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kirti Sahu - Author on ShareChat
kirti Sahu
712 views • 28 days ago
##जय मां गायत्री जय गुरुवर
मनोजवं मारुततुल्यवेगम् जितेद्रियियं बुद्धिमतां वरिष्ष्ठम् वातात्मजं वानरयू्थममुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्दये II 3থ: मैं मन के समान तेज गति वाले, वेगवान , वायु के समान इन्द्रियों को जीतने वाले, में श्रेष्ठ, बुद्धिमानों  নায়ুস্ুন্, নানযী ক্ষী মীনা ক সমুম্র, ক বুন श्रीराम हनुमान जी की शरण में जाता हूँ मनोजवं मारुततुल्यवेगम् जितेद्रियियं बुद्धिमतां वरिष्ष्ठम् वातात्मजं वानरयू्थममुख्यं श्रीरामदूतं शरणं प्रपद्दये II 3থ: मैं मन के समान तेज गति वाले, वेगवान , वायु के समान इन्द्रियों को जीतने वाले, में श्रेष्ठ, बुद्धिमानों  নায়ুস্ুন্, নানযী ক্ষী মীনা ক সমুম্র, ক বুন श्रीराम हनुमान जी की शरण में जाता हूँ
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    अनिल साहू
    #जय माँ गायत्री जय गुरुवर
    हरि शरणं ٥پ जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले गलेडवलम्ब्य लम्बितां भुजंगतुंगमालिकाम् डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम् जिन शिव जी की सघन जटाओं रूपी जंगल से बहने वाली गंगा जी की धाराओं से जिनका कण्ठ पवित्र है, जिनके गले में बड़े-बड़े सर्पों की मालाएं लटक रही हैं और जो కT-ST डमरू बजाकर नृत्य कर रहे हैं॰ वे भगवान शिव  எisq हमारा कल्याण करें ஈழ 5< 5< #6144 0 हरि शरणं ٥پ जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले गलेडवलम्ब्य लम्बितां भुजंगतुंगमालिकाम् डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम् जिन शिव जी की सघन जटाओं रूपी जंगल से बहने वाली गंगा जी की धाराओं से जिनका कण्ठ पवित्र है, जिनके गले में बड़े-बड़े सर्पों की मालाएं लटक रही हैं और जो కT-ST डमरू बजाकर नृत्य कर रहे हैं॰ वे भगवान शिव  எisq हमारा कल्याण करें ஈழ 5< 5< #6144 0
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    अनिल साहू
    #जय माँ गायत्री जय गुरुवर
    ಎು आभियान 3@ পসিম্রাল n अमियान  ப अभियान प्रज्ञा 3সিযান प्रज्ञा హన్న কর মাথ दूसरों वह व्यवहार करो , जो तुम्हें 7 अपने लिए पसंद नहीं | पं. श्रीराम शर्मा आचार्य शताव्दी दीप ಕಿ अगवती  I ? ೯ಯ 92 থন 1926 2026 {  +7 u 0261 WWW awgp org WWWdSvv ac in प्रज्ञा अभियान, पत्रिका विभाग, शान्तिकुञ्ज हरिद्वार pragyaabhiyan@awgp.org +91 9258-369-725  ಎು आभियान 3@ পসিম্রাল n अमियान  ப अभियान प्रज्ञा 3সিযান प्रज्ञा హన్న কর মাথ दूसरों वह व्यवहार करो , जो तुम्हें 7 अपने लिए पसंद नहीं | पं. श्रीराम शर्मा आचार्य शताव्दी दीप ಕಿ अगवती  I ? ೯ಯ 92 থন 1926 2026 {  +7 u 0261 WWW awgp org WWWdSvv ac in प्रज्ञा अभियान, पत्रिका विभाग, शान्तिकुञ्ज हरिद्वार pragyaabhiyan@awgp.org +91 9258-369-725
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    अनिल साहू
    #जय माँ गायत्री जय गुरुवर
    शुभ अरुणोदय विचार और व्यवहार में सम्बन्ध तो देखिए..! कभी एक विचार व्यवहार बदल देता है.. और कभी एक व्यवहार विचार बदल देता है..!! गुरुदेव जय शुभ अरुणोदय विचार और व्यवहार में सम्बन्ध तो देखिए..! कभी एक विचार व्यवहार बदल देता है.. और कभी एक व्यवहार विचार बदल देता है..!! गुरुदेव जय
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  • अनिल साहू - Author on ShareChat
    अनिल साहू
    #जय माँ गायत्री जय गुरुवर
    अपने आप को पहचानिए केवल भौतिक उन्नति चाहने वाला व्यक्ति अपनी आत्मा का हनन करता है और जो व्यक्ति भौतिक लाभ के लिए सत्य पथ से विचलित नहीं होता, वह दिन-दिन ऊँचा उठता जाता है Pஈ उसकी सूक्ष्म शक्तियाँ बढ़ती रहती हैं, क्योंकि आत्मा के गुणों লিব  अनुकूल चलना ही अपने शक्ति का स्रोत खोल लेना है। अपने को शरीर मानकर उसके अनुरूप कार्य करने वाला वस्तुएँ नहीं रह सकता, क्योंकि भौतिक व्यक्ति कभी भी 97 परिवर्तनशील होती हैं, उनमें स्थायित्व नहीं होता। उनको एक दिन क्षीण होना ही है, इसलिए उनके साथ ममत्व रखने वाला अपने को शरीर व्यक्ति रहेगा ही वाला ही काम, समझने दुःखी क्रोध, लोभ॰ मोह, अहंकार को, जो उसकी शत्रुओं महान् जड़ों को काटते रहते हैँ, अपना मित्र समझता और अपने कार्यों में इनको प्रवेश करने की सहर्ष आज्ञा देता है, जिससे उसका लौकिक पारलौकिक दोनों प्रकार का पतन अवश्यंभावी है। व अपने आप को आत्मा मानने वाला निरंतर सुख-शांति की वह किसी भी सांसारिक वस्तु के क्षीण होने से ओर बढ़ता है अपनी क्षति नहीं मानता। वह धन, ऐश्वर्य और वैभव के लिए झूठ, छल, कपट आदि निंदनीय उपायों को कभी नहीं अपनाता काम, क्रोध आदि उसके पास फटक नहीं सकते । यदि हम चाहते हैं कि हम दुःख के जाल से निकल कर आनंद की सीमा में प्रवेश करें, तो हमें अपने आप को पहचानने का प्रय्नत्न करना चाहिए। ज्योति अक्टूबर १९५९ पृष्ठ ८ ९ २६३ -अखण्ड अपने आप को पहचानिए केवल भौतिक उन्नति चाहने वाला व्यक्ति अपनी आत्मा का हनन करता है और जो व्यक्ति भौतिक लाभ के लिए सत्य पथ से विचलित नहीं होता, वह दिन-दिन ऊँचा उठता जाता है Pஈ उसकी सूक्ष्म शक्तियाँ बढ़ती रहती हैं, क्योंकि आत्मा के गुणों লিব  अनुकूल चलना ही अपने शक्ति का स्रोत खोल लेना है। अपने को शरीर मानकर उसके अनुरूप कार्य करने वाला वस्तुएँ नहीं रह सकता, क्योंकि भौतिक व्यक्ति कभी भी 97 परिवर्तनशील होती हैं, उनमें स्थायित्व नहीं होता। उनको एक दिन क्षीण होना ही है, इसलिए उनके साथ ममत्व रखने वाला अपने को शरीर व्यक्ति रहेगा ही वाला ही काम, समझने दुःखी क्रोध, लोभ॰ मोह, अहंकार को, जो उसकी शत्रुओं महान् जड़ों को काटते रहते हैँ, अपना मित्र समझता और अपने कार्यों में इनको प्रवेश करने की सहर्ष आज्ञा देता है, जिससे उसका लौकिक पारलौकिक दोनों प्रकार का पतन अवश्यंभावी है। व अपने आप को आत्मा मानने वाला निरंतर सुख-शांति की वह किसी भी सांसारिक वस्तु के क्षीण होने से ओर बढ़ता है अपनी क्षति नहीं मानता। वह धन, ऐश्वर्य और वैभव के लिए झूठ, छल, कपट आदि निंदनीय उपायों को कभी नहीं अपनाता काम, क्रोध आदि उसके पास फटक नहीं सकते । यदि हम चाहते हैं कि हम दुःख के जाल से निकल कर आनंद की सीमा में प्रवेश करें, तो हमें अपने आप को पहचानने का प्रय्नत्न करना चाहिए। ज्योति अक्टूबर १९५९ पृष्ठ ८ ९ २६३ -अखण्ड
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    अनिल साहू
    #जय माँ गायत्री जय गुरुवर
    क्रोध, अहंकार और लोभ मनुष्य की सबसे बड़ी दुर्बलताएँ हैं; इन्हें त्यागना ही वास्तविक साधना है। हम बदलेंगे युग बदलेगा , हम सुधरेंगे युग सुधरेगा | क्रोध, अहंकार और लोभ मनुष्य की सबसे बड़ी दुर्बलताएँ हैं; इन्हें त्यागना ही वास्तविक साधना है। हम बदलेंगे युग बदलेगा , हम सुधरेंगे युग सुधरेगा |
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    अनिल साहू
    #जय माँ गायत्री जय गुरुवर
    हरि शरणं जनकसुता जग जननि जानकी, अतिसय प्रिय करुनानिधान की, ताके जुग पद कमल मनावउँ, निरमल मति पावउँ कृपाँ जासु पुत्री, जगत् की माता और करुणा निधान श्री राजा जनक की रामचन्द्रजी की प्रियतमा श्री जानकीजी के दोनों चरण कमलों को मैं मनाता हूँ॰ जिनकी कृपा से निर्मल बुद्धि पाऊँ श्रीरामचरितमानस, बालकांड १७/४ हरि शरणं जनकसुता जग जननि जानकी, अतिसय प्रिय करुनानिधान की, ताके जुग पद कमल मनावउँ, निरमल मति पावउँ कृपाँ जासु पुत्री, जगत् की माता और करुणा निधान श्री राजा जनक की रामचन्द्रजी की प्रियतमा श्री जानकीजी के दोनों चरण कमलों को मैं मनाता हूँ॰ जिनकी कृपा से निर्मल बुद्धि पाऊँ श्रीरामचरितमानस, बालकांड १७/४
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    kirti Sahu
    ##जय मां गायत्री जय गुरुवर
    श्री रामचरितमानस चौपाई ।। जिमि सरिता सागर मंहु जाही। जद्यपि ताहि कामना नाहीं | जैसे सभी नदियाँ बिना किसी स्वार्थ के स्वाभाविक रूप से समुद्ध में जाकर मिल जाती हैं, वैसे ही सच्चा भक्त अंततः में पहुँच जाता है। भगवान की शरण 02025 Bhakti Bhauna Powered by @Bablu_dwivedi418 श्री रामचरितमानस चौपाई ।। जिमि सरिता सागर मंहु जाही। जद्यपि ताहि कामना नाहीं | जैसे सभी नदियाँ बिना किसी स्वार्थ के स्वाभाविक रूप से समुद्ध में जाकर मिल जाती हैं, वैसे ही सच्चा भक्त अंततः में पहुँच जाता है। भगवान की शरण 02025 Bhakti Bhauna Powered by @Bablu_dwivedi418
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  • अनिल साहू - Author on ShareChat
    अनिल साहू
    #जय माँ गायत्री जय गुरुवर
    हरि शरणं बिबसहुँ जासु नाम नर कहहीं जनम अनेक रचित अघ दहहीं सुमिरन जे नर करहीं सादर भव बारिधि गोपद इव तरहीं तुलसीदास जी कहते हैं कि अनजाने या मजबूरी में भी लिया गया राम   नाम जन्मों के पाप मिटा देता है॰ ऐसे में जो साधक पूर्ण श्रद्धा और प्रेम से লিব नाम-्जप करते हैं॰ उनके यह विशाल भवसागर गाय के खुर से बने छोटे से गड्ढे के समान सुगम होे जाता है और वे सहज ही मोक्ष पा लेते हैं। जय सियाराम
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  • kirti Sahu - Author on ShareChat
    kirti Sahu
    ##जय मां गायत्री जय गुरुवर
    हरि शरणं तिन्ह तेँ खर सूकर खान भले जड़ताबस ते न कहैं கg 4 जेहि राम सों नेह नहीं तुलसी सो सही पसु पूँछ बिखान न द्वै तुलसीदास जी कहते हैं कि उन मनुष्यों से तो गधे और सूअर की योनि में उत्पन्न होना अधिक भला है, क्योंकि वे कम से के कारण कुछ (गलत या कम अपनी अज्ञानता व मूर्खता अधर्म ) बोलते तो नहीं हैं॰ लेकिन हे जिस मनुष्य का तुलसी! प्रभु श्री राम से सच्चा प्रेम या स्नेह नहीं है, वह बिना सींग और पूंछ का साक्षात पशु ही है॰ इस बात को कहने में कोई संदेह नहीं है, अर्थात बिना राम॰प्रेम के मनुष्य के पास केवल मनुष्य का शरीर होता है, परंतु उसके आचरण, सोच और आत्मिक स्तर में और एक जानवर में कोई अंतर नहीं रह जाता, वह केवल एक बिना पूंछ और सींग का पशुं है
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