sn vyas
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भगवान विष्णु की महागाथा – सृष्टि के पालनहार की अद्भुत कथा
सृष्टि के आरंभ से पहले चारों ओर केवल असीम जलराशि थी। न दिन था, न रात, न पृथ्वी, न आकाश और न ही कोई जीव। उस अनंत शून्य में केवल एक दिव्य सत्ता विद्यमान थी—भगवान विष्णु। वे क्षीरसागर में शेषनाग की अनंत शैय्या पर योगनिद्रा में विराजमान थे। उनके शांत मुखमंडल से ऐसी दिव्य आभा निकल रही थी जिससे समस्त ब्रह्मांड का भविष्य छिपा हुआ था। उनके प्रत्येक श्वास के साथ अनगिनत लोकों की संभावनाएँ जन्म ले रही थीं। उस समय न समय का बंधन था और न ही किसी प्रकार का भय। केवल भगवान विष्णु का अनंत अस्तित्व ही सत्य था।
कुछ समय पश्चात भगवान विष्णु की नाभि से एक दिव्य कमल प्रकट हुआ। वह कमल धीरे-धीरे विशाल होता गया और उसके ऊपर चार मुखों वाले ब्रह्माजी प्रकट हुए। ब्रह्माजी ने चारों ओर देखा, पर उन्हें केवल जल ही जल दिखाई दिया। उन्हें समझ नहीं आया कि वे कौन हैं और उनका उद्देश्य क्या है। तभी आकाशवाणी हुई—"हे ब्रह्मा, तप करो।" वर्षों तक तपस्या करने के बाद भगवान विष्णु उनके सामने प्रकट हुए और बोले, "हे ब्रह्मा, तुम सृष्टि की रचना करो। मैं उसका पालन करूंगा और समय आने पर भगवान शिव उसका संहार करेंगे।" इसी प्रकार सृष्टि के तीन महान कार्यों का आरंभ हुआ।
ब्रह्माजी ने पर्वत, नदियाँ, वन, पशु-पक्षी और मनुष्यों की रचना की। धीरे-धीरे पृथ्वी जीवन से भरने लगी। परंतु जहाँ प्रकाश होता है, वहाँ अंधकार भी जन्म लेता है। कुछ समय बाद असुरों का उदय हुआ। उनका उद्देश्य केवल शक्ति प्राप्त करना और तीनों लोकों पर अधिकार करना था। वे देवताओं पर आक्रमण करने लगे, यज्ञों में बाधा डालने लगे और धर्म का नाश करने लगे। जब भी अधर्म बढ़ता, देवता भगवान विष्णु की शरण में जाते और विष्णु मुस्कुराकर कहते, "धर्म की रक्षा मेरा वचन है।"
समय बीतता गया और पृथ्वी पर पहला बड़ा संकट आया। हिरण्याक्ष नामक असुर ने अपनी अपार शक्ति के बल पर पृथ्वी को समुद्र की गहराइयों में डुबो दिया। चारों ओर हाहाकार मच गया। देवताओं ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की। तब भगवान विष्णु ने वराह अवतार धारण किया। उनका विशाल शरीर पर्वत के समान था और उनकी गर्जना से दिशाएँ कांप उठीं। वे समुद्र की अथाह गहराइयों में उतरे, जहाँ हिरण्याक्ष उनका मार्ग रोककर खड़ा था। दोनों के बीच भयंकर युद्ध हुआ। अंततः भगवान विष्णु ने अपने दिव्य दांतों पर पृथ्वी को उठाया और उसे पुनः उसके स्थान पर स्थापित कर दिया। संसार ने पहली बार देखा कि पालनहार केवल रक्षा ही नहीं करते, आवश्यकता पड़ने पर युद्ध भी करते हैं।
कुछ वर्षों बाद हिरण्याक्ष का भाई हिरण्यकशिपु भी अत्याचारी बन गया। उसने कठोर तपस्या करके ऐसा वरदान प्राप्त किया कि उसे कोई देव, दानव, मनुष्य, पशु, दिन, रात, अस्त्र या शस्त्र से नहीं मार सकता था। वह स्वयं को भगवान घोषित करने लगा। किंतु उसका पुत्र प्रह्लाद भगवान विष्णु का अनन्य भक्त था। हिरण्यकशिपु ने उसे अनेक यातनाएँ दीं, पर प्रह्लाद का विश्वास कभी नहीं डिगा। अंत में क्रोधित होकर उसने पूछा, "क्या तुम्हारा विष्णु इस खंभे में भी है?" प्रह्लाद ने शांत स्वर में उत्तर दिया, "प्रभु हर जगह हैं।" तभी खंभा फट गया और भगवान विष्णु नरसिंह रूप में प्रकट हुए। न वे पूर्ण मनुष्य थे, न पशु। उन्होंने संध्या समय चौखट पर बैठकर अपने नखों से हिरण्यकशिपु का अंत कर दिया। इस प्रकार भगवान ने सिद्ध कर दिया कि अहंकार चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो, धर्म की विजय निश्चित होती है।
एक समय राजा बलि ने अपने पराक्रम से तीनों लोक जीत लिए। वह दानी था, पर धीरे-धीरे उसे अपनी शक्ति पर गर्व होने लगा। तब भगवान विष्णु वामन नामक छोटे ब्राह्मण बालक का रूप धारण करके उसके यज्ञ में पहुँचे। उन्होंने केवल तीन पग भूमि माँगी। बलि ने हँसते हुए वचन दे दिया। तभी वामन का रूप विराट हो गया। पहले कदम में उन्होंने पृथ्वी नाप ली, दूसरे में स्वर्ग और तीसरे कदम के लिए स्थान न बचा। तब राजा बलि ने अपना सिर भगवान के चरणों में झुका दिया। भगवान विष्णु उसकी विनम्रता से प्रसन्न हुए और उसे पाताल लोक का राजा बना दिया। उन्होंने यह भी वचन दिया कि वे स्वयं उसके द्वार पर पहरा देंगे। इस कथा ने संसार को सिखाया कि दान से बड़ा गुण विनम्रता है।
समय के साथ पृथ्वी पर रावण का अत्याचार बढ़ने लगा। वह महान विद्वान था, परंतु अहंकार ने उसे अधर्म के मार्ग पर पहुँचा दिया। तब भगवान विष्णु ने श्रीराम के रूप में अवतार लिया। उन्होंने वनवास स्वीकार किया, ऋषियों की रक्षा की, सुग्रीव और हनुमान जैसे भक्तों को अपनाया और अंततः रावण का वध कर धर्म की पुनः स्थापना की। श्रीराम ने अपने जीवन से संसार को यह संदेश दिया कि सत्य, मर्यादा और वचनपालन ही मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति है।
द्वापर युग में जब कंस, जरासंध और दुर्योधन जैसे अधर्मी पृथ्वी पर अत्याचार करने लगे, तब भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण के रूप में जन्म लिया। बाल्यकाल में उन्होंने पूतना, तृणावर्त, कालिय नाग और अनेक राक्षसों का अंत किया। युवावस्था में उन्होंने मथुरा को अत्याचार से मुक्त कराया और आगे चलकर महाभारत के युद्ध में अर्जुन के सारथी बने। युद्धभूमि में अर्जुन मोह में पड़ गए। तब भगवान कृष्ण ने उन्हें भगवद्गीता का दिव्य ज्ञान दिया। उन्होंने कहा, "जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म बढ़ता है, तब-तब मैं स्वयं अवतार लेता हूँ।"
भगवान विष्णु का प्रत्येक अवतार केवल किसी राक्षस का वध करने के लिए नहीं था। उनका उद्देश्य मानवता को सही मार्ग दिखाना था। उन्होंने सिखाया कि शक्ति का उपयोग केवल रक्षा के लिए होना चाहिए, ज्ञान का उपयोग विनम्रता के साथ करना चाहिए और भक्ति का अर्थ केवल पूजा नहीं बल्कि सत्य, करुणा और धर्म का पालन करना है।
आज भी करोड़ों भक्त भगवान विष्णु का स्मरण करते हैं। कोई उन्हें श्रीहरि कहता है, कोई नारायण, कोई गोविंद, कोई माधव और कोई जगन्नाथ। नाम अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन उनका स्वरूप एक ही है—सृष्टि के पालनहार, भक्तों के रक्षक और धर्म के आधार।
कहा जाता है कि जो व्यक्ति सच्चे मन से भगवान विष्णु का स्मरण करता है, दूसरों के प्रति करुणा रखता है, अपने कर्तव्यों का पालन करता है और सत्य के मार्ग पर चलता है, उस पर भगवान विष्णु की कृपा अवश्य होती है। वे केवल मंदिरों में नहीं, बल्कि हर उस हृदय में निवास करते हैं जहाँ प्रेम, दया, क्षमा और धर्म का प्रकाश जलता है।
इसीलिए सनातन धर्म में भगवान विष्णु को केवल एक देवता नहीं, बल्कि संपूर्ण सृष्टि के पालन और संतुलन का आधार माना गया है। जब तक इस संसार में धर्म जीवित रहेगा, तब तक श्रीहरि की कृपा भी जीवित रहेगी। और जब-जब अधर्म बढ़ेगा, तब-तब भगवान विष्णु किसी न किसी रूप में अवश्य प्रकट होकर सत्य की रक्षा करेंगे।
ॐ नमो नारायणाय।
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