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122 122 122 122 किया तुमने जो गर इशारा न होता तेरे सजदे में दिल हमारा न होता सदा रहते तन्हाइयों में यहाँ हम तेरे प्यार का गर सहारा न होता खयालो में उलझे ही रहते सदा हम अगर तुमने हमको पुकारा न होता समझ ही न पाते मुहब्बत तुम्हारी मिला साथ जो ये तुम्हारा न होता कदम दर कदम खाते ठोकर यहाँ पे कहीं पर हमारा गुजारा न होता बिखर जाते तिनको के जैसे गमो में मिला इश्क में जो किनारा न होता ( लक्ष्मण दावानी ✍ ) 27/5/2017 #शायरी #📚कविता-कहानी संग्रह #✒ शायरी #💝 शायराना इश्क़ #📜मेरी कलम से✒️
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