sn vyas
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🙏🙏🛐ॐ श्री परमात्मने नमः🛐🙏🙏
🙏कर्म का सिद्धांत पुस्तक से 🙏
#भाग_३६
क्रियमाण कर्म करने में मानव पूर्णत: स्वतंत्र है
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मनुष्य योनि में परमात्मा ने जीव को संपूर्ण स्वतंत्रता प्रदान की है । मनुष्य के अतिरिक्त अन्य योनियों में पूर्ण स्वतंत्रता नहीं दी गई है , क्योंकि सभी मनुष्येतर योनियों में केवल भोग ही करना होता है । अर्थात वह सभी भोग योनियों है । मनुष्येतर योनियों में जीव प्रारब्ध कर्मों को भोग कर उन से मुक्त हो जाता है । उन योनियों में नए क्रियमाण कर्म नहीं होते और न ही वे संचित कर्मों में जमा होते हैं।
*मनुष्य सज्जन बनने के लिए स्वतंत्र है । इतना ही नहीं वह दुर्जन बनने के लिए भी स्वतंत्र है । मानव को केवल दान करने की स्वतंत्रता नहीं है , उसे संग्रह करना हो तो उसके लिए भी वह स्वतंत्र है । मानव को केवल सच बोलने की स्वतंत्रता नहीं है , उसे झूठ बोलना हो तो उसके लिए भी स्वतंत्र है। अरे ,,,, मनुष्य योनि में मानव को आत्महत्या करनी हो तो उसके लिए भी वह स्वतंत्र है ।*
*जबकि पशु-पक्षी योनि में अथवा अन्य किसी भी योनि में जीव को आत्महत्या करने की स्वतंत्रता नहीं है । इस प्रकार मानव को परमात्मा ने संपूर्ण रूप से स्वतंत्र बनाया।*
*मनुष्य योनि में परमात्मा ने मानव को विज्ञानमय कोष और आनंदमय कोष, दोनों विशेष कोष किए हैं , जो अन्य योनियों में नहीं है । मानव स्वतंत्र है ।*
*क्योंकि उस में व्याप्त विज्ञानमय और आनंदमय परमात्मा भी परम स्वतंत्र है।*
*मानव केवल अच्छा बनने के लिए ही स्वतंत्र हो , और बुरा बनने के लिए स्वतंत्र न हो तो ऐसी स्वतंत्रता को संपूर्ण नहीं कहा जा सकता है । आप कहे कि मैंने अपनी पत्नी को संपूर्ण स्वतंत्रता दी है , पूरी तिजोरी उसे सौंप दी है , केवल चावी मैंने अपने पास रखी है । तो ऐसी स्वतंत्रता को संपूर्ण स्वतंत्रता नहीं कहा जा सकता--- यह तो केवल मजाक कहलाएगा।*
क्रमश: ✍🏽
#कर्म #कर्म ही पूजा है #🙏श्रीमद्भागवत गीता📙 #🙏💐श्रीमद्भागवत गीता💐🙏 bhagwat geeta
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