More like this
- sn vyas##रामायण #रामायण #रामायण कथा #रामायण चौपाई #रामायण ज्ञान रामायण पवित्र ग्रंथ है। इसकी कथा जितनी आदर्श है उसके पात्र उतने ही प्रेरणादायी। क्या आप रामायण के सभी पात्रों को जानते हैं, नहीं, तो यह जानकारी आपके लिए है। प्रस्तुत है रामायण के प्रमुख पात्र और उनका परिचय ... दशरथ – रघुवंशी राजा इन्द्र के मित्र कौशल के राजा तथा राजधानी एवं निवास अयोध्या कौशल्या – दशरथ की बड़ी रानी,राम की माता सुमित्रा - दशरथ की मंझली रानी,लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न की माता कैकयी - दशरथ की छोटी रानी, भरत की माता सीता – जनकपुत्री,राम की पत्नी उर्मिला – जनकपुत्री, लक्ष्मण की पत्नी मांडवी – जनक के भाई कुशध्वज की पुत्री,भरत की पत्नी श्रुतकीर्ति - जनक के भाई कुशध्वज की पुत्री,शत्रुघ्न की पत्नी राम – दशरथ तथा कौशल्या के पुत्र, सीता के पति लक्ष्मण - दशरथ तथा सुमित्रा के पुत्र,उर्मिला के पति भरत – दशरथ तथा कैकयी के पुत्र,मांडवी के पति शत्रुघ्न - दशरथ तथा सुमित्रा के पुत्रश्रुतकीर्ति के पति,मथुरा के राजा लवणासूर के संहारक शान्ता – दशरथ की पुत्री,राम भगिनी बाली – किष्किन्धा (पंपापुर) का राजा,रावण का मित्र तथा साढ़ू,साठ हजार हाथियों का बल सुग्रीव – बाली का छोटा भाई,जिनकी हनुमान जी ने मित्रता करवाई तारा – बाली की पत्नी,अंगद की माता, पंचकन्याओं में स्थान रुमा – सुग्रीव की पत्नी,सुषेण वैद्य की बेटी अंगद – बाली तथा तारा का पुत्र । रावण – ऋषि पुलस्त्य का पौत्र, विश्रवा तथा पुष्पोत्कटा का पुत्र कुंभकर्ण – रावण तथा कुंभिनसी का भाई, विश्रवा तथा पुष्पोत्कटा का पुत्र कुंभिनसी – रावण तथा कुुंंभकर्ण की भगिनी,विश्रवा तथा पुष्पोत्कटा की पुत्री विश्रवा - ऋषि पुलस्त्य का पुत्र, पुष्पोत्कटा-राका-मालिनी का पति विभीषण – विश्रवा तथा राका का पुत्र,राम का भक्त पुष्पोत्कटा – विश्रवा की पत्नी,रावण, कुंभकर्ण तथा कुंभिनसी की माता राका – विश्रवा की पत्नी,विभीषण की माता मालिनी - विश्रवा की तीसरी पत्नी,खर-दूषण,त्रिसरा तथा शूर्पणखा की माता । त्रिसरा – विश्रवा तथा मालिनी का पुत्र,खर-दूषण का भाई एवं सेनापति शूर्पणखा - विश्रवा तथा मालिनी की पुत्री, खर-दूषण एवं त्रिसरा की भगिनी,विंध्य क्षेत्र में निवास । मंदोदरी – रावण की पत्नी,तारा की भगिनी, पंचकन्याओं में स्थान मेघनाद – रावण का पुत्र इंद्रजीत,लक्ष्मण द्वारा वध दधिमुख – सुग्रीव का मामा ताड़का – राक्षसी,मिथिला के वनों में निवास,राम द्वारा वध। मारिची – ताड़का का पुत्र,राम द्वारा वध (स्वर्ण मृग के रूप में)। सुबाहू – मारिची का साथी राक्षस,राम द्वारा वध। सुरसा – सर्पों की माता। त्रिजटा – अशोक वाटिका निवासिनी राक्षसी, रामभक्त,सीता की अनुरागी त्रिजटा विभीषण की पुत्री थी। प्रहस्त – रावण का सेनापति,राम-रावण युद्ध में मृत्यु। विराध – दंडक वन में निवास,राम लक्ष्मण द्वारा मिलकर वध। शंभासुर – राक्षस, इन्द्र द्वारा वध, इसी से युद्ध करते समय कैकेई ने दशरथ को बचाया था तथा दशरथ ने वरदान देने को कहा। सिंहिका(लंकिनी) – लंका के निकट रहने वाली राक्षसी,छाया को पकड़कर खाती थी। कबंद – दण्डक वन का दैत्य,इन्द्र के प्रहार से इसका सर धड़ में घुस गया,बाहें बहुत लम्बी थी,राम-लक्ष्मण को पकड़ा राम-लक्ष्मण ने गड्ढा खोद कर उसमें गाड़ दिया। जामवंत – रीछ,रीछ सेना के सेनापति। नल – सुग्रीव की सेना का वानरवीर। नील – सुग्रीव का सेनापति जिसके स्पर्श से पत्थर पानी पर तैरते थे,सेतुबंध की रचना की थी। नल और नील – सुग्रीव सेना मे इंजीनियर व राम सेतु निर्माण में महान योगदान। (विश्व के प्रथम इंटरनेशनल हाईवे “रामसेतु”के आर्किटेक्ट इंजीनियर) शबरी – अस्पृश्य जाति की रामभक्त, मतंग ऋषि के आश्रम में राम-लक्ष्मण का आतिथ्य सत्कार। संपाती – जटायु का बड़ा भाई,वानरों को सीता का पता बताया। जटायु – रामभक्त पक्षी,रावण द्वारा वध, राम द्वारा अंतिम संस्कार। गुह – श्रंगवेरपुर के निषादों का राजा, राम का स्वागत किया था। हनुमान – पवन के पुत्र,राम भक्त,सुग्रीव के मित्र। सुषेण वैद्य – सुग्रीव के ससुर । केवट – नाविक,राम-लक्ष्मण-सीता को गंगा पार कराई। शुक्र-सारण – रावण के मंत्री जो बंदर बनकर राम की सेना का भेद जानने गए। अगस्त्य – पहले आर्य ऋषि जिन्होंने विन्ध्याचल पर्वत पार किया था तथा दक्षिण भारत गए। गौतम – तपस्वी ऋषि,अहिल्या के पति,आश्रम मिथिला के निकट। अहिल्या - गौतम ऋषि की पत्नी,इन्द्र द्वारा छलित तथा पति द्वारा शापित,राम ने शाप मुक्त किया,पंचकन्याओं में स्थान। ऋण्यश्रंग – ऋषि जिन्होंने दशरथ से पुत्र प्राप्ति के लिए यज्ञ कराया था। सुतीक्ष्ण – अगस्त्य ऋषि के शिष्य,एक ऋषि। मतंग – ऋषि,पंपासुर के निकट आश्रम, यहीं शबरी भी रहती थी। वशिष्ठ – अयोध्या के सूर्यवंशी राजाओं के गुरु। विश्वामित्र – राजा गाधि के पुत्र,राम-लक्ष्मण को धनुर्विद्या सिखाई थी। शरभंग – एक ऋषि, चित्रकूट के पास आश्रम। सिद्धाश्रम – विश्वमित्र के आश्रम का नाम। भारद्वाज – वाल्मीकि के शिष्य,तमसा नदी पर क्रौंच पक्षी के वध के समय वाल्मीकि के साथ थे,मां-निषाद’ वाला श्लोक कंठाग्र कर तुरंत वाल्मीकि को सुनाया था। सतानन्द – राम के स्वागत को जनक के साथ जाने वाले ऋषि। युधाजित – भरत के मामा। जनक – मिथिला के राजा। सुमन्त – दशरथ के आठ मंत्रियों में से प्रधान । मंथरा – कैकयी की मुंह लगी दासी,कुबड़ी। देवराज – जनक के पूर्वज-जिनके पास परशुराम ने शंकर का धनुष सुनाभ (पिनाक) रख दिया था। मय दानव - रावण का ससुर और उसकी पत्नी मंदोदरी का पिता मायावी --मय दानव का पुत्र और रावण का साला, जिसका बालि ने वध किया था मारीच --रावण का मामा सुमाली --रावण का नाना माल्यवान --सुमाली का भाई, रावण का वयोवृद्ध मंत्री नारंतक - रावण का पुत्र,मूल नक्षत्र में जन्म लेने के कारण रावण ने उसे सागर में प्रवाहित कर दिया था। रावण ने अकेले पड़ जाने के कारण युद्ध में उसकी सहायता ली थी। दधिबल - अंगद का पुत्र जिसने नारंतक का वध किया था। नारंतक शापित था कि उसका वध दधिबल ही करेगा। अयोध्या – राजा दशरथ के कौशल प्रदेश की राजधानी,बारह योजन लंबी तथा तीन योजन चौड़ी नगर के चारों ओर ऊंची व चौड़ी दीवारों व खाई थी,राजमहल से आठ सड़कें बराबर दूरी पर परकोटे तक जाती थी। 🙏जयश्रीराम🚩1416
- -pardshi Rajesh#Andh Bhakt Special #andh bhakto #😡jago andh bhakton jaago😡 #संत ज्ञानेश्वर #रामायण कथा11090
- ☞ 𝐌𝐫 Raja Thakur☜#रामायण कथा #🙏🙏रामायण ज्ञान 🙏🙏 #जय श्रीराम जय माता सीता🙏 #जय श्री राम सीता माता6K8K
- sn vyasरामचरित के आधार पर भाईचार प्रसंग में 'संगति' और सिक्के का दोनों तरफ : ------------------------------------------------------------------ त्रेता और द्वापर युग में भाईचार की निदर्शन कुछ अलग होने से भी इसकी मौलिक अंतःस्वर में कुछ भी फर्क नहीं आती है। इसीलिए सार्वजनीन और सर्वकालीन मंथन योग्य होकर, आजतक भारतीय आर्यों के सामाजिक तथा सांस्कृतिक चेतना के अंदर उज्जीवित रहा है। भाई के लिए भाई कैसे आंख बन्द कर उच्छर्गीकृत होता है, रोचक शैली में इसकी अनेकानेक उदाहरण योग्य कथावस्तु को हमलोग रामायण और महाभारत से जानते है। लेकिन कुछ वस्तुवादी लोगों इन बातों को सिर्फ काव्यमयी कहानियां समझकर, असल में इनकी अंतर्निहित दिव्य सन्देश को महत्व नहीं दे पाते हैं।। इस कलियुग में श्रीक्षेत्र- पूरी में विराजित श्रीमंदिर के अंदर रत्न- सिंघासनोपरि दोनों भ्राता श्रीजगन्नाथ जी और श्रीबलभद्र जी के साथ, बहन सुभद्रा जी को कोई दर्शन करें, तो वंहा विश्व- भाईचार के अनोखा प्रतीकात्मक स्वरूप, मतलब भाई- बहनों का पवित्र- अटूट- अनमोल रिस्ते को अवश्य प्रत्यक्ष कर पाएंगे। सिर्फ इतनी सी बात नहीं, जब वंहा कोई आषाढ़ शुक्ल दशमी के अवसर पर अनुष्ठित विश्व प्रसिद्ध 'रथ- यात्रा' में तीनों भाई- बहनों की नगर परिक्रमा दृश्य देखते हैं, तब लाखों लोगों के भव्य समारोह में वंहा रगरग से अभूतपूर्व भाईचार की शिहरण फैल जाते हैं।। त्रेता युगीय रामायण में रघुकुल- नन्दन चारो भाइयों के आपस में उच्छर्गीकृत प्रेमभाव को कौन सभ्य इंसान नहीं जानता ! वंहा भी विश्रवा- कुल के सिर्फ हरिभक्त बिभीषण को छोड़कर, लंकपति असुरराज रावण समेत उनके पुत्र और भाइयों तथा कुटुंब के अन्यान्य लोगों में भी मरते दम तक कैसे एकता रूपी भाईचार सम्पर्क अटूट रहा था, ये बात को कोई नजर अंदाज नहीं कर सकते हैं।। ऐसे, कोई भी द्वापर कालीन महाभारत को मंथन करेंगे, तो वंहा पांडवों का आपस में भाईचार को देखकर अभिभूत होना कोई नयी बात नहीं है। और दूसरे तरफ पंच पांडवों से अलग धृतराष्ट्र नन्दन दुर्योधन समेत कौरवों शत भाइयों तथा कुटुंब और बन्धुओं में जीवदशा व्यापी जिस हिसाब से इच्छाकृत या अनिच्छाकृत "संगति" अटूट रहा था, ओ सब भी चिन्तन योग्य उदाहरण होकर सामने है।। 💐 गोस्वामी तुलसी दास जी श्री रामचरित मानस- अरण्य काण्ड- दोहा- 1, 2, 4, 5 में लिखे है-- "जे न मित्र दुख होहिं दुखारी, तिन्हहिं बिलोकत पातक भारी। निज दुख गिरि सम रज करि जाना, मित्र क दुख रज मेरु समयााना। कुपथ निवारि सुपंथ चलावा, गुन प्रगटै अवगुनन्हि दुरावा। देत लेत मन संक न धरई, बल अनुमान सदा हित करई। बिपति काल कर सतगुन नेहा, श्रुति कह संत मित्र गुन एहा।।" उपरोक्त दोहे की भावार्थ है-- "जो लोग किसी को अपना मित्र तो मानते है, पर मित्र के दुख में न तो दुख महसूस करते है और न ही अपने मित्र का सहयोग करते है-- दुख के समय मित्र के दुख में दुखी न होने वाले ऐसे स्वार्थी मित्रो को देखने से भी पाप लगता है। जो अपने बड़े से बड़े दुख को बहुत छोटा मानकर अनदेखा कर अपने मित्र के छोटे से छोटे दुख को बड़ा मानकर प्राथमिकता दे, जो अपने मित्र को कुपथ (बुरी संगति और बुरे रास्ते) से दूर हटा कर सुपथ (सुसंगति और सही मार्ग) पर ले जाये, मित्र के अवगुणों को दूर कर मित्र के अंदर सद्गुणों को विकसित करे, मित्र से लेन- देन करते समय छल- कपट- भेदभाव- शंका- संदेह न करे तथा अपनी शक्ति और सामर्थ्य के अनुसार सदैव मित्र का हित करे, सामान्य परिस्थितियो की तुलना में बिपत्ति के समय सौ गुना अधिक मित्र से प्रेम करते हुए उसकी परवाह करे, श्रुति (वेद) के अनुसार वही सज्जन (सच्चा) मित्र होता है।" इसीलिए कोई समाज में अपने लिए अच्छा, सच्चा और सज्जन मित्र चाहते है, तो स्वयं में इन गुणों का विकास कर, पहले स्वयं एक आदर्श मित्र बने और गुण- दोष का परीक्षण कर उचित व्यक्ति के साथ ही मित्रता करें।। फिर गोस्वामी जी निष्कर्ष में कहते हैं की-- हमेशा "संगति' अच्छा रखना चाहिए; यथा-- "तुलसी भलो सुसंग तें पोच कुसंगति सोइ। नाउ किंनरी तीर असि लोह बिलोकहु लोइ।" इस एक ही दोहा में अति सुंदर व रोचक शैली में सन्त गोस्वामी जी "संगति" से उपजे दोनों किसम के 'अछे' और 'बुरे' "भाईचार" को विश्लेषण करने की दिगदर्शन अर्पित किया है। उनके दिव्यदृष्टि से-- "अच्छे लोगों की संगति से मनुष्य अच्छा और बुरे लोगों की संगति से बुरा हो जाता है।।" सामान्यतः लोहा पानी में डूब जाता है; लेकिन लोहे को नाव का कील बना देने से वह लोगों को पार करने वाला हो जाता है। संगीत यंत्र में वह लोहा लग गया तो सुमधुर संगीत निकलता है, जिससे आनंद की अनुभूति होती है। परन्तु यदि वही लोहा कुसंगति में पड़ गया तो, घातक या नाशक बन जाता है। जैसे, कसाई के जीव हत्या वाला तीर- तलवार- छुरी- चाकू आदि आखिर यह भी तो लोहा ही है ना, पर हत्या आदि कार्यों में प्रयुक्त होता है। अतः "भूलि न करिय कुसंग"-- अर्थात, अच्छे लोगों की संगति हमेशा श्रेयष्कर होते है।। गोस्वामी जी की उपरोक्त सन्देश में रघुकुल के चारों भ्राता, सुग्रीब- हनुमान आदि बानर मित्र, असुर कुल से होने भी हरिभक्त मित्र विभीषण-- एक- एक सही मित्र होने की कर्त्तव्य- कर्म के साथ भाईचार का भी अनमोल दृष्टान्त योग्य बने थे। ऐसे द्वापर में भी त्रेता युगीय रावण वंश तुल्य कुरुकुल- भाईचार की प्राचुर्य तो देखने लायक है, जंहा "सत्ता" हासिल की "स्वार्थ" ही मुख्य रूप में अंत:स्वर बन गयी थी। और इसीलिए त्रेता युगीय रघुवंशी चारों भ्राताओं में "संगति" जैसी "निःस्वार्थ भाईचार" की अनन्य आदर्श एक विरल दृष्टान्त होकर रह गया है।। ##रामायण #रामायण महाभारत #रामायण कथा #रामायण ज्ञान #रामायण चौपाई2218
- sn vyas#रामायण #रामायण कथा #रामायण चौपाई #रामायण ज्ञान #रामचरितमानस कथा रावण के वंश की 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️ सृष्टि के आदिकाल का समय था। चारों ओर केवल अथाह जलराशि थी। उसी अनंत जल के मध्य कमल पर विराजमान प्रजापति ब्रह्मा ने जब इस संसार की रचना आरंभ की तो उनके मन में एक चिंता उत्पन्न हुई। उन्होंने सोचा कि इस जीवनदायिनी जलराशि की रक्षा कौन करेगा? तब उन्होंने अनेक प्रकार के प्राणियों की उत्पत्ति की। वे सभी जीव भूख और प्यास से व्याकुल होकर ब्रह्मा जी के सामने उपस्थित हुए और विनम्र होकर बोले, "हे पितामह, हमारा कर्तव्य क्या होगा?" तब ब्रह्मा जी ने कहा, "तुम सब इस जल की रक्षा करो।" कुछ जीवों ने कहा, "हम यक्षण करेंगे," और वे यक्ष कहलाए। अन्य जीवों ने कहा, "हम इसकी रक्षा करेंगे," और वही आगे चलकर राक्षस कहलाए। इन्हीं राक्षसों के वंश में दो पराक्रमी भाई उत्पन्न हुए—हेति और प्रहेति। प्रहेति धर्मप्रिय था, इसलिए वह तपस्या के मार्ग पर चल पड़ा। किंतु हेति ने गृहस्थ जीवन अपनाया और काल की बहन भया से विवाह किया। उनके पुत्र का नाम विद्युतकेश रखा गया, जिसका तेज सूर्य के समान था। समय बीता और विद्युतकेश का विवाह संध्या की पुत्री सालकटंका से हुआ। कुछ समय बाद उसने मंदराचल पर्वत पर एक तेजस्वी बालक को जन्म दिया, परंतु मोह और आसक्ति में पड़कर वह नवजात को वहीं छोड़कर अपने पति के साथ चली गई। वह बालक निर्जन पर्वत पर अकेला रोता रहा। उसी समय भगवान शिव माता पार्वती के साथ नंदी पर विहार करते हुए वहां पहुंचे। बालक का करुण रुदन सुनकर माता पार्वती का हृदय द्रवित हो उठा। उनकी करुणा देखकर भगवान शिव ने अपनी दिव्य शक्ति से उस शिशु को तुरंत युवा बना दिया और उसे आकाश में विचरण करने वाला दिव्य नगर प्रदान किया। माता पार्वती ने भी वरदान दिया कि भविष्य में राक्षसियों के पुत्र जन्म लेते ही युवावस्था को प्राप्त होंगे। यही बालक आगे चलकर सुकेश के नाम से प्रसिद्ध हुआ। भगवान शिव की कृपा से वह महान बलशाली और अजेय बन गया। सुकेश का विवाह गंधर्व ग्रामणी की रूपवती पुत्री देववती से हुआ। उनके तीन पुत्र उत्पन्न हुए—माल्यवान, सुमाली और माली। तीनों बचपन से ही असाधारण पराक्रमी थे। जब उन्हें ज्ञात हुआ कि उनके पिता ने भगवान शिव की आराधना से यह वैभव प्राप्त किया है, तब उन्होंने भी सुमेरु पर्वत पर जाकर कठोर तपस्या आरंभ की। उनकी तपस्या इतनी प्रचंड थी कि देवता और ऋषि तक विचलित हो उठे। अंततः स्वयं ब्रह्मा जी प्रकट हुए और वर मांगने को कहा। तीनों भाइयों ने अमरता, युद्ध में अजेयता और आपसी प्रेम का वरदान मांगा। ब्रह्मा जी ने "तथास्तु" कहकर उन्हें वरदान प्रदान किया और अंतर्ध्यान हो गए। वरदान प्राप्त करते ही तीनों भाइयों के भीतर अभिमान जाग उठा। वे देवशिल्पी विश्वकर्मा के पास पहुंचे और अपने योग्य नगर की मांग की। तब विश्वकर्मा ने उन्हें दक्षिण समुद्र के तट पर स्थित त्रिकूट पर्वत पर बनी स्वर्णमयी लंका का परिचय दिया। उन्होंने बताया कि यह नगरी अभेद्य है, चारों ओर स्वर्ण की प्राचीरें हैं और इसका वैभव स्वर्ग की अमरावती से भी कम नहीं। यह सुनकर तीनों भाई अपने विशाल राक्षस दल सहित लंका में जाकर बस गए। वहीं से राक्षसों का नया साम्राज्य आरंभ हुआ। कालांतर में माल्यवान का विवाह सुंदरी से, सुमाली का विवाह केतुमती से और माली का विवाह वसुधा से हुआ। इन्हीं वंशों में अनेक पराक्रमी राक्षस उत्पन्न हुए। सुमाली की पुत्री कैकसी भी इन्हीं में से एक थी, जो आगे चलकर रावण, कुंभकर्ण और विभीषण की माता बनी। धीरे-धीरे तीनों भाइयों का आतंक तीनों लोकों में फैलने लगा। ब्रह्मा के वरदान ने उन्हें मृत्यु के भय से मुक्त कर दिया था। वे देवताओं के यज्ञ नष्ट करने लगे, ऋषियों को सताने लगे और धर्म का विनाश करने लगे। भयभीत देवता कैलाश पहुंचे और भगवान शिव से रक्षा की प्रार्थना की। किंतु भगवान शिव बोले, "सुकेश मेरा कृपापात्र है। उसके पुत्रों का वध मैं स्वयं नहीं कर सकता। तुम भगवान विष्णु की शरण में जाओ।" देवता वैकुंठ पहुंचे और भगवान विष्णु से प्रार्थना की। भगवान श्रीहरि ने आश्वासन दिया, "भय मत करो। धर्म की रक्षा मेरा कर्तव्य है। मैं इन अधर्मी राक्षसों का अवश्य संहार करूंगा।" जब यह समाचार माल्यवान, सुमाली और माली तक पहुंचा तो वे क्रोध से भर उठे। उन्होंने विशाल सेना संग देवलोक पर चढ़ाई का निश्चय किया। उनके प्रस्थान के समय भयंकर अपशकुन हुए—आकाश से रक्त की वर्षा हुई, समुद्र उफन पड़े, पशु-पक्षी विचित्र स्वर करने लगे। किंतु अहंकार ने उनकी बुद्धि हर ली और वे किसी संकेत को समझ न सके। रणभूमि में एक ओर करोड़ों राक्षसों की सेना थी और दूसरी ओर गरुड़ पर विराजमान भगवान श्रीहरि विष्णु। राक्षसों ने अस्त्रों की वर्षा आरंभ कर दी। तभी भगवान विष्णु ने अपना पांचजन्य शंख बजाया। उस शंखनाद से तीनों लोक कांप उठे। राक्षसों के हाथों से अस्त्र गिर पड़े, हाथी और घोड़े भयभीत होकर भागने लगे और सेना में भगदड़ मच गई। इसके बाद भगवान विष्णु ने शारंग धनुष उठाया और उनके दिव्य बाण राक्षसों का संहार करने लगे। रणभूमि रक्त से भर उठी। गरुड़ भी अपने विशाल पंखों से राक्षसों को दूर-दूर तक उड़ा रहे थे। अपनी सेना को टूटता देख माली स्वयं युद्धभूमि में उतरा। उसने भगवान विष्णु और गरुड़ पर तीव्र बाणों की वर्षा की। कुछ समय के लिए गरुड़ विचलित हुए, किंतु यह दृश्य देखकर भगवान विष्णु का रौद्र रूप प्रकट हुआ। उन्होंने अपनी उंगली पर सुदर्शन चक्र धारण किया। सूर्य के समान प्रज्वलित वह चक्र बिजली की गति से माली की ओर बढ़ा और अगले ही क्षण उसका मस्तक धड़ से अलग कर दिया। माली का विशाल शरीर पृथ्वी पर गिरा तो पूरी रणभूमि कांप उठी। यह देखकर राक्षस सेना का साहस टूट गया। माल्यवान और सुमाली भयभीत होकर भागने लगे। भगवान विष्णु उनका पीछा करते हुए आगे बढ़े। तभी माल्यवान पीछे मुड़ा और बोला, "हे विष्णु! भागते हुए शत्रु पर प्रहार करना क्षत्रिय धर्म नहीं है। यदि युद्ध करना है तो मेरे सामने आइए।" भगवान विष्णु ने शांत स्वर में उत्तर दिया, "देवताओं की रक्षा मेरा परम धर्म है। मैंने उन्हें वचन दिया है कि तुम्हारे आतंक का अंत करूंगा। चाहे तुम रसातल में ही क्यों न छिप जाओ, मैं तुम्हें छोड़ूंगा नहीं।" यह सुनकर माल्यवान ने क्रोध में अपना दिव्य अस्त्र चलाया, किंतु भगवान विष्णु ने उसे पलभर में नष्ट कर दिया। फिर दोनों के बीच भयंकर युद्ध हुआ। अंततः भगवान विष्णु के एक प्रचंड बाण से माल्यवान गंभीर रूप से घायल होकर भूमि पर गिर पड़ा। जब उसे होश आया तो वह समझ चुका था कि भगवान विष्णु को पराजित करना असंभव है। माली के वध और माल्यवान की पराजय के बाद सुमाली सहित समस्त राक्षस भयभीत होकर अपनी पत्नियों और संतानों को लेकर रसातल की ओर भाग गए। स्वर्णमयी लंका एक बार फिर वीरान हो गई। राक्षसों का अभिमान धूल में मिल चुका था और धर्म की विजय हुई। किंतु यही अंत नहीं था। रसातल में छिपे सुमाली ने भविष्य में एक नया षड्यंत्र रचा। उसने अपनी पुत्री कैकसी का विवाह महर्षि विश्रवा से कराया और उसी वंश में आगे चलकर जन्म हुआ उस महाबली रावण का, जिसने फिर एक बार तीनों लोकों को चुनौती दी। इस प्रकार राक्षसों का इतिहास समाप्त नहीं हुआ, बल्कि एक नए अध्याय की शुरुआत हुई, जिसने आगे चलकर रामायण की महान कथा को जन्म दिया। साभार~ पं देव शर्मा🔥 〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️1814
- sn vyas#जय श्री राम #श्रीरामचरितमानस चोपाई #श्रीरामचरितमानस 🪷 #रामायण #रामायण कथा अयोध्या के प्रतापी राजा सत्यव्रत (इक्ष्वाकु वंश के राजा) का जीवन धर्म-पालन से परिपूर्ण था, परंतु उनके भीतर अपने शरीर और बल का अहंकार जाग उठा। वे नश्वर पंचभौतिक देह के साथ ही जीवित स्वर्ग जाना चाहते थे। जब वे अपने कुलगुरु महर्षि वशिष्ठ के पास पहुँचे, तो वशिष्ठ जी ने स्पष्ट कर दिया कि प्रकृति के नियमों के विरुद्ध जीवित शरीर से स्वर्ग जाना संभव नहीं है। इस पर अभिमानी राजा ने गुरु के निर्णय की अवहेलना करते हुए वशिष्ठ जी के पुत्रों से संपर्क किया। गुरु की मर्यादा का अनादर देखकर वशिष्ठ-पुत्रों ने अत्यंत क्रुद्ध होकर सत्यव्रत को नीच 'चांडाल' बनने का शाप दे दिया, जिससे उनका राजसी सौंदर्य तुरंत भयानक कुरूपता में बदल गया। अपमानित और बेघर होकर चांडाल बने राजा महर्षि विश्वामित्र के आश्रम में शरण लेने पहुँचे। विश्वामित्र और वशिष्ठ के बीच पुरानी प्रतिस्पर्धा थी; इसलिए वशिष्ठ के ठुकराए कार्य को पूरा करके अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने के उद्देश्य से विश्वामित्र ने सत्यव्रत को सशरीर स्वर्ग भेजने की प्रतिज्ञा कर ली। विश्वामित्र ने एक विशाल यज्ञ रचाया, परंतु धर्म-विरुद्ध होने के कारण देवताओं ने हविर्भाग स्वीकार करने से मना कर दिया। इससे कुपित होकर विश्वामित्र ने अपनी वर्षों की तपस्या के पुण्य-बल से राजा सत्यव्रत को सीधे आकाश में स्वर्ग की ओर उछाल दिया। जैसे ही चांडाल रूपी सत्यव्रत स्वर्ग के द्वार पर पहुँचे, देवराज इंद्र ने उन्हें रोक दिया और गुरु-द्रोही तथा प्राकृतिक विधान का उल्लंघन करने वाला बताकर नीचे फेंक दिया। सत्यव्रत सिर के बल धरती की ओर गिरने लगे और भयभीत होकर चिल्लाने लगे। विश्वामित्र ने अपनी तपोशक्ति से उन्हें बीच आकाश में ही रोक दिया। ऊपर से इंद्र का दबाव और नीचे से विश्वामित्र की शक्ति टकराने के कारण राजा न तो स्वर्ग जा सके और न धरती पर आ सके। तीनों लोकों के बीच फँस जाने के कारण उनका नाम 'त्रिशंकु' पड़ा। क्रुद्ध विश्वामित्र ने अधर में ही एक नया समानांतर स्वर्ग और नक्षत्र-मंडल रचना शुरू कर दिया। अंततः ब्रह्मा जी के हस्तक्षेप से समझौता हुआ और त्रिशंकु को उसी अधर-लोक में उलटे लटके रहने का स्थान मिला, जहाँ से टपकी लार से अपवित्र 'कर्मनाशा नदी' का जन्म हुआ और राजा का अहंकार सदा के लिए चूर हो गया। पौराणिक ग्रंथों और श्रीमद्भागवत पुराण के अनुसार, इस कथा का आध्यात्मिक सत्य मनुष्य के भीतर छिपे तीन प्रमुख पापों ('त्रिशंकु') और देह-आसक्ति का दुष्परिणाम समझाता है। राजा सत्यव्रत के तीन सबसे बड़े पाप (शंकु) थे—पिता का अनादर, गुरु वशिष्ठ की आज्ञा का उल्लंघन, और भीषण अकाल के समय कामधेनु का वध। यह कहानी हमें सिखाती है कि भौतिक शरीर केवल इस मृत्युलोक की यात्रा के लिए एक साधन है। जो व्यक्ति सांसारिक मोह-माया को भी नहीं छोड़ पाता और आध्यात्मिक रूप से पूर्ण भी नहीं हो पाता, उसकी स्थिति समाज में 'त्रिशंकु' जैसी हो जाती है—वह न इधर का रहता है और न उधर का। यह कथा यह संदेश भी देती है कि तपोबल या अहंकार से प्रकृति और धर्म के शाश्वत विधान को कभी नहीं बदला जा सकता।1810
- sn vyas#रामायण #रामायण कथा #रामायण ज्ञान #🪔सावन का पवित्र महीना 🙏 #🔱शिवपुराण कथा📖 क्या आप जानते हैं कि जो महादेव अपने तीसरे नेत्र की ज्वाला से संपूर्ण सृष्टि को कंपा सकते हैं, वही महादेव भगवान श्रीराम की सेवा करने के लिए एक साधारण वानर का रूप क्यों धारण करते हैं? आखिर ऐसा क्या कारण था कि कैलाशपति भगवान शिव स्वयं अपने आराध्य श्रीराम के चरणों में समर्पित होकर हनुमान के रूप में प्रकट हुए? इस कथा को समझने के लिए हमें उस समय में जाना होगा जब लंका का राजा रावण अपनी शक्ति और वरदानों के कारण अहंकार में डूब चुका था। वह स्वयं को इतना शक्तिशाली समझने लगा था कि देवताओं तक को चुनौती देने से पीछे नहीं हटता था। लेकिन उसके अहंकार की जड़ में एक ऐसी भूल छिपी थी, जिसने अंततः उसके पूरे साम्राज्य के विनाश का मार्ग तैयार कर दिया। कथा के अनुसार, एक समय रावण अपने पराक्रम का प्रदर्शन करते हुए कैलाश पर्वत पहुंचा। कैलाश भगवान शिव का पवित्र धाम था और वहां महादेव के परम भक्त नंदी जी सदैव उनकी सेवा में रहते थे। नंदी जी का रूप वानर जैसा था। जब रावण ने नंदी जी को देखा तो उसके भीतर का अहंकार जाग उठा। उसने नंदी जी के स्वरूप का मजाक उड़ाना शुरू कर दिया। रावण की हंसी और उसके अपमानजनक शब्दों से नंदी जी अत्यंत क्रोधित हो गए। उन्होंने रावण को चेतावनी दी कि अहंकार में किसी भक्त का अपमान नहीं करना चाहिए। लेकिन रावण अपने बल और सामर्थ्य के मद में इतना चूर था कि उसने नंदी जी की बात को गंभीरता से नहीं लिया। तब नंदी जी ने रावण को श्राप देते हुए कहा कि जिस वानर रूप का वह आज अपमान कर रहा है, वही वानर एक दिन उसके विनाश का कारण बनेगा। रावण ने इस श्राप को सुनकर भी उसका मजाक उड़ाया। उसे लगता था कि वानर उसके जैसे महाबली राक्षस का क्या बिगाड़ सकते हैं। उसे अपने वरदानों पर इतना विश्वास था कि उसने वानरों और मनुष्यों को अपनी शक्ति के सामने नगण्य समझ लिया था। लेकिन नियति चुपचाप अपना मार्ग बना रही थी। रावण को क्या पता था कि उसके इसी अहंकार में उसके विनाश का सबसे बड़ा बीज छिपा हुआ है। समय बीता और रावण ने कठोर तपस्या करके ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त किया। उसने अनेक शक्तिशाली प्राणियों से अपनी रक्षा मांगी। देवता, दानव और राक्षस जैसे शक्तिशाली वर्गों से सुरक्षा प्राप्त करने के बाद रावण स्वयं को लगभग अजेय समझने लगा। लेकिन उसने मनुष्यों और वानरों को अपनी दृष्टि में इतना तुच्छ समझा कि उनसे सुरक्षा मांगना आवश्यक ही नहीं समझा। यही निर्णय आगे चलकर उसके लिए सबसे बड़ी भूल साबित हुआ। क्योंकि जिस शक्ति को वह कमजोर समझ रहा था, वही उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती बनकर आने वाली थी। धरती पर रावण और उसके अत्याचारों से धर्म कमजोर होने लगा। ऋषि-मुनि भयभीत थे, देवता चिंतित थे और संसार धर्म की रक्षा के लिए किसी दिव्य शक्ति की प्रतीक्षा कर रहा था। तब भगवान विष्णु ने मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के रूप में पृथ्वी पर अवतार लिया। श्रीराम ने मानव रूप धारण किया, क्योंकि रावण ने मनुष्यों को अपनी सुरक्षा के योग्य भी नहीं समझा था। इस प्रकार भगवान ने उसी मार्ग को चुना जिसे रावण ने अपनी बुद्धि के अहंकार में कमजोर समझकर छोड़ दिया था। जब कैलाश पर भगवान शिव को यह समाचार मिला कि उनके आराध्य भगवान विष्णु स्वयं श्रीराम के रूप में पृथ्वी पर अवतरित हो चुके हैं, तो महादेव के हृदय में अपने प्रभु की सेवा करने की तीव्र इच्छा जाग उठी। शिव और राम के संबंध को लेकर भक्ति परंपराओं में अनेक सुंदर कथाएं कही जाती हैं। भगवान शिव स्वयं श्रीराम के नाम का स्मरण करने वाले माने जाते हैं और श्रीराम भी महादेव के प्रति गहरी श्रद्धा रखते हैं। इसलिए जब उनके आराध्य पृथ्वी पर धर्म की स्थापना के लिए आए, तो महादेव भी उनकी लीला में सहभागी बनना चाहते थे। लेकिन प्रश्न था कि वे किस रूप में श्रीराम की सेवा करें? क्या वे किसी राजा के रूप में जाएं? क्या वे किसी देवता का रूप धारण करें? क्या वे किसी महान योद्धा के रूप में प्रभु के साथ खड़े हों? महादेव के लिए इनमें से कोई भी रूप उस भाव को पूर्ण नहीं कर सकता था जिसे वे अपने हृदय में लेकर श्रीराम की सेवा करना चाहते थे। वे प्रभु के सामने अपनी शक्ति दिखाना नहीं चाहते थे। वे तो केवल सेवक बनना चाहते थे। उन्हें ऐसा रूप चाहिए था जिसमें पद, प्रतिष्ठा और अहंकार का कोई स्थान न हो। उसी समय माता अंजनी भगवान शिव की आराधना कर रही थीं। उनकी तपस्या अत्यंत श्रद्धापूर्ण थी। भक्ति परंपरा के अनुसार, माता अंजनी की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उनके पुत्र रूप में अपने अंश के प्रकट होने का संकल्प किया। इसी दिव्य संकल्प से हनुमान जी के अवतरण की कथा जुड़ी है। धार्मिक परंपराओं में हनुमान जी को भगवान शिव का अंश या रुद्रावतार माना जाता है और कई परंपराओं में उन्हें एकादश रुद्र से भी जोड़ा जाता है। इस प्रकार महादेव ने स्वयं के लिए किसी राजसी रूप का चयन नहीं किया। उन्होंने वानर रूप को स्वीकार किया। क्योंकि उनके लिए यह रूप शक्ति के प्रदर्शन का नहीं, बल्कि सेवा और समर्पण का प्रतीक बनने वाला था। हनुमान जी के रूप में भगवान शिव ने संसार को यह संदेश दिया कि सबसे बड़ी शक्ति वह नहीं है जो दूसरों को पराजित कर दे, बल्कि वह है जो अपनी सारी शक्ति अपने आराध्य की सेवा में समर्पित कर दे। बाल रूप में हनुमान जी असाधारण तेज और शक्ति से संपन्न थे। उनके भीतर अपार सामर्थ्य था, लेकिन उनका हृदय अत्यंत सरल था। बचपन से ही उनमें अद्भुत उत्साह और निर्भीकता दिखाई देती थी। उनकी बाल लीलाओं में उनकी असाधारण शक्ति के दर्शन होते हैं, लेकिन आगे चलकर जब उन्हें श्रीराम की सेवा का अवसर मिला, तब उनकी सारी शक्ति एक ही उद्देश्य में लग गई—प्रभु की सेवा। जब श्रीराम वनवास के दौरान सीता जी की खोज में निकले और उनकी भेंट हनुमान जी से हुई, तब दोनों के बीच ऐसा संबंध बना जिसे भक्ति परंपरा में अद्वितीय माना जाता है। हनुमान जी ने जब पहली बार श्रीराम को देखा, तो उनके हृदय ने अपने आराध्य को पहचान लिया। श्रीराम ने भी हनुमान जी के ज्ञान, विनम्रता, वाणी और समर्पण को देखकर उन्हें अपने हृदय के अत्यंत निकट स्थान दिया। इसके बाद हनुमान जी की हर सांस श्रीराम के कार्य के लिए समर्पित हो गई। समुद्र के किनारे जब वानर सेना सीता जी की खोज के लिए खड़ी थी और किसी को समझ नहीं आ रहा था कि विशाल समुद्र को पार करके लंका कौन जाएगा, तब जामवंत जी ने हनुमान जी को उनकी शक्ति का स्मरण कराया। हनुमान जी ने प्रभु श्रीराम का नाम लिया और उनका आत्मविश्वास जाग उठा। उन्होंने विशाल समुद्र को पार किया और लंका पहुंचकर माता सीता का पता लगाया। हनुमान जी के सामने उस समय लंका की पूरी शक्ति थी। लेकिन उनके मन में अपने बल का अहंकार नहीं था। वे बार-बार यही सोचते थे कि मैं कुछ नहीं कर रहा, यह सब मेरे प्रभु श्रीराम की कृपा से हो रहा है। यही भावना उनके चरित्र को अद्वितीय बनाती है। जिस महाशक्ति के बारे में कहा जाता है कि वह पर्वत उठा सकती है, समुद्र पार कर सकती है और राक्षसों की विशाल सेना का सामना कर सकती है, वही शक्ति अपने हर कार्य का श्रेय अपने प्रभु को देती है। जब हनुमान जी ने माता सीता को श्रीराम की अंगूठी दी और प्रभु का संदेश सुनाया, तब उन्हें विश्वास हुआ कि श्रीराम उन्हें अवश्य मुक्त कराने आएंगे। इसके बाद हनुमान जी ने लंका में अपने पराक्रम का परिचय दिया और वापस लौटकर श्रीराम को माता सीता का समाचार दिया। आगे चलकर जब श्रीराम और रावण के बीच युद्ध हुआ, तब हनुमान जी केवल एक योद्धा नहीं रहे। वे पूरी सेना के लिए आशा, साहस और विश्वास का आधार बन गए। युद्ध के दौरान जब लक्ष्मण जी गंभीर संकट में पड़े, तब हनुमान जी जीवनदायिनी औषधि की खोज में पर्वत की ओर गए। जब उन्हें सही औषधि पहचानने में कठिनाई हुई तो उन्होंने पूरा पर्वत ही उठा लिया और युद्धभूमि में ले आए। यह प्रसंग बताता है कि जब सेवा के मार्ग में कोई बाधा आती है तो सच्चा सेवक रास्ते की कठिनाई देखकर रुकता नहीं, बल्कि अपने उद्देश्य को पूरा करने का मार्ग खोज लेता है। अंततः श्रीराम की सेना ने रावण की विशाल शक्ति का सामना किया। जिस रावण ने कभी नंदी जी के वानर रूप का मजाक उड़ाया था, उसी रावण के सामने वानर सेना खड़ी थी। जिस शक्ति को उसने तुच्छ समझा था, वही शक्ति अब उसके अहंकार को चुनौती दे रही थी। इस प्रकार नंदी जी के श्राप से जुड़ी लोकमान्यता और रावण के वरदान की भूल, दोनों का अद्भुत मेल श्रीराम की लीला में दिखाई देता है। युद्ध का अंत हुआ और रावण का अहंकार समाप्त हुआ। श्रीराम की विजय हुई और धर्म की स्थापना का मार्ग प्रशस्त हुआ। हनुमान जी ने इस पूरे प्रसंग में असाधारण पराक्रम दिखाया, लेकिन विजय के बाद भी उनके भीतर अभिमान नहीं आया। उनके लिए सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं थी कि उन्होंने कितने राक्षसों का सामना किया या कितने कठिन कार्य पूरे किए। उनके लिए सबसे बड़ा सौभाग्य यही था कि उन्हें श्रीराम की सेवा करने का अवसर मिला। इसीलिए जब पूछा जाता है कि महादेव ने वानर का रूप क्यों चुना, तो इस कथा का सबसे सुंदर उत्तर यही माना जाता है कि उन्होंने शक्ति दिखाने के लिए नहीं, सेवा करने के लिए यह रूप स्वीकार किया। उन्होंने संसार को बताया कि भगवान के सबसे निकट पहुंचने का मार्ग हमेशा सामर्थ्य का प्रदर्शन नहीं होता। कभी-कभी अपने अहंकार को पूरी तरह छोड़कर स्वयं को प्रभु के चरणों में समर्पित करना ही सबसे बड़ी साधना होती है। हनुमान जी के चरित्र में इसी कारण शक्ति और विनम्रता दोनों साथ दिखाई देती हैं। वे पर्वत उठा सकते हैं, लेकिन प्रभु के सामने हाथ जोड़कर खड़े होते हैं। वे समुद्र पार कर सकते हैं, लेकिन अपनी सफलता का श्रेय स्वयं को नहीं देते। वे बड़े-बड़े संकटों का सामना कर सकते हैं, लेकिन अपने हृदय में केवल श्रीराम का नाम रखते हैं। यही कारण है कि भक्तों के लिए हनुमान जी केवल शक्ति के देवता नहीं, बल्कि निस्वार्थ सेवा और अटूट भक्ति के सबसे सुंदर प्रतीक हैं। इस कथा का सबसे बड़ा संदेश भी यही है कि संसार में शक्ति मिलना बड़ी बात नहीं है, उस शक्ति का सही उपयोग करना बड़ी बात है। ज्ञान हो तो विनम्रता के साथ, धन हो तो सेवा के लिए, सामर्थ्य हो तो दूसरों की सहायता के लिए और भक्ति हो तो बिना किसी स्वार्थ के प्रभु के चरणों में समर्पित करने के लिए। रावण के पास शक्ति थी, लेकिन उसके साथ अहंकार जुड़ गया और वही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन गया। हनुमान जी के पास भी अपार शक्ति थी, लेकिन उसके साथ विनम्रता और भक्ति जुड़ी थी और यही उन्हें महान बनाती है। इसलिए हनुमान जी की कथा हमें यह याद दिलाती है कि सच्ची महानता इस बात में नहीं कि दुनिया हमें कितना शक्तिशाली मानती है, बल्कि इस बात में है कि हम अपनी शक्ति का उपयोग किसके लिए करते हैं। महादेव ने स्वयं को सेवक बनाया और हनुमान जी के रूप में यह संदेश दिया कि प्रभु के चरणों में समर्पित सेवा से बड़ा कोई पद नहीं है। इसी भाव के साथ भक्त आज भी हनुमान जी को श्रीराम का सबसे प्रिय सेवक और अनन्य भक्त मानकर उनका स्मरण करते हैं। अगर आपके हृदय में भी श्रीराम और हनुमान जी के प्रति श्रद्धा है, तो पूरे विश्वास और प्रेम से बोलिए—जय श्रीराम, जय बजरंगबली, हर हर महादेव।1820
- sn vyas##रामायण #रामायण #रामायण कथा #रामायण चौपाई #रामायण ज्ञान 🚩 क्या आप जानते हैं माता कैकेयी ने श्री राम को वनवास क्यों भेजा था? 👑 रघुकुल का सौभाग्य: माता कैकेयी के त्याग की अनसुनी कथा 👑 ⚔️ महाराजा दशरथ और बाली का युद्ध एक बार युद्ध में महाराजा दशरथ का सामना वानरराज बाली से हो गया। उस समय अस्त्र-शस्त्र और रथ चालन में निपुण रानी कैकेयी भी उनके साथ थीं। बाली को यह वरदान प्राप्त था कि जिस पर भी उसकी दृष्टि पड़ जाए, उसका आधा बल उसमें समा जाता था। स्वाभाविक रूप से इस युद्ध में महाराजा दशरथ परास्त हो गए। 👑 राजमुकुट या रानी? विजयी बाली ने महाराजा दशरथ के सामने एक कठोर शर्त रखी— "पराजय के मोल स्वरूप या तो अपनी रानी कैकेयी को यहीं छोड़ जाओ, या फिर रघुकुल की शान अपना राजमुकुट मुझे सौंप दो।" दशरथ जी ने भारी मन से अपना मुकुट बाली के पास रख छोड़ा और कैकेयी को लेकर अयोध्या लौट आए। 💔 कैकेयी की पीड़ा और मौन बलिदान कैकेयी स्वयं एक कुशल योद्धा थीं। रघुकुल के मुकुट का इस तरह जाना उनके हृदय में शूल की तरह चुभता रहा। जब श्री राम के राजतिलक का समय आया, तब दशरथ जी और कैकेयी के बीच उस खोए हुए मुकुट की चर्चा हुई। रघुकुल की आन को वापस लाने के लिए, माता कैकेयी ने एक बहुत बड़ा निर्णय लिया। उन्होंने श्री राम के वनवास का कलंक अपने सिर ले लिया और राम जी को वन भिजवाया। वन जाते समय उन्होंने श्री राम को गुप्त रूप से यह आदेश भी दिया था कि— "बाली से रघुकुल का मुकुट वापस लेकर ही आना है।" 🏹 मुकुट का रहस्य और रावण की चोरी वनवास के दौरान जब श्री राम ने बाली का वध किया, तब उन्होंने अपने कुल की शान, उस राजमुकुट के बारे में पूछा। बाली ने बताया— "प्रभु! मैंने रावण को बंदी बनाया था, लेकिन जब वह भागा तो छल से आपका वह मुकुट भी चुरा ले गया। आप मेरे पुत्र अंगद को अपनी सेवा में ले लें, वह प्राणों की बाजी लगाकर आपका मुकुट वापस लाएगा।" 🦶 अंगद की चुनौती और मुकुट की वापसी जब अंगद श्री राम के दूत बनकर रावण की सभा में गए, तो उन्होंने अपना पैर जमाकर लंका के वीरों को उसे हिलाने की चुनौती दी। जब सभी वीर असफल रहे, तो अंत में स्वयं रावण अंगद का पैर डिगाने के लिए आगे आया। जैसे ही रावण अंगद के पैर पकड़ने के लिए झुका, उसका मुकुट (जिसमें रघुकुल का मुकुट भी था) गिर गया! अंगद तुरंत वह मुकुट लेकर श्री राम के पास लौट आए। 🌸 कथा का सार रघुकुल के उस राजमुकुट का ऐसा प्रताप था कि जिसने भी उसे खोया या चुराया, उसे भारी कीमत चुकानी पड़ी: महाराजा दशरथ ने मुकुट गंवाया, तो उन्हें पीड़ा झेलनी पड़ी और प्राण त्यागने पड़े। बाली ने मुकुट छीना, तो उसे भी अपने प्राण गंवाने पड़े। रावण ने मुकुट चुराया, तो उसे भी काल का मुंह देखना पड़ा। यदि माता कैकेयी श्री राम को वनवास न भेजतीं, तो रघुकुल का वह सौभाग्य और गौरव कभी वापस न लौटता। कुल के हित के लिए इतना बड़ा कार्य करने और जीवन भर का अपयश झेलने के कारण ही श्री राम अपनी तीनों माताओं में से कैकेयी जी से सर्वाधिक प्रेम करते थे। ।। जय श्री राम ।। 🙏✨1820
- sn vyas#रामायण #रामायण कथा #रामायण चौपाई #रामायण ज्ञान *क्या आपको पता है,रघुवंश के पहले चक्रवर्ती राजा। *अयोध्या के सम्राट। जिनके वंश में राम पैदा हुए,उन्हे गाय क्यों चरानी पड़ी? 😱 🔥 एक समय ऐसा आया कि ये चक्रवर्ती राजा जंगल में गाय चराने लगे। मुकुट उतार दिया, धनुष रख दिया। हाथ में लाठी ली। 🌺 क्योंकि गुरु वशिष्ठ ने कहा था,पुत्र चाहिए तो नंदिनी की सेवा करो।" नंदिनी कौन? *कामधेनु की पुत्री* कामधेनु, जो सब इच्छा पूरी करती है। वंशावली:- मनु → इक्ष्वाकु → विकुक्षि → दिलीप → रघु → अज → दशरथ → राम। मतलब राम जी के परदादा के पिता। रघुवंश शिरोमणि राजा दिलीप, 😱 *कथा:- राजा बूढ़े हो रहे थे। सिंहासन का वारिस नहीं। कुल का दीपक बुझ रहा था। रानी सुदक्षिणा छुप-छुपकर रोतीं। दिलीप रातों को जागते। मंत्री कहते: "दूसरा विवाह कर लो।" राजा कहते,"सुदक्षिणा मेरी आत्मा है। दूसरी पत्नी नहीं, पुत्र चाहिए।" राज्य, यश, पत्नी। पर 'वारिस' नहीं था। राजा दिलीप- सुदक्षिणा गुरु वशिष्ठ के आश्रम गए,और पैरों में गिर पड़े, "गुरुदेव, पुत्र दे दो। कुल डूब जाएगा।" वशिष्ठ ने आँखें बंद कीं। ध्यान से देखा। बोले: "राजन, तुम्हें गौ-हत्या का शाप है। याद करो, एक बार तुम इंद्र से मिलकर लौट रहे थे। रास्ते में कामधेनु बैठी थी। तुम रथ पर थे। अभिमान में झुके नहीं। प्रणाम नहीं किया। कामधेनु ने शाप दिया 'जिस कुल को आगे बढ़ाना चाहता है, वो आगे नहीं बढ़ेगा'।" दिलीप चौंके: "गुरुदेव, मुझे याद नहीं। अनजाने में हुआ।" वशिष्ठ: "अनजाने का पाप भी पाप है। पर उपाय है। कामधेनु की पुत्री नंदिनी मेरे आश्रम में है। 21 दिन उसकी सेवा करो। वो प्रसन्न हुई, तो शाप कटेगा।" शर्त ये है,खुद चराओगे, नौकर नहीं। जहाँ वो बैठे, तुम बैठो। जहाँ वो चले, तुम चलो। शेर आए, तो पहले तुम्हारा शरीर जाएगा, फिर गाय का, राजा ने स्वीकार कर लिया। दिलीप ने मुकुट उतारा। रानी से बोला: "21 दिन मैं राजा नहीं, ग्वाला हूँ।" सुबह: ब्रह्ममुहूर्त में उठते। नंदिनी को प्रणाम करते उसका गोबर उठाते, गौ-मूत्र से धरती पवित्र करते। दोपहर: जंगल ले जाते। नंदिनी जहाँ घास खाए, वहीं बैठते। धूप, बारिश सहते। शाम: नंदिनी को पानी पिलाते, पैर दबाते। खुर में कांटा देखते तो मुँह से निकालते। रात: जब नंदिनी सो जाए, तब सोते। वो भी उसके पास, जमीन पर। रानी सुदक्षिणा मिलने आतीं। रोतीं: "महाराज, आप चक्रवर्ती। ये क्या हाल?" दिलीप: "रानी, पुत्र चाहिए तो 'पुत्र-धर्म' निभाना होगा। गाय माता है। माता की सेवा से ही माता बनोगी।" 20 दिन बीत गए। नंदिनी ने एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखा। दिलीप को डर "कहीं सेवा में कमी तो नहीं?" 21वां दिन। आखिरी दिन। दिलीप खुश आज शाप कटेगा।" नंदिनी चरते-चरते हिमालय की तराई में चली गई। एक गुफा के पास पहुंची। तभी *दहाड़* एक विशाल सिंह कूदा। सीधा नंदिनी पर झपटा। दिलीप ने धनुष उठाया। प्रत्यंचा चढ़ाई। पर *हाथ जम गया* शरीर लकवा मार गया। मंत्र भूल गए। अस्त्र नहीं चला। सिंह बोला: "राजा दिलीप, मैं शिव का सेवक हूँ। इस पहाड़ की रक्षा करता हूँ। ये गाय मेरा भोजन है। तू बाण नहीं चला सकता। वरदान है मुझे। जा, लौट जा।" दिलीप ने धनुष फेंका। सिंह के आगे लेट गए। बोले: "गौ-माता को छोड़ दे। उसके बदले मुझे खा ले। मेरा मांस, रक्त, हड्डी सब तेरी। पर गौ-हत्या का पाप मेरे जीते-जी नहीं होगा। मैंने वचन दिया है — पहले मेरा शरीर, फिर नंदिनी।" आँख बंद कर ली। मृत्यु का इंतजार। तभी फूल बरसे। शरीर का लकवा खुला। आँख खोली। न सिंह था, न गुफा। सामने नंदिनी दिव्य रूप में खड़ी। कामधेनु जैसी, पर छोटी। बोली: "उठो पुत्र दिलीप, ये माया थी, तुम्हें परखा सिंह ने नहीं, मैंने था। तुम्हारा हाथ मैंने ही जकड़ा था देखना था तुम बाण चलाते हो या जान देते हो।" "तुम पास हुए। गौ-शाप कट गया। वर माँगो।" दिलीप पैरों में गिर पड़े, बोले "माता, पुत्र चाहिए। रघुकुल का दीपक।" नंदिनी: "तथास्तु। तुम्हें पुत्र होगा ,*रघु* वो इतना प्रतापी होगा कि तुम्हारा वंश 'रघुवंश' कहलाएगा। वो इंद्र को भी हरा देगा। जाओ, रानी सुदक्षिणा को ये दूध पिलाओ।" नंदिनी ने दूध का पात्र दिया। 🙏 दिलीप आश्रम लौटे। सुदक्षिणा को दूध पिलाया। 9 महीने बाद पुत्र जन्म। नाम रखा *रघु* क्योंकि 'रघु' माने 'वेगवान' ये बालक पैदा होते ही इतना तेजस्वी था कि सूर्य भी शरमा जाए। बड़े होकर रघु ने दिग्विजय की, चारों दिशा जीती स्वर्ग पर चढ़ाई की इंद्र डरकर भागा इसीलिए कुल 'रघुवंश' कहलाया। रघु → अज → दशरथ → राम। मतलब: अगर दिलीप 21 दिन गाय न चराते, तो राम न होते, राम के जन्म की पहली सीढ़ी 'गौ-सेवा' थी। जय श्रीराम 🚩1816