sn vyas
587 views 2 days ago
#जय मां लक्ष्मी #मां लक्ष्मी समुद्र मंथन से प्रकट हुईं माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु का वरण सृष्टि के प्रारम्भिक काल में एक समय ऐसा आया जब देवताओं का तेज, बल और वैभव क्षीण हो गया। इसका कारण महर्षि दुर्वासा का शाप था। एक बार महर्षि दुर्वासा ने देवराज इन्द्र को भगवान की कृपा से प्राप्त दिव्य पुष्पमाला भेंट की। इन्द्र ने उस माला का उचित सम्मान नहीं किया और उसे अपने ऐरावत हाथी के मस्तक पर रख दिया। हाथी ने माला को भूमि पर गिराकर पैरों से कुचल दिया। महर्षि दुर्वासा ने इसे भगवान के प्रसाद का अपमान माना और क्रोधित होकर इन्द्र तथा समस्त देवताओं को श्रीहीन होने का शाप दे दिया। शाप के प्रभाव से देवताओं का तेज समाप्त होने लगा। असुरों ने तीनों लोकों पर अधिकार जमाना शुरू कर दिया। तब सभी देवता भगवान विष्णु की शरण में पहुँचे। भगवान विष्णु ने उन्हें उपाय बताया कि यदि देवता और असुर मिलकर क्षीरसागर का मंथन करें तो उससे अमृत सहित अनेक दिव्य रत्न प्रकट होंगे। उसी अमृत के पान से देवताओं को पुनः शक्ति प्राप्त होगी। भगवान विष्णु की आज्ञा से देवताओं ने असुरराज बलि से संधि की। मंदराचल पर्वत को मंथन-दण्ड बनाया गया और नागराज वासुकि को रस्सी के रूप में प्रयोग किया गया। जब पर्वत समुद्र में डूबने लगा तब भगवान विष्णु ने विशाल कूर्म (कछुए) का अवतार धारण कर अपनी पीठ पर मंदराचल पर्वत को धारण किया। इसके बाद समुद्र मंथन प्रारम्भ हुआ। मंथन के आरम्भ में सबसे पहले भयंकर हलाहल विष निकला। उसके प्रभाव से सम्पूर्ण सृष्टि संकट में पड़ गई। तब भगवान शिव ने समस्त प्राणियों की रक्षा के लिए उस विष का पान किया और उनके कंठ में विष रुक जाने से वे नीलकण्ठ कहलाए। इसके बाद समुद्र से एक-एक करके अनेक दिव्य रत्न प्रकट हुए। इनमें कामधेनु, उच्चैःश्रवा अश्व, ऐरावत हाथी, कौस्तुभ मणि, कल्पवृक्ष, अप्सराएँ, वारुणी देवी, चन्द्रमा, पारिजात वृक्ष तथा अन्य अनेक दिव्य वस्तुएँ निकलीं। फिर एक अद्भुत और दिव्य क्षण आया। क्षीरसागर की लहरों के मध्य एक पूर्ण विकसित कमल पर विराजमान होकर स्वयं श्री लक्ष्मी प्रकट हुईं। उनके मुखमण्डल का तेज हजारों सूर्यों के समान था, किंतु उनकी शीतल मुस्कान चन्द्रमा जैसी मनोहर थी। उनके हाथों में कमल शोभायमान थे और सम्पूर्ण वातावरण दिव्य सुगन्ध तथा मंगलध्वनि से भर गया। देवता, ऋषि, गंधर्व, सिद्ध, चारण और अप्सराएँ उनकी स्तुति करने लगे। सभी ने उनका विधिपूर्वक अभिषेक किया। इस घटना को "श्री लक्ष्मी अभिषेक" भी कहा जाता है। माता लक्ष्मी के प्रकट होते ही सभी देवता और असुर उन्हें अपने जीवनसाथी के रूप में प्राप्त करना चाहते थे। किन्तु देवी लक्ष्मी केवल रूप, बल या वैभव से प्रभावित होने वाली नहीं थीं। वे ऐसे पुरुष की खोज में थीं जिसमें धर्म, सत्य, करुणा, धैर्य, समता, क्षमा, मर्यादा और सम्पूर्ण सृष्टि के पालन की क्षमता हो। उन्होंने सभी उपस्थित देवताओं, ऋषियों और असुरों को देखा। किसी में क्रोध अधिक था, किसी में अहंकार, किसी में लोभ, तो किसी में अस्थिरता। अंततः उनकी दृष्टि भगवान विष्णु पर जाकर ठहर गई। भगवान विष्णु पूर्णतः शांत, निष्पक्ष, धर्मपरायण, करुणामय और लोककल्याण के लिए सदैव समर्पित थे। उनके हृदय में न अहंकार था, न लोभ और न ही किसी प्रकार का पक्षपात। माता लक्ष्मी ने समझ लिया कि सम्पूर्ण सृष्टि में भगवान विष्णु ही ऐसे हैं जो उनके साथ सदा धर्म और मर्यादा की रक्षा करेंगे। उन्होंने अपने हाथों में सुन्दर पुष्पमाला लेकर भगवान विष्णु के गले में डाल दी और उन्हें अपने पति के रूप में स्वीकार किया। इस प्रकार समुद्र मंथन के दौरान भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का दिव्य मिलन हुआ। तभी से माता लक्ष्मी भगवान विष्णु के वक्षस्थल पर श्रीवत्स के रूप में निवास करती हैं और उन्हें "श्रीपति", "लक्ष्मीपति" तथा "नारायण" कहा जाता है। इसके बाद समुद्र मंथन से भगवान धन्वन्तरि अमृत कलश लेकर प्रकट हुए। अमृत प्राप्त करने के लिए देवताओं और असुरों में संघर्ष हुआ। तब भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप धारण कर अपनी दिव्य बुद्धि से देवताओं को अमृत पिलाया और धर्म की रक्षा की। यह प्रसंग केवल एक पौराणिक कथा नहीं, बल्कि गहन आध्यात्मिक संदेश भी देता है। समुद्र मंथन हमारे मन का प्रतीक है, देवता हमारे शुभ विचार हैं, असुर हमारी बुरी प्रवृत्तियाँ हैं, और मंथन जीवन के संघर्षों का प्रतीक है। जब मन का मंथन होता है तो पहले विष अर्थात् दुःख और कठिनाइयाँ सामने आती हैं, परन्तु धैर्य, संयम और भगवान पर विश्वास रखने से अंततः लक्ष्मी अर्थात् समृद्धि, शांति और अंत में अमृत रूपी दिव्य ज्ञान की प्राप्ति होती है।
23 likes
7 shares

More like this