sn vyas
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#रामायण #रामायण कथा #रामायण चौपाई #रामायण ज्ञान *क्या आपको पता है,रघुवंश के पहले चक्रवर्ती राजा। *अयोध्या के सम्राट। जिनके वंश में राम पैदा हुए,उन्हे गाय क्यों चरानी पड़ी? 😱 🔥 एक समय ऐसा आया कि ये चक्रवर्ती राजा जंगल में गाय चराने लगे। मुकुट उतार दिया, धनुष रख दिया। हाथ में लाठी ली। 🌺 क्योंकि गुरु वशिष्ठ ने कहा था,पुत्र चाहिए तो नंदिनी की सेवा करो।" नंदिनी कौन? *कामधेनु की पुत्री* कामधेनु, जो सब इच्छा पूरी करती है। वंशावली:- मनु → इक्ष्वाकु → विकुक्षि → दिलीप → रघु → अज → दशरथ → राम। मतलब राम जी के परदादा के पिता। रघुवंश शिरोमणि राजा दिलीप, 😱 *कथा:- राजा बूढ़े हो रहे थे। सिंहासन का वारिस नहीं। कुल का दीपक बुझ रहा था। रानी सुदक्षिणा छुप-छुपकर रोतीं। दिलीप रातों को जागते। मंत्री कहते: "दूसरा विवाह कर लो।" राजा कहते,"सुदक्षिणा मेरी आत्मा है। दूसरी पत्नी नहीं, पुत्र चाहिए।" राज्य, यश, पत्नी। पर 'वारिस' नहीं था। राजा दिलीप- सुदक्षिणा गुरु वशिष्ठ के आश्रम गए,और पैरों में गिर पड़े, "गुरुदेव, पुत्र दे दो। कुल डूब जाएगा।" वशिष्ठ ने आँखें बंद कीं। ध्यान से देखा। बोले: "राजन, तुम्हें गौ-हत्या का शाप है। याद करो, एक बार तुम इंद्र से मिलकर लौट रहे थे। रास्ते में कामधेनु बैठी थी। तुम रथ पर थे। अभिमान में झुके नहीं। प्रणाम नहीं किया। कामधेनु ने शाप दिया 'जिस कुल को आगे बढ़ाना चाहता है, वो आगे नहीं बढ़ेगा'।" दिलीप चौंके: "गुरुदेव, मुझे याद नहीं। अनजाने में हुआ।" वशिष्ठ: "अनजाने का पाप भी पाप है। पर उपाय है। कामधेनु की पुत्री नंदिनी मेरे आश्रम में है। 21 दिन उसकी सेवा करो। वो प्रसन्न हुई, तो शाप कटेगा।" शर्त ये है,खुद चराओगे, नौकर नहीं। जहाँ वो बैठे, तुम बैठो। जहाँ वो चले, तुम चलो। शेर आए, तो पहले तुम्हारा शरीर जाएगा, फिर गाय का, राजा ने स्वीकार कर लिया। दिलीप ने मुकुट उतारा। रानी से बोला: "21 दिन मैं राजा नहीं, ग्वाला हूँ।" सुबह: ब्रह्ममुहूर्त में उठते। नंदिनी को प्रणाम करते उसका गोबर उठाते, गौ-मूत्र से धरती पवित्र करते। दोपहर: जंगल ले जाते। नंदिनी जहाँ घास खाए, वहीं बैठते। धूप, बारिश सहते। शाम: नंदिनी को पानी पिलाते, पैर दबाते। खुर में कांटा देखते तो मुँह से निकालते। रात: जब नंदिनी सो जाए, तब सोते। वो भी उसके पास, जमीन पर। रानी सुदक्षिणा मिलने आतीं। रोतीं: "महाराज, आप चक्रवर्ती। ये क्या हाल?" दिलीप: "रानी, पुत्र चाहिए तो 'पुत्र-धर्म' निभाना होगा। गाय माता है। माता की सेवा से ही माता बनोगी।" 20 दिन बीत गए। नंदिनी ने एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखा। दिलीप को डर "कहीं सेवा में कमी तो नहीं?" 21वां दिन। आखिरी दिन। दिलीप खुश आज शाप कटेगा।" नंदिनी चरते-चरते हिमालय की तराई में चली गई। एक गुफा के पास पहुंची। तभी *दहाड़* एक विशाल सिंह कूदा। सीधा नंदिनी पर झपटा। दिलीप ने धनुष उठाया। प्रत्यंचा चढ़ाई। पर *हाथ जम गया* शरीर लकवा मार गया। मंत्र भूल गए। अस्त्र नहीं चला। सिंह बोला: "राजा दिलीप, मैं शिव का सेवक हूँ। इस पहाड़ की रक्षा करता हूँ। ये गाय मेरा भोजन है। तू बाण नहीं चला सकता। वरदान है मुझे। जा, लौट जा।" दिलीप ने धनुष फेंका। सिंह के आगे लेट गए। बोले: "गौ-माता को छोड़ दे। उसके बदले मुझे खा ले। मेरा मांस, रक्त, हड्डी सब तेरी। पर गौ-हत्या का पाप मेरे जीते-जी नहीं होगा। मैंने वचन दिया है — पहले मेरा शरीर, फिर नंदिनी।" आँख बंद कर ली। मृत्यु का इंतजार। तभी फूल बरसे। शरीर का लकवा खुला। आँख खोली। न सिंह था, न गुफा। सामने नंदिनी दिव्य रूप में खड़ी। कामधेनु जैसी, पर छोटी। बोली: "उठो पुत्र दिलीप, ये माया थी, तुम्हें परखा सिंह ने नहीं, मैंने था। तुम्हारा हाथ मैंने ही जकड़ा था देखना था तुम बाण चलाते हो या जान देते हो।" "तुम पास हुए। गौ-शाप कट गया। वर माँगो।" दिलीप पैरों में गिर पड़े, बोले "माता, पुत्र चाहिए। रघुकुल का दीपक।" नंदिनी: "तथास्तु। तुम्हें पुत्र होगा ,*रघु* वो इतना प्रतापी होगा कि तुम्हारा वंश 'रघुवंश' कहलाएगा। वो इंद्र को भी हरा देगा। जाओ, रानी सुदक्षिणा को ये दूध पिलाओ।" नंदिनी ने दूध का पात्र दिया। 🙏 दिलीप आश्रम लौटे। सुदक्षिणा को दूध पिलाया। 9 महीने बाद पुत्र जन्म। नाम रखा *रघु* क्योंकि 'रघु' माने 'वेगवान' ये बालक पैदा होते ही इतना तेजस्वी था कि सूर्य भी शरमा जाए। बड़े होकर रघु ने दिग्विजय की, चारों दिशा जीती स्वर्ग पर चढ़ाई की इंद्र डरकर भागा इसीलिए कुल 'रघुवंश' कहलाया। रघु → अज → दशरथ → राम। मतलब: अगर दिलीप 21 दिन गाय न चराते, तो राम न होते, राम के जन्म की पहली सीढ़ी 'गौ-सेवा' थी। जय श्रीराम 🚩
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