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सिला मिलता नही सबको इबादत का
करूँ कैसे यकीं उस की इनायत का
पटकता ही रहा सर पत्थरों पर मै
घुला था रंग हर दर पे नफरत का
संभाले से संभलता ही नही ईमाँ
मिटा है फलसफा दिलसे सदाकत का
हजारों ख्वाब देखे टूटते हम ने
नहीं है इश्क से रिश्ता शराफत का
चले जाना है इक दिन लौट के सबको
कभी तो आएगा वो दिन कयामत का
नहीं है ख़ौफ़ अब अहले सितमगर से
यकीं मुझको नही उसकी मुहब्बत का
( लक्ष्मण दावानी ✍ )
1/7/2018 #शायरी #📚कविता-कहानी संग्रह #💝 शायराना इश्क़ #📜मेरी कलम से✒️
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