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1222 1222 1222 सिला मिलता नही सबको इबादत का करूँ कैसे यकीं उस की इनायत का पटकता ही रहा सर पत्थरों पर मै घुला था रंग हर दर पे नफरत का संभाले से संभलता ही नही ईमाँ मिटा है फलसफा दिलसे सदाकत का हजारों ख्वाब देखे टूटते हम ने नहीं है इश्क से रिश्ता शराफत का चले जाना है इक दिन लौट के सबको कभी तो आएगा वो दिन कयामत का नहीं है ख़ौफ़ अब अहले सितमगर से यकीं मुझको नही उसकी मुहब्बत का ( लक्ष्मण दावानी ✍ ) 1/7/2018 #शायरी #📚कविता-कहानी संग्रह #💝 शायराना इश्क़ #📜मेरी कलम से✒️
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