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#मैत्री भावना #मेत्ता भावना #मंगल मैत्री #भवतु सब्ब मंगलं #सब्बे सत्ता सुखी होंतु
मैत्री भावना - मैत्री भावना के लाभ EKAYAN 2 मैत्री भावना अर्थात सभी प्राणियों के प्रति निष्कपट प्रेम , और कल्याण की भावना रखना । शुभेच्छा भगवान बुद्ध ने बताया कि जो व्यक्ति मैत्री भावना का अथ्यास करता है॰ उसे अनेक लाभ प्राप्त होते हैं। सुखपूर्वक सोता है मन शांत होने से नींद अच्छी आती है। सुखपूर्वक जागता है 4 और हल्का रहता है। जागने पर मन प्रस्म्न बुरे स्वज् नहीं आते 3 होने से दु : स्वप्न घटते हैं । डर, चिंता और द्वेष कम  मनुष्यों को प्रिय होता है लोग उससे प्रेम और सम्मान करते हैं। अमानुष (देव आदि ) भी प्रिय मानते हैं 5 दिव्य प्राणी भी उसकी रक्षा और सहायता करते हैं। देवता उसकी रक्षा करते हैं सुरक्षित और मंगलमय होता है।  उसका जीवन अधिक  अन्नि , विष और शस्त्र आसानी से हानि नहीं पहुँचा पाते उसका चित्त शांत और संरक्षित रहता हे। चित्त शीध एकाग्र होता है 8 ध्यान और साधना में तेजी से प्रगति होती हे। मुखमण्डल प्रस्न्न और उच्चज्वल हो जाता है भीतर की शांति बाहर झलकती है। मुत्यु के समय भ्रमित नहीं होता  10 अंतिम समय में भी मन स्थिर और शांत रहता है। यदि अरहव्त पद प्राप्त न हो, तो ब्रह्मलोक में उत्पन्न होता हैं महान पुण्य और उच्च गति प्राप्त होती है। मैत्री भावना का सार "सब प्राणी हों, सब निरोग हों , सबका कल्याण हो।"  सुखी मैत्री भावना द्वेष को समाप्त करती है॰ मन को कोमल बनाती है और जीवन में शांति, करूणा तथा आनंद लाती है। मैत्री भावना के लाभ EKAYAN 2 मैत्री भावना अर्थात सभी प्राणियों के प्रति निष्कपट प्रेम , और कल्याण की भावना रखना । शुभेच्छा भगवान बुद्ध ने बताया कि जो व्यक्ति मैत्री भावना का अथ्यास करता है॰ उसे अनेक लाभ प्राप्त होते हैं। सुखपूर्वक सोता है मन शांत होने से नींद अच्छी आती है। सुखपूर्वक जागता है 4 और हल्का रहता है। जागने पर मन प्रस्म्न बुरे स्वज् नहीं आते 3 होने से दु : स्वप्न घटते हैं । डर, चिंता और द्वेष कम  मनुष्यों को प्रिय होता है लोग उससे प्रेम और सम्मान करते हैं। अमानुष (देव आदि ) भी प्रिय मानते हैं 5 दिव्य प्राणी भी उसकी रक्षा और सहायता करते हैं। देवता उसकी रक्षा करते हैं सुरक्षित और मंगलमय होता है।  उसका जीवन अधिक  अन्नि , विष और शस्त्र आसानी से हानि नहीं पहुँचा पाते उसका चित्त शांत और संरक्षित रहता हे। चित्त शीध एकाग्र होता है 8 ध्यान और साधना में तेजी से प्रगति होती हे। मुखमण्डल प्रस्न्न और उच्चज्वल हो जाता है भीतर की शांति बाहर झलकती है। मुत्यु के समय भ्रमित नहीं होता  10 अंतिम समय में भी मन स्थिर और शांत रहता है। यदि अरहव्त पद प्राप्त न हो, तो ब्रह्मलोक में उत्पन्न होता हैं महान पुण्य और उच्च गति प्राप्त होती है। मैत्री भावना का सार "सब प्राणी हों, सब निरोग हों , सबका कल्याण हो।"  सुखी मैत्री भावना द्वेष को समाप्त करती है॰ मन को कोमल बनाती है और जीवन में शांति, करूणा तथा आनंद लाती है। - ShareChat