sn vyas
🙏🛐ॐ श्री परमात्मने नमः🛐🙏🙏
🙏कर्म का सिद्धांत पुस्तक से 🙏
#भाग०९
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🥰कर्म फल देकर ही शांत होता है🥰
*मानो कि एक आदमी ने पाप कर्म किया , उसके फलस्वरूप उसके एक दिन भूखा रहने का प्रारब्ध निर्माण हुआ। यह प्रारब्ध उसको किसी भी तरह छोड़ेगा नहीं,, प्रारब्ध भोगने के बिना क्रियमाण कर्म शांत होता ही नहीं।*
*अब अगर वह सत्वगुणी जीव है , तो वह एकादशी का व्रत करेगा, सारे दिन नारायण का स्मरण करेगा और उपवास करेगा और अपना प्रारब्ध भोग लेगा ।*
*अगर वह आदमी रजोगुण है, तो एक दिन अपनी पत्नी बीमार पड़ेगी तो उसको अस्पताल में ले जाएगा, बारह बजे तक अस्पताल में ही फंसा रहेगा, बाद में भूखा प्यासा देर से ऑफिस में नौकरी के लिए दौड़ जाएगा। रात को देरी से घर आकर, बच्चों को व्याकुल देखकर, उनके सेवा करते-करते भूखा ही रात्रि को सो जाएगा और एक दिन भूखा रहने का प्रारब्ध भोग लेगा।*
*अगर वह आदमी तमोगुण जीव है ,तो वह दोपहर को भोजन के लिए बैठते ही "भोजन खराब बना है" कह कर थाली पटक कर अपनी पत्नी के साथ झगड़ा करेगा,, मारपीट करेगा ,, भूखा प्यासा ऑफिस जाएगा ,, वहां भी सबके साथ झगड़ेगा ,, रात को फिर वापस घर आकर पत्नी बच्चों को मारपीट करके भूखा ही सो जाएगा ,, इस रीति से एक दिन भूखा रहने का प्रारब्ध भोग लेगा ।*
*सतोगुणी जीव,,,, व्रत उपवास करके एक दिन भूखा रहने का प्रारब्ध भोग लेगा, और साथ-साथ थोड़ा पुण्य भी प्राप्त कर लेगा, जिसका नया क्रियमाण निर्माण होता है।*
*रजोगुणी जीव ,,, पत्नी बच्चों की सेवा चिंता में एक दिन भूखा रहकर प्रारब्ध भोग लेगा , वह न तो नया पुण्य पैदा करेगा, न नया पाप प्राप्त करेगा ।*
*तमोगुणी जीव,,, क्लेश द्वारा एक दिन भूखा रहकर उस रीती से प्रारब्ध भोंगते हुए थोड़ा नया पाप भी पैदा करेगा,,, जिससे उसका एक नया क्रियमाण कर्म बनकर वह फिर पक कर प्रारब्ध बन कर सामने खड़ा हो जाएगा,,,*
*क्रियमाण कर्म,,, पक कर फल स्वरुप प्रारब्ध बन कर सामने आता है , जो भोगना ही पड़ता है , किंतु सत्वगुनी जीव,,, रजोगुणी जीव ,,, तमोगुणी जीव, तीनों की प्रारब्ध भोगने की रीती ऊपर बताई है,,, इस प्रकार अलग अलग होती है।*
*मानो कि मैंने एक पवित्र क्रियमाण कर्म किया, उसके फल के स्वरूप पाँच सौ रुपये मिलने का मेरा प्रारब्ध निर्माण हुआ है। यह प्रारब्ध जब तक में भोग नहीं लूंगा तब तक यह पाँच सौ रुपये मेरे पीछे-पीछे भ्रमण करेंगे। मुझ को पाँच सौ रुपये देकर ही वह फल शांत होगा।*
*एक दिन रात को बारह बजे एक आदमी मेरे घर आकर मेरे घर का दरवाजा खटखटा कर मुझे जगा कर मुझे कहे कि --- यह पाँच सौ रुपये घूस के ले लीजिए और मेरे पिता की जमीन में से मेरे भाई का हक डुबा कर वह पूरी जमीन मेरे नाम कर दीजिए। अगर मैं तमोगुणी जीव हूं तो यह पाँच सौ रुपये घूस लेकर उसके नाजायज मांग के अनुसार उसको लाभ प्राप्त करा दूंगा।*
*इस प्रकार से मेरा प्रारब्ध पाँच सौ रुपये प्राप्त करने का मैने भोग लिया और मेरा पहले का क्रियमाण कर्म प्रारब्ध बन कर फल देकर शांत हो गया । किंतु साथ-साथ मैंने एक नया पाप कर्म पैदा किया , जो कर्म पक कर प्रारब्ध रूप से एक दिन मेरे सामने अवश्य आएगा ही और मुझे भोगना पड़ेगा।*
*अब अगर मैं तमोगुणी जीव नहीं हूं, तो मैं वह पाँच सौ रुपये घूस के लेने की स्पष्ट ना कह दूं फिर भी यह पाँच सौ रुपये किसी प्रकार मुझे प्राप्त हुए बिना मेरा क्रियमाण कर्म प्रारब्ध रूप से मुझे बिना फल दिए शांत होगा ही नहीं। यह पाँच सौ रुपये मेरे पीछे-पीछे भ्रमण करेंगे।*
*एक दिन एक गरज वाला आदमी मेरे पास आकर और मेरा मकान जिसे मैंने तीस हजार में बेचने का तय किया था, उसके लिए 30500 मुझे देकर सौदा करेगा । इस तरह अगर मैं रजोगुणी जीव हूं तो मुझे ज्यादा पाँच सौ रुपये दिला कर मेरा क्रियमाण कर्म प्रारब्ध रूप से मुझे फल भुगता कर शांत हो जाएगा।*
*किंतु अगर मैं रजोगुण जीव नहीं हूं तो मैं बचन से बध्द होने के नाते तीस हजार रुपये से ज्यादा रकम लेने का मैं इनकार करूंगा, और इस तरह जब पाँच सौ रुपये ज्यादा लेने का मैं इनकार करुगा उस समय मेरा प्रारब्ध पीछे धकेल दिया जाएगा। तो भी वह पाँच सौ रुपये जब तक मुझे प्राप्त नहीं होंगे तब तक मेरा क्रियमाण कर्म मेरा पीछा नहीं छोड़ेगा।*
*मैं एसटी बस का कंडक्टर हूं, एक पैसैजर अपनी एक लाख़ रुपये की थैली मेरी बस में गलती से छोड़ जाता है, वह थैली लेकर मैं उसको देने के लिए गया उसके बदले में बहुत ही प्रेम से और आग्रह पूर्वक उसने मुझे पाँच सौ रुपये इनाम के रूप में दिए, और सत्तवगुणी जीव होने के नाते दिए हुए पैसे का मैंने स्वीकार किया और इस रीति से मेरा पाँच सौ रुपये प्राप्त करने का प्रारब्ध मैने भोग लिया और साथ-साथ मैंने थोड़ा पुण्य कमा लिया।*
*इस तरह किसी प्रकार से भी पाँच सौ रुपये दिला कर ही मेरा पहले का क्रियमाण कर्म प्रारब्ध रूप से फल देकर शांत हो गया, अगर मैं तमोगुणी जीव हूं, तो घूस लेकर मेरा प्रारब्ध भोग लू, और अगर मैं सतोगुणी जीव हूं तो किसी को संतोष से तृप्त कर प्रारब्ध भोग लू,*
*उपरोक्त रीती से सतोगुणी, रजोगुणी, तमोगुणी, जीव की प्रारब्ध भोगने की रीति अलग-अलग होती है, किंतु उन तीनों प्रकार के जीवो को प्रारब्ध तो भोगना ही पड़ता है,, और तभी वह कर्म शांत होगा।*
" कर्म फल देकर ही शांत होता है " का विश्राम ✍🏽
#कर्म #कर्म ही पूजा है #🙏श्रीमद्भागवत गीता📙 #🙏💐श्रीमद्भागवत गीता💐🙏 bhagwat geeta #श्रीमद्भागवत गीता के श्लोक ॐ