथा को फिर से समझिए। अग्नि कहता है— “मैं सब जला सकता हूँ।” लेकिन वह एक तिनका भी नहीं जला पाया। वायु कहता है— “मैं सब उड़ा सकता हूँ।” लेकिन वह एक तिनका भी नहीं हिला पाया। इसका अर्थ यह नहीं कि अग्नि या वायु कमजोर थे। अर्थ यह है कि— उनकी शक्ति भी परम शक्ति पर निर्भर थी। जब स्रोत को भूलकर शक्ति स्वयं को ही सर्वोच्च मान लेती है, तब अहंकार जन्म लेता है। 13. इंद्र को ही ज्ञान क्यों मिला? इंद्र जब यक्ष के पास पहुँचे, तब यक्ष अदृश्य हो गया। यह प्रसंग भी अत्यंत प्रतीकात्मक है। इंद्र को प्रत्यक्ष रूप से यक्ष का उत्तर नहीं मिला। इसके स्थान पर उमा प्रकट हुईं। मानो उपनिषद् कह रहा हो— परम सत्य को केवल बाहरी शक्ति से नहीं, बल्कि ज्ञान और विवेक से जाना जाता है। अग्नि और वायु शक्ति के प्रतीक हैं। इंद्र नेतृत्व और चेतना के प्रतीक हैं। उमा ब्रह्मविद्या की प्रकाशिका के रूप में सामने आती हैं। 14. “मैं करता हूँ” से “उसकी शक्ति से होता है” तक इसलिए, जब मनुष्य कहता है— “सब कुछ मैं करता हूँ।” तभी वह अपने वास्तविक आधार को भूलने लगता है। लेकिन जब वह समझता है— “मेरी बुद्धि, मेरी शक्ति, मेरे प्राण और मेरी क्षमता—सब किसी महान सत्ता पर आधारित हैं,” तब अहंकार धीरे-धीरे विनम्रता में बदल जाता है। यही विनम्रता ज्ञान की पहली सीढ़ी बनती है। केन उपनिषद् ब्रह्म को किसी सीमित वस्तु की तरह परिभाषित नहीं करता। वह हमें बार-बार बताता है— जिससे सब कुछ प्रकाशित है, उसे किसी बाहरी प्रकाश से प्रकाशित नहीं किया जा सकता। इसलिए ब्रह्म को केवल शब्दों में बाँधना संभव नहीं। वह हमारे अनुभव का मूल आधार है। यहां, उमा–हैमवती और देवताओं की यह कथा हमें पाँच महान बातें सिखाती है— ① शक्ति पर अहंकार मत करो। शक्ति का स्रोत स्वयं से परे भी हो सकता है। ② ज्ञान के बिना सामर्थ्य अधूरा है। अग्नि और वायु शक्तिशाली थे, फिर भी यक्ष को नहीं पहचान सके। ③ परम सत्य इंद्रियों का विषय नहीं है। वह आँखों से दिखाई देने वाली सामान्य वस्तु नहीं। ④ विनम्रता ज्ञान का द्वार है। अपने सीमित होने को स्वीकार करना ही वास्तविक खोज की शुरुआत है। ⑤ ब्रह्म हमारे बाहर ही नहीं, हमारे अनुभव की जड़ में है। वही मन को सोचने, वाणी को बोलने और इंद्रियों को कार्य करने की क्षमता देता है। केन उपनिषद् की यह छोटी-सी कथा वास्तव में मनुष्य के भीतर चलने वाली एक यात्रा है। पहले हम कहते हैं— “मैं करता हूँ।” फिर जीवन हमें हमारी सीमाएँ दिखाता है। फिर प्रश्न उठता है— “मेरे भीतर कार्य करने वाली शक्ति आखिर कहाँ से आती है?” और अंततः ज्ञान हमें उस मौन सत्य की ओर ले जाता है, जिसके कारण— मन सोचता है, वाणी बोलती है, आँखें देखती हैं, कान सुनते हैं और प्राण जीवन को धारण करते हैं। यही केन उपनिषद् का अद्भुत संदेश है— शक्ति पर अहंकार मत करो; शक्ति के मूल को पहचानो। देवताओं की विजय भी उसी परम ब्रह्म की विजय थी। हर शक्ति के पीछे जो परम शक्ति है—उसी की खोज ही ब्रह्मविद्या की शुरुआत है। ~जय श्री कृष्ण~
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