sn vyas
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रामचरित के आधार पर भाईचार प्रसंग में 'संगति' और सिक्के का दोनों तरफ :
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त्रेता और द्वापर युग में भाईचार की निदर्शन कुछ अलग होने से भी इसकी मौलिक अंतःस्वर में कुछ भी फर्क नहीं आती है। इसीलिए सार्वजनीन और सर्वकालीन मंथन योग्य होकर, आजतक भारतीय आर्यों के सामाजिक तथा सांस्कृतिक चेतना के अंदर उज्जीवित रहा है। भाई के लिए भाई कैसे आंख बन्द कर उच्छर्गीकृत होता है, रोचक शैली में इसकी अनेकानेक उदाहरण योग्य कथावस्तु को हमलोग रामायण और महाभारत से जानते है। लेकिन कुछ वस्तुवादी लोगों इन बातों को सिर्फ काव्यमयी कहानियां समझकर, असल में इनकी अंतर्निहित दिव्य सन्देश को महत्व नहीं दे पाते हैं।।
इस कलियुग में श्रीक्षेत्र- पूरी में विराजित श्रीमंदिर के अंदर रत्न- सिंघासनोपरि दोनों भ्राता श्रीजगन्नाथ जी और श्रीबलभद्र जी के साथ, बहन सुभद्रा जी को कोई दर्शन करें, तो वंहा विश्व- भाईचार के अनोखा प्रतीकात्मक स्वरूप, मतलब भाई- बहनों का पवित्र- अटूट- अनमोल रिस्ते को अवश्य प्रत्यक्ष कर पाएंगे। सिर्फ इतनी सी बात नहीं, जब वंहा कोई आषाढ़ शुक्ल दशमी के अवसर पर अनुष्ठित विश्व प्रसिद्ध 'रथ- यात्रा' में तीनों भाई- बहनों की नगर परिक्रमा दृश्य देखते हैं, तब लाखों लोगों के भव्य समारोह में वंहा रगरग से अभूतपूर्व भाईचार की शिहरण फैल जाते हैं।।
त्रेता युगीय रामायण में रघुकुल- नन्दन चारो भाइयों के आपस में उच्छर्गीकृत प्रेमभाव को कौन सभ्य इंसान नहीं जानता ! वंहा भी विश्रवा- कुल के सिर्फ हरिभक्त बिभीषण को छोड़कर, लंकपति असुरराज रावण समेत उनके पुत्र और भाइयों तथा कुटुंब के अन्यान्य लोगों में भी मरते दम तक कैसे एकता रूपी भाईचार सम्पर्क अटूट रहा था, ये बात को कोई नजर अंदाज नहीं कर सकते हैं।।
ऐसे, कोई भी द्वापर कालीन महाभारत को मंथन करेंगे, तो वंहा पांडवों का आपस में भाईचार को देखकर अभिभूत होना कोई नयी बात नहीं है। और दूसरे तरफ पंच पांडवों से अलग धृतराष्ट्र नन्दन दुर्योधन समेत कौरवों शत भाइयों तथा कुटुंब और बन्धुओं में जीवदशा व्यापी जिस हिसाब से इच्छाकृत या अनिच्छाकृत "संगति" अटूट रहा था, ओ सब भी चिन्तन योग्य उदाहरण होकर सामने है।।
💐 गोस्वामी तुलसी दास जी श्री रामचरित मानस- अरण्य काण्ड- दोहा- 1, 2, 4, 5 में लिखे है-- "जे न मित्र दुख होहिं दुखारी, तिन्हहिं बिलोकत पातक भारी। निज दुख गिरि सम रज करि जाना, मित्र क दुख रज मेरु समयााना। कुपथ निवारि सुपंथ चलावा, गुन प्रगटै अवगुनन्हि दुरावा। देत लेत मन संक न धरई, बल अनुमान सदा हित करई। बिपति काल कर सतगुन नेहा, श्रुति कह संत मित्र गुन एहा।।"
उपरोक्त दोहे की भावार्थ है-- "जो लोग किसी को अपना मित्र तो मानते है, पर मित्र के दुख में न तो दुख महसूस करते है और न ही अपने मित्र का सहयोग करते है-- दुख के समय मित्र के दुख में दुखी न होने वाले ऐसे स्वार्थी मित्रो को देखने से भी पाप लगता है। जो अपने बड़े से बड़े दुख को बहुत छोटा मानकर अनदेखा कर अपने मित्र के छोटे से छोटे दुख को बड़ा मानकर प्राथमिकता दे, जो अपने मित्र को कुपथ (बुरी संगति और बुरे रास्ते) से दूर हटा कर सुपथ (सुसंगति और सही मार्ग) पर ले जाये, मित्र के अवगुणों को दूर कर मित्र के अंदर सद्गुणों को विकसित करे, मित्र से लेन- देन करते समय छल- कपट- भेदभाव- शंका- संदेह न करे तथा अपनी शक्ति और सामर्थ्य के अनुसार सदैव मित्र का हित करे, सामान्य परिस्थितियो की तुलना में बिपत्ति के समय सौ गुना अधिक मित्र से प्रेम करते हुए उसकी परवाह करे, श्रुति (वेद) के अनुसार वही सज्जन (सच्चा) मित्र होता है।" इसीलिए कोई समाज में अपने लिए अच्छा, सच्चा और सज्जन मित्र चाहते है, तो स्वयं में इन गुणों का विकास कर, पहले स्वयं एक आदर्श मित्र बने और गुण- दोष का परीक्षण कर उचित व्यक्ति के साथ ही मित्रता करें।।
फिर गोस्वामी जी निष्कर्ष में कहते हैं की-- हमेशा "संगति' अच्छा रखना चाहिए; यथा-- "तुलसी भलो सुसंग तें पोच कुसंगति सोइ। नाउ किंनरी तीर असि लोह बिलोकहु लोइ।" इस एक ही दोहा में अति सुंदर व रोचक शैली में सन्त गोस्वामी जी "संगति" से उपजे दोनों किसम के 'अछे' और 'बुरे' "भाईचार" को विश्लेषण करने की दिगदर्शन अर्पित किया है। उनके दिव्यदृष्टि से-- "अच्छे लोगों की संगति से मनुष्य अच्छा और बुरे लोगों की संगति से बुरा हो जाता है।।"
सामान्यतः लोहा पानी में डूब जाता है; लेकिन लोहे को नाव का कील बना देने से वह लोगों को पार करने वाला हो जाता है। संगीत यंत्र में वह लोहा लग गया तो सुमधुर संगीत निकलता है, जिससे आनंद की अनुभूति होती है। परन्तु यदि वही लोहा कुसंगति में पड़ गया तो, घातक या नाशक बन जाता है। जैसे, कसाई के जीव हत्या वाला तीर- तलवार- छुरी- चाकू आदि आखिर यह भी तो लोहा ही है ना, पर हत्या आदि कार्यों में प्रयुक्त होता है। अतः "भूलि न करिय कुसंग"-- अर्थात, अच्छे लोगों की संगति हमेशा श्रेयष्कर होते है।।
गोस्वामी जी की उपरोक्त सन्देश में रघुकुल के चारों भ्राता, सुग्रीब- हनुमान आदि बानर मित्र, असुर कुल से होने भी हरिभक्त मित्र विभीषण-- एक- एक सही मित्र होने की कर्त्तव्य- कर्म के साथ भाईचार का भी अनमोल दृष्टान्त योग्य बने थे। ऐसे द्वापर में भी त्रेता युगीय रावण वंश तुल्य कुरुकुल- भाईचार की प्राचुर्य तो देखने लायक है, जंहा "सत्ता" हासिल की "स्वार्थ" ही मुख्य रूप में अंत:स्वर बन गयी थी। और इसीलिए त्रेता युगीय रघुवंशी चारों भ्राताओं में "संगति" जैसी "निःस्वार्थ भाईचार" की अनन्य आदर्श एक विरल दृष्टान्त होकर रह गया है।।
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