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#श्री हरि विष्णु “जैसे आपने छल से मेरा पति छीना… वैसे ही आपका हर अवतार अधूरा रहेगा। राम बनोगे तो सीता मिलेगी… लेकिन साथ छिन जाएगा। कृष्ण बनोगे तो प्रेम मिलेगा… पर राधा से पूर्ण मिलन कभी नहीं होगा… कभी नहीं होगा…” यह कहते समय उस पतिव्रता स्त्री की आंखों में आंसू थे… लेकिन उसकी आवाज में ऐसा कंपन था कि स्वयं तीनों लोक कांप उठे। देवता मौन हो गए। दिशाएं शांत हो गईं। और पहली बार स्वयं भगवान विष्णु भी कुछ क्षणों के लिए निःशब्द खड़े रह गए। क्योंकि यह कोई साधारण स्त्री नहीं थी। यह थी वृंदा… वह स्त्री जिसकी पतिव्रता शक्ति ने एक असुर को भी देवताओं से अजेय बना दिया था। लेकिन आखिर ऐसा क्या हुआ था कि भगवान विष्णु को धर्म की रक्षा के लिए एक स्त्री का विश्वास तोड़ना पड़ा? और कैसे उसी टूटे हुए विश्वास से जन्म हुआ तुलसी माता का… जिनके बिना आज भी भगवान विष्णु की पूजा अधूरी मानी जाती है? यह कथा केवल एक श्राप की नहीं… बल्कि प्रेम, विश्वास, त्याग और धर्म के सबसे कठिन निर्णय की कथा है। सृष्टि के प्रारंभिक काल में जब देवता और असुरों के बीच युद्ध चल रहा था, तब असुरों में एक ऐसा योद्धा उत्पन्न हुआ जिसने धीरे-धीरे तीनों लोकों में भय फैला दिया। उसका नाम था जलंधर। समुद्र की अग्नि से जन्मा जलंधर अत्यंत शक्तिशाली था। उसका शरीर वज्र के समान कठोर था। उसकी शक्ति इतनी प्रचंड थी कि बड़े-बड़े देवता भी उससे युद्ध करने से घबराने लगे थे। लेकिन उसकी असली ताकत उसका बल नहीं था… उसकी सबसे बड़ी शक्ति थी उसकी पत्नी वृंदा की पतिव्रता। वृंदा भगवान विष्णु की परम भक्त थी। उसका मन अत्यंत पवित्र था। वह हर दिन भगवान का स्मरण करती, व्रत रखती और अपने पति की लंबी आयु के लिए तपस्या करती। उसके तप का प्रभाव इतना प्रबल था कि उसके पति जलंधर के चारों ओर एक अदृश्य दिव्य कवच बन गया था। जब तक वृंदा का पतिव्रत अटूट था… तब तक जलंधर को कोई पराजित नहीं कर सकता था। यही कारण था कि हर युद्ध में देवता हारने लगे। इंद्र का सिंहासन डगमगाने लगा। स्वर्ग लोक भय से कांप उठा। यहां तक कि कई देवता अपने लोक छोड़कर छिपने लगे। अंततः सभी देवता एक साथ वैकुंठ पहुंचे। उन्होंने भगवान विष्णु से प्रार्थना की, “प्रभु… यदि शीघ्र कुछ नहीं किया गया तो जलंधर पूरे ब्रह्मांड पर अधिकार कर लेगा।” भगवान विष्णु शांत बैठे सब सुनते रहे। वे जानते थे कि जलंधर को शक्ति उसके शस्त्रों से नहीं… वृंदा की निष्ठा से मिल रही है। जब तक उसका पतिव्रत सुरक्षित रहेगा… तब तक कोई भी देवता जलंधर को नहीं हरा पाएगा। लेकिन समस्या यह थी कि वृंदा स्वयं भगवान विष्णु की भक्त थी। वह उन्हें अपना आराध्य मानती थी। ऐसे में धर्म की रक्षा के लिए भगवान के सामने सबसे कठिन निर्णय खड़ा था। एक ओर समस्त सृष्टि का संतुलन था… और दूसरी ओर एक भक्त का अटूट विश्वास। कई क्षणों तक वैकुंठ में मौन छाया रहा। फिर अंततः भगवान विष्णु ने आंखें बंद कर लीं। वे समझ चुके थे कि धर्म की रक्षा के लिए उन्हें स्वयं अपने भक्त का विश्वास तोड़ना पड़ेगा। यह निर्णय आसान नहीं था। लेकिन कभी-कभी भगवान को भी ऐसे मार्ग चुनने पड़ते हैं जहां जीत के साथ पीड़ा भी जुड़ी होती है। उधर युद्धभूमि में भगवान शिव और जलंधर के बीच भयंकर युद्ध चल रहा था। आकाश अग्नि से भर गया था। पर्वत कांप रहे थे। समुद्र उफान मार रहा था। लेकिन हर बार जब शिवजी जलंधर पर प्रहार करते… वृंदा की पतिव्रता शक्ति उसे बचा लेती। इसी बीच भगवान विष्णु ने जलंधर का रूप धारण किया और वृंदा के महल की ओर बढ़ गए। उस समय वृंदा अपने पति की विजय के लिए पूजा कर रही थी। उसकी आंखें बंद थीं और हाथों में भगवान विष्णु की माला थी। तभी उसे अपने पति के कदमों की आहट सुनाई दी। उसने आंखें खोलीं… सामने जलंधर खड़ा था। वही स्वर… वही रूप… वही तेज। वृंदा के चेहरे पर मुस्कान आ गई। उसने तुरंत अपने पति के चरण छुए। उसी क्षण उसका ध्यान टूटा… उसकी तपस्या भंग हो गई… और उसी पल युद्धभूमि में जलंधर का दिव्य कवच टूट गया। भगवान शिव ने अवसर देखते ही अपना त्रिशूल उठाया और एक ही प्रहार में जलंधर का अंत कर दिया। कुछ ही क्षणों बाद वृंदा को धीरे-धीरे कुछ विचित्र महसूस होने लगा। उसके मन में अशांति पैदा हुई। उसने सामने खड़े व्यक्ति की आंखों में देखा… और अगले ही पल सत्य उसके सामने था। वह जलंधर नहीं था। वह स्वयं भगवान विष्णु थे। क्षण भर के लिए वृंदा का शरीर कांप उठा। उसके हाथों से पूजा की थाली गिर गई। उसकी आंखों में अविश्वास भर गया। जिस भगवान को वह अपना आराध्य मानती थी… जिनकी वह हर दिन पूजा करती थी… उन्हीं ने उसके विश्वास को एक अस्त्र की तरह प्रयोग किया था। उसका हृदय टूट चुका था। वह कांपती आवाज में बोली, “प्रभु… आपने मेरे साथ यह छल क्यों किया? मैंने तो आपको अपना ईश्वर माना था…” भगवान विष्णु मौन खड़े रहे। उनके पास इस पीड़ा का कोई उत्तर नहीं था। क्योंकि वे जानते थे कि धर्म की रक्षा के लिए उन्होंने एक भक्त का विश्वास तोड़ा है। वृंदा की आंखों से आंसू बहने लगे। लेकिन अगले ही क्षण उसकी पीड़ा अग्नि में बदल गई। वह क्रोध से कांप उठी। उसने भगवान विष्णु की ओर देखते हुए कहा— “जैसे आपने छल से मेरा पति छीना… वैसे ही आपका हर अवतार अधूरा रहेगा। आप प्रेम तो पाएंगे… लेकिन पूर्ण मिलन कभी नहीं होगा। राम बनोगे तो सीता साथ होकर भी साथ नहीं रहेंगी। कृष्ण बनोगे तो राधा से प्रेम अमर होगा… लेकिन मिलन अधूरा रहेगा।” उसके शब्दों के साथ पूरी सृष्टि में एक विचित्र कंपन फैल गया। देवता भयभीत हो उठे। क्योंकि एक पतिव्रता स्त्री का श्राप साधारण नहीं होता। लेकिन आश्चर्य की बात यह थी कि भगवान विष्णु क्रोधित नहीं हुए। उन्होंने शांत भाव से अपना मस्तक झुका लिया। उनकी आंखों में करुणा थी। वे धीरे से बोले, “माता… तुम्हारा श्राप मेरे लिए दंड नहीं… तपस्या है। क्योंकि इस संसार में भक्ति से बड़ा कुछ भी नहीं।” यह सुनकर भी वृंदा का दर्द कम नहीं हुआ। उसका विश्वास टूट चुका था। उसने धीरे-धीरे अग्नि की ओर कदम बढ़ाए। देवता उसे रोकना चाहते थे लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी। वृंदा ने आंखें बंद कीं… भगवान विष्णु का स्मरण किया… और अग्नि में प्रवेश कर गई। पूरा वातावरण मौन हो गया। कुछ समय बाद जहां वृंदा ने अपने प्राण त्यागे थे… उसी स्थान पर एक छोटा सा हरा पौधा उगा। उसकी सुगंध दिव्य थी। उसके पत्तों में अद्भुत शांति थी। देवताओं ने पहली बार ऐसा पौधा देखा था। तभी भगवान विष्णु वहां प्रकट हुए। उन्होंने उस पौधे को अपने हाथों से स्पर्श किया और बोले— “आज से तुम केवल वृंदा नहीं… तुलसी कहलाओगी। जहां-जहां मेरी पूजा होगी… वहां तुम्हारा स्थान सबसे ऊंचा होगा। तुम्हारे बिना मेरी आराधना कभी पूर्ण नहीं मानी जाएगी।” तभी से तुलसी माता को भगवान विष्णु की सबसे प्रिय माना गया। कहते हैं कि जिस घर में तुलसी होती है… वहां स्वयं भगवान का वास होता है। और यही कारण है कि आज भी भगवान विष्णु, श्रीराम और श्रीकृष्ण को तुलसी अर्पित किए बिना पूजा अधूरी मानी जाती है। समय बीता… युग बदले… लेकिन वृंदा का श्राप सत्य होता गया। त्रेता युग में भगवान विष्णु ने श्रीराम का अवतार लिया। उन्हें सीता माता मिलीं… लेकिन वनवास, रावण हरण और फिर प्रजा के कारण उन्हें सीता से अलग होना पड़ा। द्वापर युग में वे श्रीकृष्ण बने। राधा से ऐसा प्रेम हुआ जो संसार में अमर हो गया… लेकिन उनका पूर्ण मिलन कभी नहीं हो पाया। क्योंकि यह केवल एक स्त्री का श्राप नहीं था… यह टूटे हुए विश्वास की वेदना थी। और शायद इसी कारण भगवान विष्णु ने उस श्राप को भी प्रेमपूर्वक स्वीकार किया। कहते हैं भगवान अपने भक्तों की हर बात सुनते हैं… लेकिन कभी-कभी भक्तों का दर्द इतना गहरा होता है कि स्वयं भगवान भी उसके आगे मौन हो जाते हैं। जय श्री हरि। जय तुलसी माता।
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