sn vyas
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🙏🙏🛐ॐ श्री परमात्मने नमः🛐🙏🙏 🙏कर्म का सिद्धांत पुस्तक से 🙏 #भाग_२५/६ 🏹🎻🪔📝🦚🔥🦚📝🪔🎻🏹 🦚प्रारब्ध तो भोगने से ही छुटकारा मिलता है🦚 🔥 (बुद्धि कर्मानुसारिणी)🔥 *न निर्मित: केन न दृष्टपूर्वं* *न श्रूयते हेम मय कुरंग:।* *तथापि तृष्णा रघुनन्दनस्य* *विनाश काले विपरीत बुद्धि॥* *सोने का मृग ब्रह्मा की सृष्टि में किसी जगह निर्माण हुआ, किसी ने देखा भी नहीं और सुना भी नहीं । फिर भी उस में भगवान राम को तृष्णा जगी,,, इसलिए कि मारीच रावण और तमाम राक्षसों के विनाश के लिए भगवान राम को ऐसी बुद्धि सूझी।* *केवो हतो रावण तत्व बेत्ता* *नवे ग्रहों निकट मां रहेता।* *हरी सीता कष्ट लह्युं कुबुद्धि* *विनाश काले विपरीत बुद्धि॥* *(अर्थात् ) -- कैसा था रावण तत्व बेत्ता,, नौ ग्रह उसके निकट रहते थे ,,, सीता का हरण करके कुबुद्धि से कष्ट मोल ले लिया ,,, विनाश काले विपरीत बुद्धि ।* *रावण महान ज्ञानी था ,, तमाम वेदों में वह पारंगत था,, भगवान शंकर का परम भक्त था ,, पुलस्त्य कुल का पवित्र ब्राह्मण था ,, महा शक्तिशाली था,, नौ ग्रह उसकी सेवा में रहते थे । वायु देवता उसके महल में झाड़ू लगाते थे । वरुण देवता उसके महल में पानी भरते थे । ऐसा ज्ञानी और शक्तिशाली राजा होने पर भी उसकी बुद्धि विपरीत हो गई । प्रारब्ध वश होकर उसकी बुद्धि सीता के हरण में नियुक्त हुई ।* *कैसे थे कौरव काल ज्ञानी,, द्वेष के साथ क्रोध से ,,, विनाश काले विपरीत बुद्धि। कौरव मूर्ख नहीं थे ,, गुरु द्रोणाचार्य के शिष्य थे ,,, युधिष्ठिर-- अर्जुन के साथ पढ़ते थे ,,, धर्म माने क्या ? और अधर्म माने क्या ? उसकी उनको अक्ल थी ,,, खुद दुर्योधन ने महाभारत में कबूल किया है कि ---* *जानामि धर्मं न च मे प्रवृत्ति:* *जानामि अधर्मंम् न च मे निवृत्ति:।* *केनापि देवेन ह्यदि स्थितेन* *यथा नियुक्तो अस्मि तथा करोमि॥* *धर्म और अधर्म का ज्ञान होने पर भी अंतःकरण में पड़ी हुई कामना और वासना प्रारब्ध भोगने के लिए बुद्धि को उल्टी विपरीत घुमा देती है।* क्रमश: आगे अब सातवां भाग ✍🏽 #कर्म #कर्म ही पूजा है #श्रीमद्भागवत #🙏💐श्रीमद्भागवत गीता💐🙏 bhagwat geeta #🙏श्रीमद्भागवत गीता📙
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