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🚩 क्या भगवान की भी मृत्यु होती है? श्रीराम और श्रीकृष्ण के 'अवतार एवं स्वधाम-गमन' का प्रामाणिक शास्त्रीय सच
आजकल आधुनिक टीवी धारावाहिकों, अल्पज्ञानी वक्ताओं और कुछ कल्पित संप्रदायों द्वारा यह घोर भ्रामक प्रचार किया जाता है कि "भगवान राम और भगवान कृष्ण की भी साधारण मनुष्यों की तरह मृत्यु हुई थी।" यह विचार सनातन शास्त्रों, वेदों, उपनिषदों, गीता और महापुराणों के सिद्धांतों के सर्वथा विरुद्ध और अज्ञानता का प्रतीक है।
सनातन धर्म का यह शाश्वत सत्य है कि भगवान कभी जन्म-मृत्यु के अधीन नहीं होते। उनका न तो साधारण 'जन्म' होता है और न ही कभी 'मृत्यु'। भगवान का प्राकट्य (आविर्भाव) और अप्रकट होना (तिरोधान) दोनों ही पूर्णतः अलौकिक और दिव्य होते हैं।
आइए, शास्त्रों, उपनिषदों और महापुराणों के अकाट्य श्लोक-प्रमाणों के आलोक में इस परम रहस्य को समझें।
🔶१. भगवान का शरीर पंचभौतिक नहीं, 'सच्चिदानन्द विग्रह' (अप्राकृत) है
साधारण जीवात्मा का शरीर पंचमहाभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) से बनता है और कर्म-बंधन के कारण जन्म व मृत्यु को प्राप्त होता है। इसके विपरीत, भगवान का स्वरूप 'अप्राकृत' (विशुद्ध दिव्य चिन्मय) होता है।
📜 श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय ४, श्लोक ६):
अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्।
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया॥
* अर्थ: भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं—"मैं अजन्मा (जिसका कभी जन्म न हो) और अविनाशी (जिसकी कभी मृत्यु न हो) स्वरूप वाला तथा समस्त प्राणियों का ईश्वर होते हुए भी, अपनी प्रकृति (त्रिगुणातीत योगमाया) को वश में करके अपनी दिव्य माया से ही प्रकट होता हूँ।"
📜 श्रीमद्भगवद्गीता (अध्याय ४, श्लोक ९):
जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः।
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन॥
* अर्थ: "हे अर्जुन! मेरा जन्म और मेरा कर्म दोनों ही 'दिव्य' (अलौकिक/अप्राकृत) हैं। जो मनुष्य इस तत्व को यथार्थ रूप से जान लेता है, वह इस संसार में पुनर्जन्म को प्राप्त नहीं होता, बल्कि मुझे ही प्राप्त होता है।"
🔶२. गजेंद्र-मोक्ष एवं महापुराणों का उद्घोष: न जन्म, न कर्म, न मृत्यु
श्रीमद्भागवत महापुराण के प्रसिद्ध गजेंद्र-मोक्ष स्तोत्र में परब्रह्म के स्वरूप की व्याख्या करते हुए स्पष्ट कहा गया है कि भगवान का कोई सांसारिक जन्म, कर्म या मृत्यु नहीं है:
📜 श्रीमद्भागवत महापुराण (स्कंध ८, अध्याय ३, श्लोक ८):
न विद्यते यस्य च जन्म कर्म वा न नामरूपे गुणदोष एव वा।
तथापि लोकाप्ययसंभवाय यः स्वमायया तान्यनुकालमृच्छति॥
* अर्थ: "जिस परमेश्वर का न तो प्राकृत जन्म है, न कोई कर्म-बंधन है, न कोई भौतिक नाम-रूप है और न ही कोई गुण-दोष (सत्व-रज-तम का विकार) है; फिर भी वे जगत के सृजन, पालन और संहार के लिए समय-समय पर अपनी योगमाया से दिव्य रूप धारण करते हैं।"
🔶३. श्रीकृष्ण का प्राकट्य एवं स्वधाम-प्रयाण: क्या भगवान देह त्यागते हैं?
(क) प्राकट्य का रहस्य (जन्म नहीं, दिव्य आविर्भाव):
जब कारागार में श्रीकृष्ण प्रकट हुए, तो वे किसी साधारण बालक के रूप में माता के गर्भ से जन्म नहीं लिए, बल्कि साक्षात चतुर्भुज नारायण रूप में प्रकट हुए:
📜 श्रीमद्भागवत महापुराण (स्कंध १०, अध्याय ३, श्लोक ९):
तमद्भुतं बालकमम्बुजेक्षणं चतुर्भुजं शङ्खगदार्युदायुधम्।
श्रीवत्सलक्ष्मं गलशोभिकौस्तुभं पीताम्बरंसान्द्रपयोदसौभगम्॥
* अर्थ: वसुदेव जी ने देखा कि उनके सामने शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किए हुए, कौस्तुभ मणि और पीताम्बर से सुशोभित साक्षात चतुर्भुज परब्रह्म प्रकट हैं। इसके पश्चात माता देवकी की प्रार्थना पर भगवान ने बाल-रूप धारण किया।
(ख) स्वधाम-गमन का सत्य (जरा नामक बहेलिए की लीला):
जरा नामक बहेलिए का बाण लगना केवल एक 'लीला' थी ताकि भगवान पृथ्वी से अपनी लीला को समेट सकें। श्रीमद्भागवत (११वें स्कंध) में महर्षि शुकदेव स्पष्ट घोषणा करते हैं:
📜 श्रीमद्भागवत महापुराण (स्कंध ११, अध्याय ३१, श्लोक ६):
लोकाभिरामां स्वतनुं धारणाध्यानमङ्गलाम्।
योगधारणयाग्नेय्यादग्ध्वा धामाविशत् स्वकम्॥
* अर्थ: "भगवान श्रीकृष्ण ने अपने उस स्वरूप को—जो समस्त लोकों का परम आनंद और ध्यान का परम मंगल है—साधारण जीवों की भाँति अग्नि में भस्म नहीं किया, बल्कि वे अपने उसी नित्य, दिव्य, चिन्मय शरीर (सच्चिदानंद विग्रह) के साथ सीधे अपने परम धाम में प्रविष्ट हो गए।"
* जिस बहेलिए (जरा) का बाण लगा था, भगवान ने उसे भी चतुर्भुज रूप देकर सीधे वैकुंठ भेज दिया। क्या कोई मरता हुआ साधारण मनुष्य किसी को वैकुंठ भेज सकता है? कदापि नहीं!
🔶४. श्रीराम का प्राकट्य एवं साकेत-प्रयाण: सरयू-प्रवेश का परम सत्य
(क) प्राकट्य:
गोस्वामी तुलसीदास जी और वाल्मीकि रामायण के अनुसार भगवान श्रीराम जब प्रकट हुए, तो उन्होंने माता कौशल्या को अपने संपूर्ण ब्रह्मांडीय विराट रूप का दर्शन कराया:
"भए प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी।
रोम रोम प्रति लागे कोटि कोटि ब्रह्मांडा, देखि बिस्मित भई माता॥"
(ख) जल-समाधि नहीं, साक्षात परमधाम गमन:
आधुनिक लोग अज्ञानतावश कहते हैं कि श्रीराम ने 'जल समाधि' ली या शरीर त्याग दिया। किंतु वाल्मीकि रामायण (उत्तरकाण्ड, अध्याय ११०) और अध्यात्म रामायण के अनुसार:
📜 वाल्मीकि रामायण (उत्तरकाण्ड ११०.११-१२ संदर्भ):
विवेश वैष्णवं तेजः सशरीरः सहानुजः।
पितामहपुरोगाश्च देवाः सर्षिगणास्तदा। प्रहर्षमतुलं लेभिरे तुष्टुवुश्च परं हरिम्॥
* अर्थ: भगवान श्रीराम अपने भाइयों और समस्त अयोध्यावासियों के साथ सशरीर सरयू में प्रविष्ट हुए और वहीं जल के भीतर अपने शाश्वत चतुर्भुज महाविष्णु/साकेत-बिहारी स्वरूप में प्रकट होकर समस्त देवताओं की स्तुति के बीच सीधे अपने नित्य धाम (परम व्योम) को पधारे। उन्होंने कोई मृत देह पीछे नहीं छोड़ी।
📌 तात्विक निष्कर्ष
* भगवान सूर्य के समान हैं: जिस प्रकार सूर्य का उदय और अस्त होता है, किंतु सूर्य कभी नष्ट नहीं होता; उसी प्रकार भगवान का धराधाम पर आना 'आविर्भाव' (प्रकट होना) है और जाना 'तिरोधान' (लीला समेटना) है।
* सच्चिदानंद स्वरूप: भगवान का विग्रह कभी नाशवान नहीं होता। वे अजन्मा, अमर, नित्य और सर्वव्यापी हैं।
* मिथ्या प्रचार का खंडन: भगवान की 'मृत्यु' की बात करने वाले केवल लौकिक बुद्धि से सोचते हैं। सनातन शास्त्रों की कसौटी पर परब्रह्म सदा अजर-अमर और आनंदमय हैं।
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