sn vyas
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#🕉 ओम नमः शिवाय 🔱 #🔱बम बम भोले🙏 #🔱हर हर महादेव #प्रदीप मिश्रा द्वारा शिव महापुराण कथा #🌺श्री शिवाय नमस्तुभ्यं 🙏शिव पुराण पं प्रदीप मिश्रा जी यह कथा शिव पुराण के उमा संहिता तथा रुद्र संहिता में वर्णित है, जो महर्षि वशिष्ठ और राजर्षि विश्वामित्र के मध्य के प्रसिद्ध मतभेद, विश्वामित्र की घोर तपस्या और अंततः भगवान शिव की कृपा से उन्हें प्राप्त 'ब्रह्मर्षि' पद की गाथा है। 1. कामधेनु नंदिनी को लेकर विवाद प्रारंभ में विश्वामित्र एक प्रतापी और शक्तिशाली राजा थे। एक बार वे अपनी सेना के साथ महर्षि वशिष्ठ के आश्रम में पहुँचे। महर्षि वशिष्ठ ने अपनी अलौकिक कामधेनु गाय (नंदिनी) की सहायता से राजा विश्वामित्र और उनकी विशाल सेना का अभूतपूर्व आदर-सत्कार किया। नंदिनी की सामर्थ्य देखकर राजा विश्वामित्र के मन में लोभ आ गया। उन्होंने वशिष्ठ जी से नंदिनी को माँगना चाहा, परंतु वशिष्ठ जी ने कहा कि गौ माता आश्रम की संपत्ति नहीं, बल्कि पूजनीय है। इस पर विश्वामित्र ने बलपूर्वक नंदिनी को ले जाने का प्रयास किया, किंतु नंदिनी के दिव्य तेज और वशिष्ठ जी के ब्रह्मबल के आगे विश्वामित्र की संपूर्ण सेना पराजित हो गई। 2. 'क्षत्रिय बल' पर 'ब्रह्मबल' की विजय अपनी पराजय से दुःखी होकर विश्वामित्र को बोध हुआ कि शारीरिक और सैन्य बल (क्षत्रिय बल) आत्मबल और तपोबल (ब्रह्मबल) के सामने अत्यंत तुच्छ है। उन्होंने विचार किया: "धिक्कार है क्षत्रिय बल को! असली बल तो ब्रह्मबल है। मैं भी घोर तपस्या करके ब्रह्मर्षि पद प्राप्त करूँगा।" 3. भगवान शिव की घोर तपस्या विश्वामित्र ने अपना राज-पाट त्याग दिया और भगवान शिव की प्रसन्नता के लिए कठोर तपस्या प्रारंभ की। उन्होंने वर्षों तक निराहार रहकर महादेव का ध्यान किया। उनकी निष्ठा और उग्र तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव उनके समक्ष प्रकट हुए। विश्वामित्र ने भगवान शिव से दिव्य अस्त्र-शस्त्रों और वेदों के गूढ़ ज्ञान का वरदान माँगा। शिवजी ने उन्हें समस्त दिव्यास्त्र प्रदान किए। दिव्यास्त्र प्राप्त करने के अहंकार में विश्वामित्र ने पुनः महर्षि वशिष्ठ पर आक्रमण कर दिया। परंतु महर्षि वशिष्ठ ने अपने 'ब्रह्मदंड' से विश्वामित्र के सभी अस्त्रों को निष्फल कर दिया। विश्वामित्र को समझ आ गया कि केवल अस्त्र-शस्त्र प्राप्त कर लेने से कोई 'ब्रह्मर्षि' नहीं बनता, जब तक कि मन से क्रोध, अहंकार और ईर्ष्या का नाश न हो जाए। 4. अहंकार का त्याग और शिव कृपा से 'ब्रह्मर्षि' पद विश्वामित्र पुनः भगवान शिव की शरण में गए। इस बार उन्होंने किसी अस्त्र या पद की लालसा के बिना केवल आत्म-शुद्धि और शिव-भक्ति के लिए तपस्या की। धीरे-धीरे उनके मन से अहंकार, क्रोध और वशिष्ठ जी के प्रति ईर्ष्या पूरी तरह समाप्त हो गई। जब विश्वामित्र का हृदय पूर्णतः निर्मल हो गया, तब भगवान शिव ने प्रकट होकर उन्हें आशीर्वाद दिया और स्वयं महर्षि वशिष्ठ ने आगे बढ़कर विश्वामित्र को गले लगाया तथा उन्हें 'ब्रह्मर्षि' स्वीकार किया। कथा का संदेश: सच्चा ज्ञान और उच्च पद बल या छल से नहीं, बल्कि अहंकार के त्याग, नम्रता और भगवान शिव की निष्काम भक्ति से ही प्राप्त होता है।
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