sn vyas
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#हर हर महादेव भगवान महादेव से जुड़ा एक अत्यंत गूढ़ और महत्वपूर्ण विषय है — 'नीलकंठ और विषपान का वैज्ञानिक व आध्यात्मिक रहस्य' (संसार की नकारात्मकता को स्वीकार कर शांत रहने का कला-कौशल)। समुद्र मंथन की कथा में जब 'हलाहल' नामक अत्यंत विनाशकारी विष निकला, तो पूरी सृष्टि के अस्तित्व पर संकट आ गया। उस समय केवल महादेव ने ही आगे बढ़कर उस विष को ग्रहण किया। १. विष को न उगलना, न निगलना: कंठ में धारण करना शिव जी ने विष को पेट में नहीं उतारा, क्योंकि उससे सृष्टि का विनाश हो जाता। उन्होंने विष को बाहर भी नहीं थूका, क्योंकि उससे प्रकृति जल जाती। उन्होंने विष को अपने कंठ (गले) में ही रोक लिया, जिससे उनका कंठ नीला पड़ गया और वे 'नीलकंठ' कहलाए। यह इस बात का संदेश देता है कि जब जीवन में हमारे प्रति नकारात्मकता, कटु शब्द या विषैली परिस्थितियाँ आएँ, तो: उन्हें अंदर (पेट में) नहीं उतारना चाहिए, अन्यथा वे हमारे स्वास्थ्य और चरित्र को नष्ट कर देंगी। उन्हें तुरंत बाहर (दूसरों पर) भी नहीं उगलना चाहिए, क्योंकि उससे संबंध और समाज नष्ट होते हैं। उन्हें विशुद्धि चक्र (कंठ) पर विवेक और संयम से रोककर निष्प्रभावी बना देना चाहिए। २. मस्तक पर चंद्र और गंगा: विष के ताप को शांत करना विषपान करने के बाद भगवान शिव के शरीर का तापमान बहुत अधिक बढ़ गया था। उस दाह (जलन) को शांत करने के लिए उन्होंने मस्तक पर चंद्रमा धारण किया और गंगा जी को अपनी जटाओं में स्थान दिया। यह सिखाता है कि जब आप जीवन में कठिनाइयों या विष का सामना कर रहे हों, तो अपने दिमाग को चंद्रमा की तरह शीतल और विचारों को गंगा की तरह पवित्र बनाए रखना आवश्यक है। ३. विष को आभूषण बनाना जो विष पूरी दुनिया को मार सकता था, शिव जी ने उसे सहकर अपना आभूषण बना लिया। यह संदेश है कि एक सच्चा महायोगी या महान व्यक्ति वही है जो विषम परिस्थितियों, आलोचनाओं और दुखों को भी अपनी शक्ति और पहचान में बदल देता है।
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