ShareChat
click to see wallet page
search
#❤️जीवन की सीख #📖जीवन का लक्ष्य🤔 #🙏 प्रेरणादायक विचार #गीता #🙏गीता ज्ञान🛕
❤️जीवन की सीख - शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्। दानमींश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम् I। शूरवीरता, तेज, धैर्य, चतुरता और 7 युद्धमें  भागना, दान देना और स्वामिभाव  ये सब-्के- सब ही क्षत्रियके स्वाभाविक कर्म हैँ Il ४३ Il कृपिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्। परिचर्यांत्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् I।  खेती,  गोपालन और क्रय-विक्रयरूप सत्य व्यवहार * ये वैश्यके स्वाभाविक कर्म हैँ। तथा सब वर्णोंको सेवा करना शूद्रका भौ स्वाभाविक க 8Il%8Il स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्द्धि लभते नरः | स्वकर्मनिरतः सिद्धि यथा विन्दति तच्छृणु I१  अपने अपने स्वाभाविक कर्मोंमैें तत्परतासे लगा हुआ मनुप्य भगवत्प्राप्तिरूप परम सिद्धिको प्राप्त हा जाता है। अपने स्वाभाविक कर्ममें लगा हुआ मनुष्य जिस प्रकारसे कर्म करके परम सिद्धिको प्राप्त होता है, उस विधिको तू सुन ।I ४५ II वस्तुऔकै खरीदने और वैचनरमें तील नाप और गिनतो आदिसे कम दैना अथवा अधिक लैना एवं वस्तुको चदलकर या एक बस्तुमें दूसरी (खराव) बस्तु मिलाकर दै दैना अथवा (अच्छो ) ले लेना तथा नफा आढ़त और दलालो ठहराकर ठनसै अधिक दाप लेना या कम दैना तथा झूठ कपट  चोरी और जवरदस्तीसे अथवा अन्य किसी प्रकारसे हकको হূমনে ग्रहण कर लेना इत्यादि दोपौंसे रहित जो सत्यतापूर्वक पवित्र वस्तुऔंका व्यापार हैं उसका नाम ' सत्यव्यवहार ' ह। श्रीमढ्भगवढ्गीता अध्याय १८ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्। दानमींश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम् I। शूरवीरता, तेज, धैर्य, चतुरता और 7 युद्धमें  भागना, दान देना और स्वामिभाव  ये सब-्के- सब ही क्षत्रियके स्वाभाविक कर्म हैँ Il ४३ Il कृपिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्। परिचर्यांत्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् I।  खेती,  गोपालन और क्रय-विक्रयरूप सत्य व्यवहार * ये वैश्यके स्वाभाविक कर्म हैँ। तथा सब वर्णोंको सेवा करना शूद्रका भौ स्वाभाविक க 8Il%8Il स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्द्धि लभते नरः | स्वकर्मनिरतः सिद्धि यथा विन्दति तच्छृणु I१  अपने अपने स्वाभाविक कर्मोंमैें तत्परतासे लगा हुआ मनुप्य भगवत्प्राप्तिरूप परम सिद्धिको प्राप्त हा जाता है। अपने स्वाभाविक कर्ममें लगा हुआ मनुष्य जिस प्रकारसे कर्म करके परम सिद्धिको प्राप्त होता है, उस विधिको तू सुन ।I ४५ II वस्तुऔकै खरीदने और वैचनरमें तील नाप और गिनतो आदिसे कम दैना अथवा अधिक लैना एवं वस्तुको चदलकर या एक बस्तुमें दूसरी (खराव) बस्तु मिलाकर दै दैना अथवा (अच्छो ) ले लेना तथा नफा आढ़त और दलालो ठहराकर ठनसै अधिक दाप लेना या कम दैना तथा झूठ कपट  चोरी और जवरदस्तीसे अथवा अन्य किसी प्रकारसे हकको হূমনে ग्रहण कर लेना इत्यादि दोपौंसे रहित जो सत्यतापूर्वक पवित्र वस्तुऔंका व्यापार हैं उसका नाम ' सत्यव्यवहार ' ह। श्रीमढ्भगवढ्गीता अध्याय १८ गीता प्रेस, गोरखपुर से साभार - ShareChat