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P S Yadav Ajanabi - Author on ShareChat
P S Yadav Ajanabi
778 views • 21 days ago
#शब्द संवाद #📓 हिंदी साहित्य
चारु शहनाइयों में खुद को  उलझाते रहे। मौन अक्सों से बेवजह बतियाते रहे। तनहाइयों   से हम   बातें   करते रहे, अंधेरों में हम महफिल सजाते रहे। रहे   हमें 3679< 45984, फंसाते कंटीले  नयनों  से हम धोखे खाते रहे। भोर की चाहत पर निशा जगाती रही , में छुपाते रहे। वफा केदाग अंधियारों ताउम्र चलते रहे आहटों के सहारे में ही हम सुबह बिसराते रहे। ٩ डसती रही दीवार में छुपकर घातें धूप की छांव में  बदन को जलाते रहे। ढलती   रही बस शमा के सहारे रात भटकाव में हम खुशियां लुटाते रहे। चारु शहनाइयों में खुद को  उलझाते रहे। मौन अक्सों से बेवजह बतियाते रहे। तनहाइयों   से हम   बातें   करते रहे, अंधेरों में हम महफिल सजाते रहे। रहे   हमें 3679< 45984, फंसाते कंटीले  नयनों  से हम धोखे खाते रहे। भोर की चाहत पर निशा जगाती रही , में छुपाते रहे। वफा केदाग अंधियारों ताउम्र चलते रहे आहटों के सहारे में ही हम सुबह बिसराते रहे। ٩ डसती रही दीवार में छुपकर घातें धूप की छांव में  बदन को जलाते रहे। ढलती   रही बस शमा के सहारे रात भटकाव में हम खुशियां लुटाते रहे।
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    P S Yadav Ajanabi
    #शब्द संवाद
    ब्यर्थ गीता স্তুনান ভরী ঠীনা बढ जार्ती हैं जीबन सांसे किसी के मुस्कुराने से। @೨: फिर भी बाज नर्ही आते लोग नफ़रत फैलाने से। बढ गया लोर्गों में अब झूठ और लूट का चलन , आज फुर्सत नर्ही है उनको अपर्नों के गिराने से। सूनाने से उठ गया जेह़न से अब ईमानदारी का सलीका। ठगी ब बेईमानी का हर बक्तखोजता तरीका। सभी का मकसद किसी को  गिराना ब सताना मूर्ल्यों का हुआ पतन क्या रखा   कुछ बताने से। तन से उजला दिखे पर मन से दिखता लाचार। द्वंद के बाजार में आज छुपा हुआ बो ब्यबहार।  दौलत और शोहरत ही बस सभी का अरमान कटुता के बाजार में आज अपने भी बेगाने से। रि्श्तों की कीमत घटी धन की चाहत के आगे। में नर सुख की राहत में भागे। घात ब प्रतिघात ना सुख मिलता ना दुःख टलता प्रतिशोध शेष खोई जीबन तरंग  क्या फायदा बढ़ते जाने से। कर्म करता नर्हीं पर मन में सुख की अभिलाष। बिंन दीप के उजाला ये कैसी जीबन परिभाषा। बंजर भूमि पर हरियाली मेह़नत ने ही फैलायी हौसला कमजोर जहां , फर्क नर्ही   समझाने से। मुफ्त की खाने से अक्सर तेजाब बढ जाता है। चर्बी बढ जाने से लीबर  भी आंख दिखाता हैं। किडनी कर देती काम बंद तब कर्तब्य सुहाते , जैसी करनी बैसी भरनी ब्यर्थ गीता सुनाने से। ब्यर्थ गीता স্তুনান ভরী ঠীনা बढ जार्ती हैं जीबन सांसे किसी के मुस्कुराने से। @೨: फिर भी बाज नर्ही आते लोग नफ़रत फैलाने से। बढ गया लोर्गों में अब झूठ और लूट का चलन , आज फुर्सत नर्ही है उनको अपर्नों के गिराने से। सूनाने से उठ गया जेह़न से अब ईमानदारी का सलीका। ठगी ब बेईमानी का हर बक्तखोजता तरीका। सभी का मकसद किसी को  गिराना ब सताना मूर्ल्यों का हुआ पतन क्या रखा   कुछ बताने से। तन से उजला दिखे पर मन से दिखता लाचार। द्वंद के बाजार में आज छुपा हुआ बो ब्यबहार।  दौलत और शोहरत ही बस सभी का अरमान कटुता के बाजार में आज अपने भी बेगाने से। रि्श्तों की कीमत घटी धन की चाहत के आगे। में नर सुख की राहत में भागे। घात ब प्रतिघात ना सुख मिलता ना दुःख टलता प्रतिशोध शेष खोई जीबन तरंग  क्या फायदा बढ़ते जाने से। कर्म करता नर्हीं पर मन में सुख की अभिलाष। बिंन दीप के उजाला ये कैसी जीबन परिभाषा। बंजर भूमि पर हरियाली मेह़नत ने ही फैलायी हौसला कमजोर जहां , फर्क नर्ही   समझाने से। मुफ्त की खाने से अक्सर तेजाब बढ जाता है। चर्बी बढ जाने से लीबर  भी आंख दिखाता हैं। किडनी कर देती काम बंद तब कर्तब्य सुहाते , जैसी करनी बैसी भरनी ब्यर्थ गीता सुनाने से।
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  • P S Yadav Ajanabi - Author on ShareChat
    P S Yadav Ajanabi
    #शब्द संवाद
    ঈস মী থারি लगती है हसीन   जिंदगी जरा मुस्कुराने से।  दिल दुखाने से। कहां बाज आते अब लोग अगर दुःखों में तुम सहाई , नर्हीं बन सकते कुछ न मिलेगा तुम्हें किसी को उलझने से। भला   इंसान बुरे वक्त को बदल सकता है। बुरे आचरण   में अच्छा गुण नर्हीं ढलता है। अच्छाई के कदम छोड़ते हैं एक पहचान , फिजूल  कुछ छोड़ कर जाओ , है बचाने से। जवानी में नर्हीं बुढ़ापे में क्या कर पाएगा।  पश्चाताप के आंसू फिर उम्र भर बहाएगा। दिल के भ्रम में आरोप प्रत्यारोप   निशानी पास वाला भी खो जाएगा ठहर जाने से। बहते रहो खुशबू उजड़े चमन में। qe ताकि मरने के बाद काम आओ अमन में। कितना भी करें संग्रह साथ में ना जाएगा कितना यह जीवन हम सभी अनजाने से। छोड़िए व्यभिचार सारे बनावटी व्यवहार। झूठ में कहां टिकता एक अच्छा संस्कार। झूठ के कदम नर्हीं खोजते सच की राहें नफरतें छोड़कर जुड़ जाइए जमाने से। बोझ बनकर  जिए तो खुद के गुनहगार। बनिए गैरों के माझी तभी  तुम मददगार।  कलह अंगार्रों में प्रेम कली नर्हीं खिलती प्रेम ही शक्ति कुछ नर्हीं नफ़रत నాI बढ़ाने ٩ ؟٤ 'अजनबी' यादव ঈস মী থারি लगती है हसीन   जिंदगी जरा मुस्कुराने से।  दिल दुखाने से। कहां बाज आते अब लोग अगर दुःखों में तुम सहाई , नर्हीं बन सकते कुछ न मिलेगा तुम्हें किसी को उलझने से। भला   इंसान बुरे वक्त को बदल सकता है। बुरे आचरण   में अच्छा गुण नर्हीं ढलता है। अच्छाई के कदम छोड़ते हैं एक पहचान , फिजूल  कुछ छोड़ कर जाओ , है बचाने से। जवानी में नर्हीं बुढ़ापे में क्या कर पाएगा।  पश्चाताप के आंसू फिर उम्र भर बहाएगा। दिल के भ्रम में आरोप प्रत्यारोप   निशानी पास वाला भी खो जाएगा ठहर जाने से। बहते रहो खुशबू उजड़े चमन में। qe ताकि मरने के बाद काम आओ अमन में। कितना भी करें संग्रह साथ में ना जाएगा कितना यह जीवन हम सभी अनजाने से। छोड़िए व्यभिचार सारे बनावटी व्यवहार। झूठ में कहां टिकता एक अच्छा संस्कार। झूठ के कदम नर्हीं खोजते सच की राहें नफरतें छोड़कर जुड़ जाइए जमाने से। बोझ बनकर  जिए तो खुद के गुनहगार। बनिए गैरों के माझी तभी  तुम मददगार।  कलह अंगार्रों में प्रेम कली नर्हीं खिलती प्रेम ही शक्ति कुछ नर्हीं नफ़रत నాI बढ़ाने ٩ ؟٤ 'अजनबी' यादव
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  • P S Yadav Ajanabi - Author on ShareChat
    P S Yadav Ajanabi
    #शब्द संवाद #✍️ साहित्य एवं शायरी #📓 हिंदी साहित्य
    ईश्वर का नूर যন তীনন টঁ বসামা; सयम కై ఛ# A[ HIHA HFHII कट गर्ई कुछ कटनी है बाकी, कभी अंत बनेगा हमारा सार। অনতান মা্টু মদ্ বসায়; সু এলযরব এা ট সন আানাI সাঘুমী লব্ধয  ঘুসনা টিল স; ईश्वर का नूर স২ক্র ব্রম আা সব্া বযানা নল্থা-নল্থা ববন টঁ বা এল;  ٩٤٤ इरेक रच्ा जर है। নবী বিভ্নী ট সটিল ব্ধীহ कैसी चद्घ औंधी सी डगर है। जाते ईै भागत- भागते থব্ধ आस रद्घ जञातनी মন সখুঠীী आस्था रू्पी उन डोरि्या मे पायश्चित   ही है एक मजनूरी।  स्वपन रू्पी उन   आईनों मॅ रद् जाती जीवन परिभाषा। বূz ঘা যব্ত স जो अधूरा, अधुरी रदती दै अभिलाषा। fiaಗ 7f1 ಣ್ಕ aTಗಯ, आगे क्या बो जाने करतार। धर्म और अधर्म के पथ पे, सिर्फ एक सत्घ  ही आधार। गगन छोर सेक्घा निचरता কনো বল धरा मेँ एक शूशभित्ता " হানি; HHஈ जनन्जन को करती मोद्ित्त।  धरती केसुंदर भू खपडों मे पर्वत्त और कर्दी सागर fHIF எ fHhR, कर्दी वर्नॉं की है छटा अनूप। सृर्ि की अनुपम रचना मेँ जीवन बाघु वा खिलती धूप| ভ্রান ব্রূী সখুস ব্রব ক্রল; कर्ही पुष्प का सुर्गधित  कित्तने दिन तक  रैन बसेरा, घद्घ मानच्व की परंच से दूर। बढ़त्ता चल् आर्गे को राद्ी , मोक्ष  धाम ही ईश्वर का नूर। ईश्वर का नूर যন তীনন টঁ বসামা; सयम కై ఛ# A[ HIHA HFHII कट गर्ई कुछ कटनी है बाकी, कभी अंत बनेगा हमारा सार। অনতান মা্টু মদ্ বসায়; সু এলযরব এা ট সন আানাI সাঘুমী লব্ধয  ঘুসনা টিল স; ईश्वर का नूर স২ক্র ব্রম আা সব্া বযানা নল্থা-নল্থা ববন টঁ বা এল;  ٩٤٤ इरेक रच्ा जर है। নবী বিভ্নী ট সটিল ব্ধীহ कैसी चद्घ औंधी सी डगर है। जाते ईै भागत- भागते থব্ধ आस रद्घ जञातनी মন সখুঠীী आस्था रू्पी उन डोरि्या मे पायश्चित   ही है एक मजनूरी।  स्वपन रू्पी उन   आईनों मॅ रद् जाती जीवन परिभाषा। বূz ঘা যব্ত স जो अधूरा, अधुरी रदती दै अभिलाषा। fiaಗ 7f1 ಣ್ಕ aTಗಯ, आगे क्या बो जाने करतार। धर्म और अधर्म के पथ पे, सिर्फ एक सत्घ  ही आधार। गगन छोर सेक्घा निचरता কনো বল धरा मेँ एक शूशभित्ता " হানি; HHஈ जनन्जन को करती मोद्ित्त।  धरती केसुंदर भू खपडों मे पर्वत्त और कर्दी सागर fHIF எ fHhR, कर्दी वर्नॉं की है छटा अनूप। सृर्ि की अनुपम रचना मेँ जीवन बाघु वा खिलती धूप| ভ্রান ব্রূী সখুস ব্রব ক্রল; कर्ही पुष्प का सुर्गधित  कित्तने दिन तक  रैन बसेरा, घद्घ मानच्व की परंच से दूर। बढ़त्ता चल् आर्गे को राद्ी , मोक्ष  धाम ही ईश्वर का नूर।
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  • P S Yadav Ajanabi - Author on ShareChat
    P S Yadav Ajanabi
    #शब्द संवाद
    व्यर्थ गीता सुनाने से बढ़ जातीं हैं जीवन सांसे किसी के मुस्कुराने से।  फिर भी बाज नहीं आते लोग नफ़रत फैलाने से। और लूट का " बढ़ गया लोगों में अब झूठ चलन, आज फुर्सत नहीं है उनको अपनों के गिराने से। जेह़न से अब ईमानदारी का सलीका। उठ गया ठगी व बेईमानी का हर वक्त खोजता तरीका। सभी का मकसद किसी को   गिराना व सताना का हुआ पतन क्या रखा   कुछ बताने से। मूल्यों : तन से उजला दिखे पर   मन से दिखता लाचार। द्वंद के बाजार में आज  छुपा हुआ वो व्यवहार।  दौलत और शोहरत ही बस सभी का अरमान कटुता के बाजार में आज अपने  भी बेगाने से। रिश्तों की कीमत घटी धन की चाहत के आगे। घात व प्रतिघात   में नर सुख की राहत में भागे। ना सुख मिलता ना दुःख टलता प्रतिशोध शेष, खोई जीवन तरंग बढ़ते जाने से। क्या फायदा कर्म करता नहीं पर मन में सुख की अभिलाष। विंन दीप के उजाला ये कैसी जीवन परिभाषा।  बंजर भूमि पर हरियाली मेहनत ने ही फैलायी, हौसला कमजोर जहां , फर्क नहीं समझाने से। मुफ्त की खाने से अक्सर तेजाब बढ़ जाता है। चर्बी बढ जाने सें लीवर   भी आंख दिखाता हैं। किडनी कर देती काम बंद तब कर्तव्य सुहाते, जैसी करनी वैसी भरनी व्यर्थ गीता सुनाने से। व्यर्थ गीता सुनाने से बढ़ जातीं हैं जीवन सांसे किसी के मुस्कुराने से।  फिर भी बाज नहीं आते लोग नफ़रत फैलाने से। और लूट का " बढ़ गया लोगों में अब झूठ चलन, आज फुर्सत नहीं है उनको अपनों के गिराने से। जेह़न से अब ईमानदारी का सलीका। उठ गया ठगी व बेईमानी का हर वक्त खोजता तरीका। सभी का मकसद किसी को   गिराना व सताना का हुआ पतन क्या रखा   कुछ बताने से। मूल्यों : तन से उजला दिखे पर   मन से दिखता लाचार। द्वंद के बाजार में आज  छुपा हुआ वो व्यवहार।  दौलत और शोहरत ही बस सभी का अरमान कटुता के बाजार में आज अपने  भी बेगाने से। रिश्तों की कीमत घटी धन की चाहत के आगे। घात व प्रतिघात   में नर सुख की राहत में भागे। ना सुख मिलता ना दुःख टलता प्रतिशोध शेष, खोई जीवन तरंग बढ़ते जाने से। क्या फायदा कर्म करता नहीं पर मन में सुख की अभिलाष। विंन दीप के उजाला ये कैसी जीवन परिभाषा।  बंजर भूमि पर हरियाली मेहनत ने ही फैलायी, हौसला कमजोर जहां , फर्क नहीं समझाने से। मुफ्त की खाने से अक्सर तेजाब बढ़ जाता है। चर्बी बढ जाने सें लीवर   भी आंख दिखाता हैं। किडनी कर देती काम बंद तब कर्तव्य सुहाते, जैसी करनी वैसी भरनी व्यर्थ गीता सुनाने से।
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  • P S Yadav Ajanabi - Author on ShareChat
    P S Yadav Ajanabi
    #शब्द संवाद
    ய gga ತ್ರತರತ [ರಿತೊ गुख्दैगु खींदनाथुढैयोर sial gulfiue ತುಠ 6 gI-gGuUu) श्रद्धजलि gg ய gga ತ್ರತರತ [ರಿತೊ गुख्दैगु खींदनाथुढैयोर sial gulfiue ತುಠ 6 gI-gGuUu) श्रद्धजलि gg
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  • P S Yadav Ajanabi - Author on ShareChat
    P S Yadav Ajanabi
    #शब्द संवाद #📓 हिंदी साहित्य #✍️ साहित्य एवं शायरी
    दौनदो पोधे लगाएं कर रहे हो क्यों निरादर प्रकृति के मान का। शुद्ध हवा ना होगी तब क्या होगा जहान का। । सुंदर महलों में जब शुद्ध हवा नहीं आएगी। जीने की आस तब कहां रह जाएगी। | हमारे प्रकृति का संरक्षण जब तक ना हो पाएगा।  तब कैसे धरती पर कोई जीवित बच पाएगा। ] वक्त यही है प्रकृति कौ सुरक्षित बचाने का। धरती की शोभा को वक्त है पेड़ लगाने का।। विलुप्त हुए जीव जंतुओं का आव्हान करें। प्रेम पूर्वक मिलकर सभी सुरक्षा प्रदान करें।। जीर्वों के सहयोग से ही प्रकृति टिकी हुई है। धरती के संतुलन से ही जिन्दगी बची हुई है।l भू संतुलन बिगड़ते ही तबाही शेष हमारी।  जीवन की खुशियां भी हो जाएगी बीमारी। ] शिक्षा पाकर भी जीर्वों को बनाता आहार। जबकि यह जीवन भी चंद पर्लों का सार।l जीव छोटा या बड़ा रक्षा का प्रथ्वी पर भार। जीर्वों कौ सुरक्षित रखना हमारा अधिकारा आओ हम मिलकर धरती की शोभा बढ़ाएं। धरती पर दो-दो पोधे लगाएं। নিলক্রূব  सभी पी एस यादव अजनबी टोडरपुर बिसौली बदायूं ( उत्तर प्रदेश) दौनदो पोधे लगाएं कर रहे हो क्यों निरादर प्रकृति के मान का। शुद्ध हवा ना होगी तब क्या होगा जहान का। । सुंदर महलों में जब शुद्ध हवा नहीं आएगी। जीने की आस तब कहां रह जाएगी। | हमारे प्रकृति का संरक्षण जब तक ना हो पाएगा।  तब कैसे धरती पर कोई जीवित बच पाएगा। ] वक्त यही है प्रकृति कौ सुरक्षित बचाने का। धरती की शोभा को वक्त है पेड़ लगाने का।। विलुप्त हुए जीव जंतुओं का आव्हान करें। प्रेम पूर्वक मिलकर सभी सुरक्षा प्रदान करें।। जीर्वों के सहयोग से ही प्रकृति टिकी हुई है। धरती के संतुलन से ही जिन्दगी बची हुई है।l भू संतुलन बिगड़ते ही तबाही शेष हमारी।  जीवन की खुशियां भी हो जाएगी बीमारी। ] शिक्षा पाकर भी जीर्वों को बनाता आहार। जबकि यह जीवन भी चंद पर्लों का सार।l जीव छोटा या बड़ा रक्षा का प्रथ्वी पर भार। जीर्वों कौ सुरक्षित रखना हमारा अधिकारा आओ हम मिलकर धरती की शोभा बढ़ाएं। धरती पर दो-दो पोधे लगाएं। নিলক্রূব  सभी पी एस यादव अजनबी टोडरपुर बिसौली बदायूं ( उत्तर प्रदेश)
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  • Satyanand Mudaliar - Author on ShareChat
    Satyanand Mudaliar
    World Nature Conservation Day......... #संभाषण
    World Nature Conservation Day........., संभाषण
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  • P S Yadav Ajanabi - Author on ShareChat
    P S Yadav Ajanabi
    #शब्द संवाद
    ٧ ঔনুযয ঔহতা छिमेकी हदै गर्न थाले बुढाले  घमण्डी कुराले हदै गर्न थाले मिली मास्न थाले मुलुकको भकारी विदेशी मुसाले हदै गर्न थाले भलै भ्रष्ट होस् मान हुन्छ ठुलाको HHI हदै गर्न थाले हुनाले 7 कुरा गर्छ सुल्टो गरी काम उल्टो फरेबी कलाले हदै गर्न थाल्यो अगुल्टाले सब काम गर्छौँ भनेछन् हिजोका भुराले हदै गर्न थाले मुतकारिव मुसम्मन सालिम बहर अर्कान फऊलुन् फऊलुन् फऊलुन् फऊलुन् १२२ - १२२ बजन ??? = ??? काफिया (एकाक्षरी स्वर) 3T तहलिली रदिफ : ले रदिफ : हदै गर्न थाले स्वर्ण पाठशाला अभ्यास ٧ ঔনুযয ঔহতা छिमेकी हदै गर्न थाले बुढाले  घमण्डी कुराले हदै गर्न थाले मिली मास्न थाले मुलुकको भकारी विदेशी मुसाले हदै गर्न थाले भलै भ्रष्ट होस् मान हुन्छ ठुलाको HHI हदै गर्न थाले हुनाले 7 कुरा गर्छ सुल्टो गरी काम उल्टो फरेबी कलाले हदै गर्न थाल्यो अगुल्टाले सब काम गर्छौँ भनेछन् हिजोका भुराले हदै गर्न थाले मुतकारिव मुसम्मन सालिम बहर अर्कान फऊलुन् फऊलुन् फऊलुन् फऊलुन् १२२ - १२२ बजन ??? = ??? काफिया (एकाक्षरी स्वर) 3T तहलिली रदिफ : ले रदिफ : हदै गर्न थाले स्वर्ण पाठशाला अभ्यास
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    P S Yadav Ajanabi
    #📓 हिंदी साहित्य #शब्द संवाद #✍️ साहित्य एवं शायरी
    चारु शहनाइयों में खुद को उलझाते रहे। मौन अक्सों से बेवजह बतियाते रहे। तनहाइयों   से हम   बार्तें   करते रहे, अंधेरों में हम महफिल सजाते रहे। फंसाते रहे हर्में उलफत के फरेब, कंटीले नयनों से हम धोखे खाते रहे। भोर की चाहत पर निशा जगाती रही, अंधियारों में छुपाते रहे। वफा के दाग ताउम्र चलते आहटों के सहारे स्वप्न में ही हम सुबह बिसराते रहे। डसती रही दीवार में छुपकर घातें, दर्द की छांव में विरह गीत गाते रहे। रात ढलती रही बस शमा के सहारे, ख़ुशियां मिटाते रहे। भटकाव में हम चारु शहनाइयों में खुद को उलझाते रहे। मौन अक्सों से बेवजह बतियाते रहे। तनहाइयों   से हम   बार्तें   करते रहे, अंधेरों में हम महफिल सजाते रहे। फंसाते रहे हर्में उलफत के फरेब, कंटीले नयनों से हम धोखे खाते रहे। भोर की चाहत पर निशा जगाती रही, अंधियारों में छुपाते रहे। वफा के दाग ताउम्र चलते आहटों के सहारे स्वप्न में ही हम सुबह बिसराते रहे। डसती रही दीवार में छुपकर घातें, दर्द की छांव में विरह गीत गाते रहे। रात ढलती रही बस शमा के सहारे, ख़ुशियां मिटाते रहे। भटकाव में हम
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