sn vyas
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#जय श्री राम 🌹 मर्यादा पुरूषोत्तम श्री राम का वैदिक चरित्र 🌹 श्री राम में मनुष्योचित गुण ही विद्यमान थे अतः इन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम कहें या फिर भगवान् श्री राम भग् अर्थात सम्पूर्ण ऐश्वर्य,यश,श्री,सत्य,ज्ञान और वैराग्य इन छः गुण और इनके स्वामी को भगवान कहते हैं। परन्तु ईश्वर कदाचित नहीं, क्योंकि ईश्वर भला अपनी ही उपासना क्यों करने लगा ? 🌹श्लोक🌹 शैशवेऽभ्यस्तविद्यानां यौवने विषयैषिणाम् । वार्धके मुनिवृत्तिनां योगेनान्ते तनुत्यजाम् ।। (रघुवंश १/८) 🌹अर्थ🌹 रघुवंशी बालकपन में समस्त विद्याओं का अभ्यास कर लेते थे। युवावस्था में वे गृहस्थाश्रम में प्रवेश कर भोगों की अभिलाषा करते थे। बुढ़ापे में वे वानप्रस्थी बन जाते थे और अन्त में योगाभ्यास करते हुए अपने शरीरों का त्याग करते थे। परन्तु,*मर्यादा पुरुषोत्तम राम* इसके अपवाद थे- 🌹श्लोक🌹 *पुत्रसंक्रान्तलक्ष्मीकैर्यद् वृद्धेक्ष्वाकुभिर्धृतम् ।* *धृतं बाल्ये तदार्येण पुण्यमारण्यकव्रतम् ।।- (उत्तररामचरित १/१२)* 🌹अर्थ🌹 पुत्र को राज्यलक्ष्मी सौंपकर इक्ष्वाकुवंशोत्पन्न राजा वृद्धावस्था में जिस वानप्रस्थ-व्रत को धारण करते थे, श्रीराम ने उस पवित्र व्रत को यौवनावस्था में ही धारण कर लिया था। युवावस्था और जीवन में प्रसन्नतापूर्वक वन में चले जाना ही श्रीराम के गौरव को बढ़ाता है। श्रीराम वन में जाते हैं परन्तु उनके मुखमण्डल पर विषाद की रेखा तक नहीं है। उनकी स्थिति के सम्बन्ध में महाराज दशरथ ने महाकाव्य ३/२२ में ठीक ही कहा था- 🌹श्लोक🌹 *आहूतस्याभिषेकाय विसृष्टस्य वनाय च ।* *न मया लक्षितस्तस्य स्वल्पोऽप्याकारविभ्रमः ।।* 🌹अर्थ🌹 राज्याभिषेक के लिए बुलाए गए और वन के लिए विदा किये गए श्रीराम के मुख के आकार में मैंने कोई भी अन्तर नहीं देखा। हर्ष और शोक में,सुख और दुःख में,मान और अपमान में,लाभ और हानि में समान रहना यह महापुरुषों का चिन्ह होता है। किसी कवि ने कितना सुन्दर कहा है- 🌹श्लोक🌹 *उदये सविता रक्तो रक्तश्चास्तमये तथा ।* *सम्पत्तौ च विपत्तौ च महतामेकरुपता ।।* 🌹अर्थ🌹 उदय होता हुआ सूर्य लाल होता है और अस्त होता हुआ सूर्य भी लाल ही होता है,इसी प्रकार सम्पत्ति और विपत्ति में महापुरुष समान ही होते हैं। सम्पत्ति प्राप्त होने पर हर्षित नहीं होते और विपत्ति पड़ने पर दुःखी नहीं होते। प्रक्षिप्त भाग को छोड़कर जब हम शुद्ध रामायण या शुद्ध महाभारत का स्वाध्याय करते हैं तो हमें वास्तविक इतिहास का ज्ञान होता है । 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹 उसके कुछ प्रसंग उद्धृत किये जाते हैं - 🌹राम की दिनचर्या🌹 🌹श्लोक🌹 "कौशल्या सुप्रजा राम पूर्वा सन्ध्या प्रवर्तते। उत्तिष्ठ नरशार्दूल कर्तव्यं दैवमाह्मिकम्।। तस्यर्षे: परमोदारं वच: श्रुत्वा न्रपात्मजौ। स्नात्वा क्रतोदकौ वीरो जपेतु परमं जपम्।।" (बाल० २३.३) 🌹अर्थ🌹 'हे कौशल्या की संतान! प्रात:काल की सन्ध्या का समय हो गया है। हे धरशार्दूल ! उठो और उपासना करो। उस ऋषि के परम उदार वचनों को सुनकर, स्नान करके उन दोनों, श्रीराम और श्रीलक्ष्मण जी ने गायत्री का जाप किया। रामायण में यह नहीं लिखा कि उन्होंने मूर्तिपूजा की। 🌹राम स्थितप्रज्ञ थे―🌹 *संसार में हम देखते हैं कि जब कभी हमारी इच्छापूर्ति में कोई छोटा मोटा भी आघात उपस्थित करता है, तो हम उसके प्रति कुपित ही नहीं प्रत्युत मरने-मारने को भी तैयार हो जाते हैं। किन्तु श्रीराम असाधारण योगीसम स्थिरप्रज्ञ थे जो बड़े से बड़े कष्ट के समय भी लेशमात्र विचलित नहीं होते थे। इसीलिए महर्षि वाल्मीकि लिखते हैं― 🌹श्लोक🌹 न वनं गन्तुकामस्य त्यजतश्च वसुन्धराम्। सर्वलोकातिगस्येव लक्ष्यते चित्तविक्रिया ।। ―(वा०रा० अयो० १९/३३) 🌹अर्थ🌹 जिस समय श्रीराम को राजतिलक के लिए बुलाया गया तथा जिस समय उनको १४ वर्ष के वनवास के लिए कहा गया, ऐसे हर्षविषाद के समय में भी श्रीराम की मुखाकृति में कोई अन्तर नहीं था अर्थात् न तो युवराज बनने की खुशी और न ही वनवास जाते समय विषाद के चिन्ह थे। ऐसा सुख-दुःख में समता से रहने वाला व्यक्ति पूर्ण वेदज्ञ व स्थिरप्रज्ञ ही हो सकता है। 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹 🌹शत्रु के साथ भी आदर्श व्यवहार🌹 रावण द्वारा वानर-सेना का संहार होते देख श्रीराम रावण के सम्मुख आये। श्रीराम ने अपना अद्भुत युद्ध-कौशल दिखाते हुए रावण के रथ के टुकड़े कर डाले। उसके घोड़े और सारथि को भी मार गिराया और रावण के चमचमाते मुकुट को भी काट डाला। सन्ध्या-समय निकट देख श्रीराम ने रावण से कहा― 🌹श्लोक🌹 कृतं त्वया कर्म महत्सुभीमं, हतप्रवीरश्च कृतस्त्वयाहम् । तस्मात्परिश्रान्त इव व्यवस्य, न त्वां शरैर्मृत्युवशं नयामि ।। ―(वा०रामा०यु० ५९/१४२) 🌹अर्थ🌹 प्रातःकाल से घोर युद्ध करते हुए आपने बड़े वीरत्व का परिचय दिया है। आज आपके द्वारा हमारी सेना के बहुत-से वीर मारे अथवा घायल किये गये हैं। अत्यन्त थके होने के कारण आपका वध करना बहुत सरल है, परन्तु थके हुए शत्रु का वध करना आर्य-मान और मर्यादा के विरूद्ध है, अतः अब आप घर जाइये। जब स्वस्थ होकर कल आप पुनः युद्ध में आयेंगे तब मैं आपका युद्धोचित स्वागत करुँगा। श्रीराम शत्रु थे। परन्तु कितने आदर्श शत्रु थे ! रावण भी मन-ही-मन श्रीराम के शील और पराक्रम की प्रशंसा करता हुआ नगर में प्रविष्ट हुआ और श्रीराम जी अपने डेरे में पहुँचकर लक्ष्मण जी के उपचार में लगे। दूसरी जगह श्रीराम ने रावण की अन्त्येष्टि का आदेश देते हुए विभीषण से कहा― 🌹श्लोक🌹 मरणान्तानि वैराणि निर्वृत्तं नः प्रयोजनम्। क्रियतामस्य संस्कारो ममाप्येष यथा तव।। ―(वा०रामा० यु० ११२/२६) 🌹अर्थ🌹 मरने तक ही वैर रहता है। अब हमारा प्रयोजन सिद्ध हो चुका है, अतः अब यह जैसा तुम्हारा भाई है वैसा ही मेरा भी है। अतएव इसका यथोचित संस्कार कीजिये। कैसा उच्च और महान् आदर्शमय जीवन था श्री राम जी हमारे आर्य महापुरुष का कितने ही उत्कृष्ट ईश्वर भक्त थे कितने बड़े वेदों के व्यावहारिक विद्वान थे इनके गुणों को इनके आदर्शों को अपने जीवन में धारण करें इनके मार्ग पर चलें यही श्री राम की सत्य पूजा है। 🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹🌹
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