sn vyas
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#🌺श्री शिवाय नमस्तुभ्यं 🙏शिव पुराण पं प्रदीप मिश्रा जी #शिव पुराण रुद्रसंहिता #शिव पुराण 🌺
शिव पुराण की कोटिरुद्र संहिता में भगवान शिव के पावन धाम काशी के अलौकिक महिमा-मंडल के अंतर्गत यह अत्यंत कल्याणकारी कथा आती है। यह कथा दर्शाती है कि अनजाने में किया गया थोड़ा सा भी धर्म-कार्य या शिव-भक्त की सेवा किस प्रकार महापापी जीव को भी यम-यातना से मुक्त कर परम गति प्रदान कर सकती है।
1. वैश्य कृपाण का आचरण और स्वभाव
प्राचीन काल में पावन नगरी काशी में कृपाण नाम का एक वैश्य (व्यापारी) रहता था। वह नाम से ही नहीं, स्वभाव से भी अत्यंत कृपण (कंजूस), कठोर और अधर्मी था।
उसने अपने जीवन में कभी किसी भूखे को भोजन नहीं कराया और न ही कभी कोई दान-पुण्य किया।
उसका एकमात्र लक्ष्य किसी भी छल-कपट से धन जोड़ना था।
वह नित्य प्रति केवल धन के लोभ में डूबा रहता था और ईश्वर-भक्ति तथा धर्म-कर्म को व्यर्थ समझता था।
2. अनजाने में हुआ पुण्य-कर्म
समय बीतता गया और वैश्य कृपाण अति-वृद्धावस्था में पहुँच गया। एक दिन उसके द्वार पर एक अत्यंत भूखा, प्यासा और क्षीणकाय शिव-भक्त संन्यासी/भिक्षुक आया। वह संन्यासी निरंतर 'ॐ नमः शिवाय' का जाप कर रहा था।
वैश्य ने हमेशा की तरह उसे भगाने का प्रयास किया, किंतु वृद्ध और दुर्बल होने के कारण वह स्वयं भोजन कर रहा था। जब संन्यासी ने अति-दीन भाव से केवल जल और तनिक अन्न की याचना की, तो वैश्य ने भारी अनमनेपन से (बिना किसी श्रद्धा के, केवल पीछा छुड़ाने के उद्देश्य से) अपने भोजन का एक छोटा सा अशेष भाग और जल उस भक्त के पात्र में डाल दिया।
वह संन्यासी उस अनजाने में प्राप्त अन्न-जल को भगवान शिव का प्रसाद मानकर संतुष्ट होकर चला गया।
3. प्राण-त्याग और यमदूतों का आगमन
कुछ समय पश्चात् वैश्य कृपाण की मृत्यु हो गई। चूँकि उसने जीवन भर केवल अधर्म और पाप कर्म किए थे, इसलिए उसके प्राण छूटते ही भयंकर रूप वाले यमदूत उसे पाश से बाँधकर यमलोक की ओर घसीटने लगे।
यमदूत उसे उसके पापों का स्मरण कराते हुए कह रहे थे:
"हे पापी! तूने जीवन भर कभी धर्म नहीं किया, केवल धन का संचय किया। अब तुझे कुंभीपाक और असिपत्रवन जैसे भयंकर नरकों में युगों-युगों तक यातनाएँ भोगनी होंगी।"
4. शिवदूतों का प्राकट्य और यमदूतों से संग्राम
जैसे ही यमदूत उसे यमलोक के मार्ग पर ले जा रहे थे, तभी दिव्य त्रिशूल और डमरू धारण किए हुए परम तेजस्वी शिवदूत (रुद्रगण) वहाँ प्रकट हुए। शिवदूतों ने यमदूतों को रोक दिया और वैश्य के पाश काट दिए।
यमदूतों ने आश्चर्यचकित होकर पूछा:
"हे शिवगण! यह वैश्य तो जीवनभर अत्यंत कृपण और अधर्मी रहा है। इसने कभी कोई व्रत या पूजा नहीं की। आप इसे नरक जाने से क्यों रोक रहे हैं?"
शिवदूतों ने मुस्कुराते हुए यमराज के दूतों को शिव-महिमा का रहस्य बताते हुए कहा:
"हे दूतों! भले ही इसने जान-बूझकर पुण्य न किया हो, किंतु अपने अंतकाल के समय काशी-क्षेत्र में इसने अनजाने ही सही, एक अनन्य शिव-भक्त को भोजन और जल अर्पित किया था। शिव-भक्त की तृप्ति से साक्षात भगवान विश्वनाथ तृप्त होते हैं। इसके इस एकमात्र पुण्य-प्रभाव से और काशी की पावन भूमि पर प्राण त्यागने से इसके समस्त जन्मों के पाप भस्म हो चुके हैं।"
5. वैश्य का उद्धार और शिवलोक प्राप्ति
शिवदूतों ने यमदूतों को वापस भेज दिया और वैश्य कृपाण को एक दिव्य विमान में बैठाकर शिवलोक (कैलास) ले गए। अनजाने में किए गए उस छोटे से शिव-भक्त सेवा के फल से वह पापी वैश्य मुक्त होकर शिव-गण के पद पर प्रतिष्ठित हुआ।
कथा का संदेश: यह प्रसंग सिखाता है कि भगवान शिव 'आशुतोष' (शीघ्र प्रसन्न होने वाले) हैं। यदि कोई मनुष्य भाव से या अनजाने में भी किसी सच्चे शिव-भक्त या दीन-दुखी की सेवा करता है, तो शिव जी उसका कल्याण करने में क्षण भर का भी विलंब नहीं करते।
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