सुशील मेहता
667 views 1 months ago
मिथुन संक्रांति Mithur sankranti : सूर्य के मिथुन राशि में प्रवेश को मिथुन संक्रांति कहते हैं। मिथुन संक्रांति को शास्त्रों में बहुत ही उत्तम माना जाता है। मिथुन संक्रांति के दिन सूरज देव की पूजा विधि विधान से की जाती है। हिंदू धर्म में इस त्योहार का बहुत महत्व माना जाता है। मिथुन संक्रांति के दिन पुण्य फल प्राप्त करने के लिए दान धर्म के कार्य किए जाते हैं। यह त्योहार प्रकृति में बदलाव का संकेत माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार माना जाता है कि इस दिन से वर्षा की ऋतु शुरू हो जाती है। जब सूरज देव वृषभ राशि से निकलकरमिथुन राशि में प्रवेश करते हैं, तो सभी नक्षत्रों में राशियों की दिशा बदल जाती है। सूरज जब कृतिका नक्षत्र से रोहिणी नक्षत्र में आते हैं, तो बारिश की संभावना बन जाती है। इसके साथ ही अच्छी खेती के लिए लोग भगवान से बारिश की मनोकामना करते हैं। मिथुन संक्रांति को रज पर्व भी कहा जाता है। रज पर्व के दिन भगवान सूरज देव को प्रसन्न करने के लिए व्रत किया जाता है।सूर्य जब मिथुन राशि में प्रवेश करते हैं तो इस स्थिति को ज्योतिष में मिथुन संक्रांति कहते हैं. इसे रज संक्रांति भी कहा जाता हैं। हिंदू धर्म की मान्यता है कि प्रकृति ने ही महिलाओं को मासिक धर्म का वरदान दिया था. इसके कारण ही महिलाओं को मातृत्व का सुख प्राप्त होता है. मिथुन संक्रांति की कथा के अनुसार, जिस तरह से महिलाओं को मासिक धर्म होता है उसी प्रकार भूदेवी अर्थात धरती माता को भी शुरू के तीन दिन मासिक धर्म हुआ था. उसके बाद से ही धरती के विकास होने की मान्यता है. चौथे दिन भूदेवी जिसे सिल बट्टा कहाजाता है, को स्नान कराया जाता है. उसके बाद ही घर में सिल बट्टे का उपयोग किये जाने का प्रचलन है. हिंदू धर्म में सिल बट्टे को धरती का रूप माना जाता है. चौथे दिन सिल बट्टे को जल और दूध से स्नान कराने की परंपरा है. इसके बाद सिंदूर चंदन, फूल आदि से इसकी पूजा की जाती है। #शुभ कामनाएँ 🙏
6 likes
11 shares

More like this