sn vyas
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🙏🙏🛐ॐ श्री परमात्मने नमः🛐🙏🙏 🙏कर्म का सिद्धांत पुस्तक से 🙏 #भाग_२५/०३ संक्षिप्त सार🩸 🏹🎻🪔📝🦚🔥🦚📝🪔🎻🏹 *कर्म का सिद्धांत पुस्तक में से अभी तक आपने पढ़ा और विस्तार से व्याख्या भी पढ़ी, उसका ही संक्षिप्त सार है।* *(1) गहना कर्मणो गति:* भगवान श्री कृष्ण कहते हैं,, कर्म की गति बड़ी गहन है *(2)कर्म का अटल सिद्धांत* करम प्रधान विश्व करि राखा। जो जस करहिं सो तस फल चाखा॥ *(3) कर्म माने क्या ? कर्म किसको कहते हैं ?* कर्म तीन प्रकार के होते हैं *(4) क्रियमाण कर्म* हम जो सुबह से शाम तक कर्म करते हैं वह क्रियमाण कर्म कहलाते हैं *(5) संचित कर्म* ऐसे कर्म जो तत्काल फल नहीं देते वह संचित में जमा हो जाते हैं उसे संचित कर्म कहते हैं *(6) प्रारब्ध कर्म* संचित कर्म पक कर फल देने के लिए तैयार हो जाता है , उसे प्रारब्ध कर्म कहते हैं *(7) किए हुए कर्म भोगने ही पड़ते हैं* कर्म किया कि उसका फल चिपका ही समझ लो *(8)धर्मी के घर डाका ,अधर्मी के घर विवाह* कर्म का अटल सिद्धांत है ,जैसा बोओगे वैसा पाओगे, जैसी करनी वैसी भरनी *(9) कर्म फल देकर ही शांत होते हैं* भगवान की माया के यह तीन गुण ,,, सतोगुण ,,, रजोगुण तमोगुण ,, *(10) क्रियमाण कर्म करने की पद्धति* जीव जिस स्वभाव का होता है, फल भोग उसी गुण को ग्रहण कर फल भोगता है *(11) प्रारब्ध में होगा उतना ही मिलेगा* कहां जन्म होना है , जीवन काल दरमियान जो भी दुख सुख मिलना है , और मृत्यु कब होनी है *(12) तो फिर क्या आदमी को पुरुषार्थ नहीं करना चाहिए ?* प्रारब्ध में हो तो ही मिलेगा , यह बात अटल सत्य है , किंतु प्रारब्ध कहां लगाना है और पुरुषार्थ कहां करना ,, उसका विवेक आदमी को ठीक तरह समझ लेना चाहिए *(13)प्रारब्ध कहां अजमाना, है और पुरुषार्थ कहां करना* मनुष्य को अपने जीवन काल में अर्थ ,धर्म ,काम , मोक्ष की कामनाएं होती हैं , अर्थ और काम को प्रारब्ध पर छोड़कर धर्म और मोक्ष के लिए पुरुषार्थ करना चाहिए *(14)प्रारब्ध और पुरुषार्थ एक दूसरे के विरोधी नहीं बल्कि पूरक है* *(15) कर्म करने में स्वतंत्र हैं फल भोगने में परतंत्र* *(16)फल भोगने के लिए देह धारण करनी ही पड़ेगी* फल भोगने का साधन देह ही है,, देह धारण करके ही हम फल भोग सकते हैं, इसलिए शरीर को भोगा जतन कहा है *(16 -अ )कर्म में घटाना (बाद बाकी) नहीं है ।* शुभ कर्म सोने की बेडी है और अशुभ कर्म लोहे की बेडी है,, दोनों का कर्म फल अलग-अलग भोगना पड़ता है *(17) तो फिर मोक्ष कब ?* मानव मात्र मोक्ष का अधिकारी है ,,, मानव शरीर मोक्ष प्राप्त करने के लिए ही मिला है। *(18) किंतु कोई कर्म ही न करें तो ?* कोई भी आदमी कर्म बिना रह नहीं सकता ,,, कर्म तो जन्म से लेकर मरण तक करने पड़ेंगे *(19) कौन से क्रियमाण कर्म संचित में जमा नहीं होते ?* निम्नलिखित कर्म संचित में जमा नहीं होते *(20)अबुध और अभान अवस्था किये हुए कर्म* (1)बाल्यावस्था में किए हुए कर्म (2) नशे की अवस्था में किए हुए कर्म *(21)मनुष्येतर योनि में किए हुए कर्म* (3) मनुष्य योनि के अलावा जितनी भी योनिया है उनके कर्म संचित में जमा नहीं होते,वह सब भोग योनिया है। *(22) कर्तापन के अभिमान के बिना किए हुए कर्म* (4) ऐसे कर्म जो अकर्म बन जाते हैं , संचित में जमा नहीं होते *(23 समष्टि के कल्याण के लिए किए हुए कर्म* (5) जो जगत कल्याण के लिए कर्म होते हैं वह संचित में जमा नहीं होते *(24)निष्काम कर्म* (6) राग द्वेष रहित,, कर्तापन के अभिमान रहित,, कामना से रहित,,, इत्यादि वह निष्काम कर्म संचित में जमा नहीं होते *(25) प्रारब्ध को भोगने से ही छुटकारा मिलता है* सुनहु भरत भावी प्रबल बिलखि कहेउ मुनिनाथ। हानि लाभ जीवन मरण यश अपयश विधि हाथ ॥ उसके निमित्त तीन हो सकते हैं *स्वेच्छाकृत-फल भोग* *परेच्छाकृत- फल भोग* *अनिच्छाकृत-फल भोग* *बुद्धि कर्मानुसारिणी* प्रारब्ध फल भोगने में बुद्धि भी कर्म का ही अनुसरण करती है *कर्म बुद्धि अनुसरणीय* प्रारब्ध फल भोगने में जैसा कर्म बैसी बुद्धि भी हो जाती है। *संक्षिप्त सार* यहा तक लिखा है ✍🏽 #कर्म #कर्म ही पूजा है #श्रीमद्भागवत गीता के श्लोक ॐ #🙏श्रीमद्भागवत गीता📙 #🙏💐श्रीमद्भागवत गीता💐🙏 bhagwat geeta
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