sn vyas
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#जय श्री राम #जय श्री हनुमान क्या हनुमान जी केवल बंदर थे? जानिए रामायण में वर्णित उनके अद्भुत स्वरूप की कथा जब भी भगवान श्रीराम और हनुमान जी का स्मरण होता है, हमारे सामने एक ऐसी दिव्य छवि आती है जिसमें हनुमान जी का स्वरूप वानर जैसा दिखाई देता है। उनके हाथ में गदा, कंधों पर बलशाली शरीर और पीछे लहराती हुई लंबी पूंछ दिखाई देती है। लेकिन एक प्रश्न अक्सर पूछा जाता है कि क्या हनुमान जी वास्तव में आज दिखाई देने वाले सामान्य बंदर ही थे? इस प्रश्न का उत्तर समझने के लिए हमें आधुनिक कल्पनाओं से नहीं, बल्कि रामायण में वर्णित हनुमान जी के चरित्र को देखना होगा। पौराणिक कथा के अनुसार, हनुमान जी का जन्म माता अंजना और वानरराज केसरी के घर हुआ। वायु देव की कृपा से जन्म लेने के कारण वे पवनपुत्र भी कहलाए। बाल्यकाल से ही उनके भीतर असाधारण शक्ति और बुद्धि थी। एक दिन बालक हनुमान ने आकाश में लालिमा से चमकते सूर्य को देखा। उन्हें लगा कि आकाश में कोई सुंदर फल है। वे उसे खाने के लिए आकाश की ओर उड़ चले। उनकी गति देखकर देवता भी आश्चर्यचकित रह गए। बाद में उनकी शक्ति और चंचलता से चिंतित होकर ऋषियों ने उन्हें ऐसा वर दिया कि वे अपनी शक्तियों को भूल जाएं और आवश्यकता पड़ने पर ही उन्हें स्मरण कर सकें। समय बीता। जब श्रीराम माता सीता की खोज में वन-वन भटक रहे थे, तब उनकी भेंट हनुमान जी से हुई। हनुमान जी ने जब पहली बार श्रीराम को देखा, तो उन्होंने साधारण वानर की तरह उनसे बातचीत नहीं की। उन्होंने अत्यंत विनम्रता और विद्वत्ता के साथ श्रीराम से संवाद किया। हनुमान जी की वाणी सुनकर श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा कि जिस व्यक्ति ने ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद का अध्ययन न किया हो, वह इस प्रकार शुद्ध और प्रभावशाली वाणी नहीं बोल सकता। अर्थात जिस हनुमान को हम केवल बल और पराक्रम के लिए जानते हैं, वे अत्यंत विद्वान, कुशल वक्ता और राजनीति के ज्ञाता भी थे। यहीं से हनुमान जी का एक अद्भुत स्वरूप हमारे सामने आता है। वे वानर थे, लेकिन उनका व्यक्तित्व केवल शारीरिक स्वरूप तक सीमित नहीं था। उनमें असाधारण बुद्धि थी।अद्भुत बल था। विनम्रता थी।नीति का ज्ञान था और सबसे बढ़कर श्रीराम के प्रति ऐसी भक्ति थी, जिसके सामने स्वयं उनका बल भी छोटा पड़ जाता था। जब माता सीता की खोज के लिए समुद्र पार करने का समय आया, तब सभी वानर हनुमान जी की ओर देखने लगे। जाम्बवान ने उन्हें उनकी भूली हुई शक्ति का स्मरण कराया। और फिर वही हनुमान, जो अपनी शक्ति भूल चुके थे, पर्वत के समान विशाल हो गए। उन्होंने समुद्र लांघा, लंका में प्रवेश किया, माता सीता को खोज निकाला और श्रीराम का संदेश उन्हें दिया। रावण की स्वर्णमयी लंका में भी उन्होंने अपने पराक्रम का परिचय दिया। उनकी पूंछ में अग्नि लगाई गई तो वही अग्नि लंका के लिए विनाश का कारण बन गई। लेकिन हनुमान जी के लिए सबसे बड़ा गौरव उनकी शक्ति नहीं था। उनका सबसे बड़ा गौरव था राम का दास कहलाना। युद्ध समाप्त हुआ। श्रीराम अयोध्या लौटे। सबको सम्मान और उपहार दिए गए, लेकिन हनुमान जी ने अपने प्रभु से कोई धन या राज्य नहीं माँगा। उन्होंने केवल इतना चाहा कि जब तक पृथ्वी पर रामकथा रहे, तब तक उनका जीवन भी रामसेवा में बना रहे। श्रीराम ने उन्हें आशीर्वाद दिया कि जब तक संसार में उनकी कथा प्रचलित रहेगी, तब तक हनुमान जी की कीर्ति भी बनी रहेगी। यही कारण है कि पौराणिक परंपरा में हनुमान जी को चिरंजीवी माना जाता है। समय बदला। त्रेतायुग समाप्त हुआ और द्वापरयुग आया..लेकिन हनुमान जी की कथा समाप्त नहीं हुई। महाभारत के वनपर्व में उनका एक अद्भुत प्रसंग आता है, जब उनकी भेंट अपने ही भाई भीम से हुई। भीम अपनी शक्ति के लिए प्रसिद्ध थे। उन्हें अपने बल पर बहुत गर्व था। हनुमान जी ने मार्ग में वृद्ध वानर का रूप धारण करके अपनी पूंछ रास्ते में डाल रखी थी। भीम ने कहा “अपनी पूंछ हटाओ, मुझे आगे जाना है।” हनुमान जी ने शांत भाव से कहा “मैं वृद्ध हूँ। तुम स्वयं इसे हटाकर आगे निकल जाओ।” भीम ने पूरी शक्ति लगा दी। लेकिन जिस पूंछ को वे एक साधारण वृद्ध वानर की पूंछ समझ रहे थे, उसे वे हिला तक नहीं सके। तब भीम को समझ आया कि उनके सामने कोई साधारण प्राणी नहीं है। उन्होंने हाथ जोड़ दिए। तब हनुमान जी ने अपना वास्तविक स्वरूप प्रकट किया और भीम को समझाया कि बल का सबसे बड़ा शत्रु अहंकार है। यही हनुमान जी की कथा का सबसे सुंदर पक्ष है। रामायण में वे श्रीराम के दूत हैं। लंका में वे सीता माता के आश्वासन बने। युद्धभूमि में वे श्रीराम की सेना के सबसे महान योद्धाओं में से एक हैं। और द्वापर में वे अपने ही भाई भीम को यह सिखाते हैं कि सच्ची शक्ति वही है जिसमें विनम्रता हो। इसलिए जब कोई पूछता है कि “क्या हनुमान जी बंदर थे?” तो इसका उत्तर केवल एक शब्द में देना शायद पर्याप्त नहीं है। रामायण उन्हें वानर और कपि कहती है और उनके शरीर का वानर-सदृश स्वरूप भी वर्णित करती है। लेकिन उसी रामायण में उन्हें असाधारण विद्वान, नीतिज्ञ, वक्ता, योद्धा और श्रीराम के परम भक्त के रूप में भी प्रस्तुत किया गया है। उनका स्वरूप जैसा भी समझा जाए, उनकी महिमा उनके शरीर में नहीं, बल्कि उनके चरित्र, ज्ञान, शक्ति और भक्ति में है। और शायद यही कारण है कि हजारों वर्षों से एक ही नाम करोड़ों भक्तों के हृदय में श्रद्धा जगाता है पवनपुत्र हनुमान का 🙏 जय श्रीराम। जय बजरंगबली। जय श्री राम
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