#जय श्री हरि #जय श्री कृष्ण #🙏गीता ज्ञान🛕 #🙏श्रीमद्भागवत गीता📙
🙏*ॐ श्री परमात्मने नमः*🙏
⁉️प्रश्न‒जो दीखता है, वह तो प्रतिक्षण नष्ट हो रहा है, फिर ‘वासुदेवः सर्वम्’ कैसे ? जो दीखता है, वह परमात्मा कैसे ⁉️
✍️*‒जो दीखता है, वह परमात्मा की ही शक्ति (प्रकृति) माया है । उस शक्ति को परमात्मा से भिन्न भी नहीं कह सकते और अभिन्न भी नहीं कह सकते । दीखनेवाला परमात्मस्वरूप होते हुए भी उसमें परिवर्तन होना भगवान् की लीला है । परिवर्तन न हो तो वह केवल चित्र ही होगा, लीला नहीं ।*✍️
⁉️व्यवहार में ‘वासुदेवः सर्वम्’ लाने में कठिनता होगी ! ‘मातृदेवो भव’ तो हो सकता है, पर ‘पुत्रदेवो भव’ कैसे होगा ?_⁉️
🧘इसीलिये कहा है‒*🧘
_भावाद्वैतं सदा कुर्यात् क्रियाद्वैतं न कर्हिचित् ।_
_अद्वैतं त्रिषु लोकेषु नाद्वैतं गुरुणा सह ॥_ _(तत्त्वोपदेश ८७)_
♦️*‘भाव में अद्वैत (एकता) तो सदा करे, पर क्रिया में अद्वैत कभी न करे । तीनों लोकों में अद्वैत करे, पर गुरु में अद्वैत कभी न करे ।’*♦️
_देहदृष्ट्या तु दासोऽहं जीवदृष्ट्या त्वदंशकः ।_
_वस्तुतस्तु त्वमेवाहमिति मे निश्चिता मतिः ॥_
🛐*‘देह दृष्टि से मैं आपका दास हूँ, जीव दृष्टि से मैं आपका अंश हूँ और तत्त्व दृष्टि से मैं आपका स्वरूप ही हूँ‒ऐसा मेरा निश्चित मत है ।’*🛐
‼️*कृतघ्नता से बचने के लिये और लोकसंग्रह के लिये क्रिया में अद्वैत का निषेध किया गया है । माता, पिता, पुत्र, पत्नी आदि तो बनावटी हैं, बने हुए हैं, पर ‘वासुदेवः सर्वम्’ पहले से ही है !*
*‘मातृदेवो भव’ आदि व्यवहार की बात है, उपासना नहीं है । ‘पुत्रदेवो भव’ इसलिये नहीं कहा कि सब इसको सुनने के अधिकारी नहीं हैं । ऐसी बात अधिकारी को ही कही जाती है ।‼️


