sn vyas
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(((( भक्ति की रसोई में आए जगन्नाथ ))))
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“जब जगन्नाथ स्वयं बने मां के रसोइये.. करुणा माई की अद्भुत भक्ति कथा”
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पुरी धाम की पवित्र धरती पर समुद्र की लहरों और मंदिर की घंटियों के बीच एक ऐसी घटना घटी जिसे सुनकर आज भी भक्तों की आंखें नम हो जाती हैं।
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यह उस समय की बात है जब जगन्नाथ मंदिर की ऊंची पताकाएं हवा में लहरा रही थीं और पूरा नगर रथयात्रा की तैयारियों में मग्न था।
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उसी पुरी नगरी के एक छोटे से कोने में मिट्टी की टूटी दीवारों और फूस की छत वाली एक जर्जर कुटिया थी। उस कुटिया में रहती थीं एक अत्यंत वृद्ध और असहाय भक्तिन, जिनका नाम था करुणा माई।
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उम्र इतनी अधिक हो चुकी थी कि शरीर की हड्डियां जवाब दे चुकी थीं। आंखों की रोशनी धुंधली पड़ गई थी, हाथ कांपते थे, लेकिन उनके हृदय में महाप्रभु जगन्नाथ के प्रति प्रेम समुद्र से भी गहरा था।
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संसार में उनका कोई अपना नहीं बचा था। पति, पुत्र, परिवार सब काल के गाल में समा चुके थे। अब उनके जीवन का एकमात्र सहारा केवल जगन्नाथ जी का नाम था।
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हर सुबह वह बड़ी कठिनाई से उठतीं, मंदिर के शिखर की ओर हाथ जोड़तीं और कांपती आवाज में कहतीं, “हे नीलमाधव, जब तक सांस है, तेरे नाम का दीप मेरे भीतर जलता रहेगा।”
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करुणा माई का एक नियम था। चाहे कितनी भी गरीबी क्यों ना हो, चाहे खुद भूखी क्यों ना रहना पड़े, लेकिन पहले महाप्रभु के लिए भोग अवश्य बनाना है।
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कभी दो सूखी रोटियां, कभी थोड़ा चावल, कभी नमक और साग। वही उनका प्रेम था, वही उनकी पूजा थी।
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लेकिन उस दिन परिस्थिति बहुत कठिन थी। कई दिनों से लगातार बारिश हो रही थी। ठंडी हवाओं ने उनके बूढ़े शरीर को जकड़ लिया था।
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घर में एक मुट्ठी आटा तक नहीं बचा था। चूल्हे के पास रखी लकड़ियां पूरी तरह गीली हो चुकी थीं। सुबह से उन्होंने पानी के अलावा कुछ नहीं पिया था।
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दोपहर होते-होते मंदिर की आरती और शंखध्वनि की आवाज उनके कानों में पहुंची। उन्होंने कुटिया के टूटे दरवाजे से बाहर देखा। सामने दूर मंदिर का ध्वज बारिश में भी लहरा रहा था।
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उनकी आंखों से आंसू बह निकले। उन्होंने कांपते हाथ जोड़कर कहा, “हे जगन्नाथ, आज तेरी यह बूढ़ी मां हार गई। शरीर में इतनी शक्ति नहीं कि तेरे लिए एक रोटी भी बना सकूं।
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तू तो मंदिर में छप्पन भोग पाता है प्रभु, पर आज तेरी मां के घर चूल्हा तक नहीं जला। मैं भूखी रह लूं कान्हा, लेकिन मेरा मन कहता है कि आज तू भी मेरे बिना भूखा होगा।”
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इतना कहकर करुणा माई दीवार के सहारे बैठ गईं। बाहर बारिश की बूंदें मिट्टी पर गिर रही थीं। भीतर कुटिया में अंधेरा और सन्नाटा पसरा था।
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लेकिन उसी क्षण कुछ अद्भुत हुआ। अचानक पूरी झोपड़ी में चंदन, कस्तूरी और ताजे फूलों की दिव्य सुगंध फैलने लगी। ऐसा लग रहा था जैसे किसी ने पूरे वातावरण को पवित्र कर दिया हो।
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बंद पड़ा चूल्हा अपने आप जल उठा। गीली लकड़ियों में बिना किसी प्रयास के तेज अग्नि प्रकट हो गई। करुणा माई ने घबराकर आंखें खोलीं और जो दृश्य उन्होंने देखा, उसे देखकर उनका रोम-रोम कांप उठा।
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मिट्टी के चूल्हे के पास एक सुंदर सांवला बालक बैठा था। उसके सिर पर पीली पगड़ी थी, जिसमें मोरपंख सजा हुआ था। कानों में स्वर्ण कुंडल चमक रहे थे। गले में फूलों की मालाएं थीं।
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उसकी बड़ी-बड़ी आंखों में ऐसी करुणा थी जिसमें पूरा ब्रह्मांड समा जाए। उसके होठों पर मधुर मुस्कान थी और वह अपने नन्हे हाथों से मिट्टी की हांडी में दाल चला रहा था।
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पास में तवे पर गरमा-गरम रोटियां सिक रही थीं। पूरा कमरा उस दिव्य प्रकाश से जगमगा उठा था। करुणा माई स्तब्ध रह गईं। उन्हें लगा शायद यह कोई स्वप्न है।
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तभी वह बालक मुस्कुराकर बोला, “माई, तू इतनी दूर क्यों बैठी है? आज तूने कहा था ना कि तुझसे चूल्हा नहीं जलेगा। इसलिए आज तेरे लिए खाना बनाने मैं खुद आ गया।”
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यह सुनते ही करुणा माई की आंखों से आंसुओं की धारा बह निकली। वे कांपते हुए उठीं और घिसटते-घिसटते चूल्हे के पास पहुंचीं। उनका गला भर आया था। वे बस उस बालक को देखे जा रही थीं।
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बालक ने मिट्टी की एक थाली उठाई। उसमें अपने हाथों से गरमा-गरम रोटियां रखीं, फिर दाल और सब्जी परोसी। उसके बाद वह थाली दोनों हाथों से उठाकर बड़े प्रेम से करुणा माई की ओर बढ़ाते हुए बोला, “माई, पहले भोजन कर ले। सुबह से भूखी है ना तू।”
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करुणा माई के हाथ कांप रहे थे। उन्होंने जैसे ही पहला निवाला मुंह में रखा, उन्हें लगा जैसे उनके भीतर अमृत उतर गया हो।
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वर्षों का दर्द, कमजोरी और अकेलापन जैसे पल भर में मिट गया। उनके शरीर में एक नई शक्ति दौड़ गई। उनकी आंखों में आंसू थे, लेकिन होंठों पर मुस्कान थी।
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वे समझ चुकी थीं कि यह कोई साधारण बालक नहीं। यह स्वयं उनके जगन्नाथ हैं।
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भोजन करने के बाद करुणा माई हाथ जोड़कर बैठ गईं। उन्होंने कांपती आवाज में कहा, “हे प्रभु, अब अपनी माया का पर्दा हटा दो।
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मैं जानती हूं तुम कौन हो। मुझे अपने उस असली रूप के दर्शन करा दो जिसके लिए ऋषि-मुनि जन्मों तक तपस्या करते हैं।”
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इतना सुनते ही पूरी कुटिया दिव्य प्रकाश से भर उठी। वह छोटा बालक धीरे-धीरे अपने विराट स्वरूप में प्रकट होने लगा। उसके पीछे तेजस्वी आभामंडल चमक उठा।
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चारों दिशाओं में शंखध्वनि गूंजने लगी। करुणा माई ने देखा कि उनके सामने स्वयं महाप्रभु जगन्नाथ अपने दिव्य चतुर्भुज रूप में खड़े मुस्कुरा रहे हैं। उनकी आंखों से करुणा बरस रही थी। पूरा वातावरण वैकुंठ जैसा हो गया। करुणा माई रोते हुए प्रभु के चरणों में गिर पड़ीं।
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महाप्रभु ने अपने कोमल हाथों से उनके सिर पर स्पर्श किया और बोले, “माई, तूने जीवन भर मुझसे बिना किसी स्वार्थ के प्रेम किया है। तूने मुझे कभी भगवान नहीं, अपना पुत्र माना।
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इसलिए आज मैं तेरे घर पुत्र बनकर आया हूं। आज से तुझे इस संसार के सारे दुखों और जन्म-मरण के बंधन से मुक्ति मिलती है। तेरे लिए मेरे धाम के द्वार सदैव खुले हैं।”
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करुणा माई बस प्रभु को देखती रहीं। उनकी आंखों से अविरल आंसू बहते रहे। कुछ क्षण बाद वह दिव्य प्रकाश धीरे-धीरे विलीन होने लगा।
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चूल्हे की आग शांत हो गई। कुटिया फिर वैसी ही साधारण दिखाई देने लगी। लेकिन वहां अब भी चंदन और महाप्रसाद की दिव्य सुगंध फैली हुई थी।
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करुणा माई के चेहरे पर ऐसी शांति थी जो संसार के किसी सुख से नहीं मिल सकती।
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अगली सुबह जब पड़ोसी उनकी कुटिया में पहुंचे तो उन्होंने देखा कि करुणा माई आंखें बंद किए मुस्कुरा रही थीं। उनके चेहरे पर दिव्य तेज था, जैसे उन्होंने स्वयं ईश्वर को पा लिया हो।
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उस दिन पुरी नगरी में यह बात फैल गई कि महाप्रभु जगन्नाथ अपनी बूढ़ी मां के घर स्वयं भोजन परोसने आए थे।
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तब से आज तक पुरी में भक्त यह कथा आंसुओं और श्रद्धा के साथ सुनाते हैं कि भगवान को सोने-चांदी के महल नहीं चाहिए। उन्हें चाहिए केवल सच्चा प्रेम, निष्काम भक्ति और मां जैसा निर्मल हृदय।
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((((((( जय जय श्री राधे )))))))
साभार~ पं देव शर्मा🔥
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