sn vyas
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#🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏श्रीमद्भागवत गीता📙
💐|| सब कुछ भगवान ही हैं ||💐
* शरीर - इंद्रियाँ - मन - बुद्धि से जो भी सात्विक , राजस और तामस भाव , क्रिया , पदार्थ आदि ग्रहण किये जाते हैं , वे सब भगवान ही हैं | मन की स्फुरणा मात्र भगवान ही है |
* संसार में अच्छा - बुरा , शुद्ध - अशुद्ध , शत्रु - मित्र , दुष्ट - सज्जन , पापात्मा - पुण्यात्मा आदि जो कुछ भी देखने , सुनने , कहने , सोचने , समझने आदि में आता है , वह सब - का - सब केवल भगवान ही है |
शरीर - शरीरी , क्षेत्र - क्षेत्रज्ञ , अपरा - परा , क्षर - अक्षर आदि सब केवल भगवान ही हैं |
जब सब कुछ भगवान ही है तो फिर उसमें " मैं " कहाँ से आये ? " मैं " है ही नहीं , केवल तू - ही - तू है -
तू तू करता तू भया , मुझमें रही न हूँ |
वारी फेरी बलि गई , जित देखूँ तित तू ||
* अब भगवान की प्राप्ति में देरी किस बात की है ? भगवत् प्राप्ति तत्काल होने वाली वस्तु है !
* मान लो कि हम एक नदी को देख रहे हैं | किसी जानकार व्यक्ति ने हमारे से कहा कि यह नदी गंगाजी है | यह सुनते ही हमारी भावना बदल गयी , द्रष्टि बदल गयी | इसमें देरी क्या लगी ? परिश्रम ( अभ्यास ) क्या करना पडा ? किस क्रिया और पदार्थ की आवश्यकता पडी ?
* सब कुछ भगवान ही हैं - इस वास्तविक बात को स्वीकार करने के लिये न कोई ग्रंथ पढना है , न कोई ध्यान करना है , न कोई चिन्तन करना है , न श्रवण - मनन - निदिध्यासन करना है , न आँख मींचनी है , न कान मूँदने है , न नाक दबानी है , न जंगल जाना है , न गुफा में जाना है , न हिमालय में जाना है !
* केवल अपनी सत्ता को अलग न रख कर भगवान में मिला देना है |
" मैं और "मेरा" को छोड कर " तू " और " तेरा " को स्वीकार करना है | फिर " तेरा " भी नहीं रहे प्रत्युत तू - ही - तू रह जाये |
" मैं " की जगह केवल भगवान ही रह जायें !
* यह सिद्धान्त है कि जो बस्तु सब समय में मौजूद होती है , उसकी प्राप्ति के लिये भविष्य की अपेक्षा नहीं होती और जो बस्तु सब जगह मौजूद होती है , उसकी प्राप्ति किसी क्रिया तथा पदार्थ से नहीं होती |
* कहीं जाने से जो परमात्मा मिलेंगें , वे ही परमात्मा जहाँ हम हैं वहाँ पूरे - के - पूरे हैं ! कहीं जाने की , कुछ बदलने की जरूरत नहीं है केवल मन बदलने की जरूरत है !
* वास्तव में जीव अपने मन की भावना से ही बँधता तथा मुक्त होता है !
सब जग ईश्वर रूप है बुरो - भलो नहिं कोय |
जाकी जैसी भावना तैसो ही फल होय ||
🍃 || श्री हरि: शरणम् ||🍃
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