sn vyas
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#🙏🏻आध्यात्मिकता😇 #🙏गीता ज्ञान🛕
संसार-- बंधन श्रृंखला
इस प्रसंग को शास्त्रों में यो समझाया है---*
*भाव यह है कि-- जिस प्रकार लकड़ी या घास के तिनके समुद्र में अनायास ही इकट्ठे हो जाते हैं,,,, और फिर बिखर जाते हैं,,,, उसी प्रकार प्राणी अपने अपने प्रारब्ध के अनुसार लेन- देन के संबंध से इकठ्ठे होते हैं,,, और फिर अलग हो जाते हैं ,,,,, तब फिर जीव को उसमें ममता का बंधन बांधने की क्या आवश्यकता है,,,, ?*
*🙏🙏 *
*तात्पर्य यह है कि---- स्त्री पुत्र आदि तथा सगे संबंधियों का समागम तो--- धर्मशाला में इकठ्ठे हुए मुसाफिरों के समान है ,,,,,,,मुसाफिर शाम को आकर धर्मशाला में इकट्ठे होते हैं,,,, सुख दुख की बातें करते हैं,,,, और आमोद प्रमोद करते हैं,,,, परंतु सवेरा होते ही सब अपने-अपने रास्ते चले जाते हैं,,,, और एक दूसरे से अलग हो जाते हैं,,,,,*
*इसी प्रकार एक देह के छूटने पर,,, उसके द्वारा बने हुए संबंध भी छूट जाते हैं,,,, गत जन्म के सगे-- संबंधियों का स्मरण भी दूसरे जन्म में नहीं होता,,,,,*
*दृष्टांत देकर समझाते हैं----*
*जिस प्रकार आज का स्वप्न --- निद्रा के टूट जाने पर,,,, अदृश्य हो जाता है,,, और दूसरे दिन फिर नए सपने की सृष्टि होती है,,,, उसी के समान यह कुटुंब का मिलाप है,,,,जो हर एक देह में बदल जाया करता है,,,, तब फिर इसको स्थिर मानकर,,,, कौन बुद्धिमान मनुष्य इस में ममत्त्व का संबंध जोड़ता है,,,,,*
*माता के पेट में जीव पश्चाताप करता हुआ कहता है,,,, कि परिवार में पालन पोषण के लिए मैंने जो- जो शुभाशुभ कर्म किए हैं,,, उनका फल तो दूसरे जन्म में मुझे अकेले ही भोगना है,,, परिवार के लोग तो अपना- अपना लेना वसूल कर चले गए,,,, आज उनकी याद भी नहीं है,,, परंतु कर्मों का फल तो मुझे अकेले ही भोगना पड़ता है,,, वस्तु-- स्थिति ऐसी होने के कारण बुद्धिमान मनुष्य को कहीं भी ममता नहीं बांधनी चाहिए,,,,*
*श्री महाभारत में इस प्रसंग को बिल्कुल दूसरे ढंग से समझाया है---*
*जीव-- हर एक जन्म में तेरे माता पिता तथा स्त्री पुत्र आदि और परिवार के लोग रहे हैं,,, परंतु प्रत्येक जन्म मे रचा हुआ परिवार का जाल, देह के नाश होते ही नाश हो गया,,,,और उसके साथ तेरा संबंध छूट गया,,,,*
*इसी प्रकार तेरे गत जन्मों में जैसा बीता है,,, वैसे ही इस जन्म में भी परिवार का साथ का तेरा संबंध जब तक देह है, तभी तक है,,,,, देह नाश एक दिन होना ही है,,,, तो फिर देह के रहते ही यदि इसमें ममता निकाल ले,,, तो तेरा भव बंधन छूट जाए,,,,,*
*🙏🙏( सोचो,,,,? )*
*एक वितराग पुरुष जीवन में ही सारे प्राणी पदार्थों से तथा अपने शरीर से आसक्ती हटा लेता है,,, और इस प्रकार वह अपने शरीर से तथा उसे प्राप्त होने वाले भोग पदार्थों से अलग हो जाता है,,,,*
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