sn vyas
🙏🛐ॐ श्री परमात्मने नमः🛐🙏🙏
🙏कर्म का सिद्धांत पुस्तक से 🙏
#भाग_२५/०१
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🦚प्रारब्ध को तो भोगने से ही छुटकारा मिलता है🦚
क्रियमाण कर्म पक कर प्रारब्ध रूप से आकर सामने खड़े हुए हैं ,,, उनको तो भोगना ही पड़ेगा। जीवन काल दरमियान जितने प्रारब्ध कर्म भोगने के लिए निश्चित हुए हैं,,, उतने संपूर्ण भोग लेने के बाद ही शरीर छूटता है । उसके पहले नहीं । उसमें से , कोई छूट नहीं सकता ।
*बड़े ज्ञानी महर्षि विद्वानों ने भी प्रारब्ध में से छूटने का प्रयत्न नहीं किया ,,, और छूट सके भी नहीं ,,, ऊपर भाग सात में परीक्षित आदि के उदाहरण देकर यह बात स्पष्ट कर दी है।*
*प्रारब्ध बस फल स्वरुप में जो प्राप्त होता है वह तो होगा ही। गृह क्लेश के कारण भगवान राम को बन में जाना पड़ा तब भरत जी को अत्यंत दुख हुआ, उस समय महर्षि वशिष्ठ उसको आश्वासन देते हुए बताते हैं कि---*
*सुनहु भरत भावी प्रबल, बिलखि कहेउ मुनिनाथ।*
*हानि लाभ जीवन मरण, यश अपयश विधि हाथ॥*
*हानि ,लाभ ,जीवन मरण, यश ,अपयश , यह सब प्रारब्ध के बस में है । हानि होना या लाभ होना ,, जीवन होना या मरण ,,, यश मिलना या अपयश मिलना ,,, यह सब प्रारब्ध में निश्चित हुआ हो उसी मुताबिक बनता है।*
*रामायण का सारा इतिहास पढ़ो तो हर एक प्रसंग में यह बात गोस्वामी जी ने बहुत ही कुशलता से प्रस्तुत की है। हानि किसकी हुई और लाभ किसको हुआ ,,, ? यह देखो।*
*हानि कौशल्या को हुई , खुद भगवान राम की माता कौशल्या को अपनी वृद्धावस्था में अपना जवान बेटे बहू को वन में भेजना पड़ा । हानि कौशल्या को हुई और लाभ शबरी को हुआ ,,, घर बैठे भगवान का आगमन हुआ । राम की कौशल्या सगी माता होती थी उसकी हानि हुई ,,, और शबरी उनके कुछ रिश्तेदारी में नहीं थी उसको लाभ हुआ।*
*देखो जीवन किसका बना और मरण किसका हुआ ?,, जीवन अहिल्या का बना और मरण राजा दशरथ का हुआ। जिनके चरण रज के स्पर्श मात्र से अहिल्या को जीवन मिला,, वहीं परात्पर भगवान राम अपने पिता का मरण रोक सके नहीं । प्रारब्ध बलवान है। आगे देखो---*
*यश किसको मिला और अपयश किसको हुआ ?,, अपयश केकई को मिला। कौशल्या से भी केकई का प्रेम राम के ऊपर अधिक था । फिर भी केकई को ऐसी काली टीकी लगी कि जगत के सारे आदमी , स्त्री-पुरुष जब-जब रामायण पढ़ते हैं तब केकई पर धिक्कार बरसाते हैं ।कोई आदमी अपनी पुत्री का नाम केकई नहीं रखेगा ।*
*राम को कौशल्या से भी केकई पर अधिक प्रेम था । फिर भी केकई को ही अपयश मिला । केकई का आत्मबल इतना बड़ा जोरदार था कि भगवान राम को स्वयं राक्षस कुल के संघार के लिए नाटक खेलना था ,, उसमें खलनायिका का पात्र खेलने के लिए केकई माता को पसंद किया ।*
*बहुत अपवाद , निंदा ,बर्दाश्त किए वैधव्य को स्वीकार किया। फिर भी केकई को जो चाल चलनी थी वह मक्कमता पूर्वक खेल के दिखाई।*
*कौशल्या या सुमित्रा को यह खलनायिका का पात्र खेलने के लिए दिया होता तो वे लोगों के अपमान निंदा और वैधव्य के काले टीके की कल्पना मात्र से कंपायमान हो जाती और उस कार्य से खिसक जाती ।*
*अपनी सगी मां से भी अधिक प्यारी ऐसी केकई माता को भगवान के नाटक में अपयश मिला और इस नाटक में वास्तविक यस बानर ले गए।*
*रावण के साथ युद्ध करते समय अयोध्या की मिलिट्री की एक भी बटेलियन काम नहीं आई , ,, बंदरों की सेना राम जैसे राम को ,, रावण के साथ युद्ध में विजय के लिए यस ले गई ।*
*इसलिए मुनि वशिष्ट कहते हैं कि--*
*हानि लाभ जीवन मरण यश अपयश विधि हाथ।*
क्रमश: आगे का भाग ✍🏽
#कर्म #कर्म ही पूजा है #श्रीमद्भागवत गीता के श्लोक ॐ #🙏श्रीमद्भागवत गीता📙 #🙏💐श्रीमद्भागवत गीता💐🙏 bhagwat geeta